आदिवासी रैयती जमीन पर झारखंड हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: म्यूटेशन और लंबे कब्जे से नहीं मिलेगा मालिकाना हक

रांची (झारखंड): आदिवासी रैयती भूमि से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामले में झारखंड हाई कोर्ट ने विधि व्यवस्था स्पष्ट करते हुए बड़ा निर्णय दिया है।
अदालत ने दो-टूक कहा है कि मात्र लंबे समय तक भूमि पर काबिज रहने, पुराने दीवानी मुकदमे में आपसी समझौता हो जाने अथवा राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Records) में नाम दर्ज हो जाने से जमीन पर किसी का वैध कानूनी अधिकार स्थापित नहीं हो जाता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि जमीन छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) के संरक्षण के दायरे में आती है और उसका मूल अंतरण या लेनदेन अधिनियम के वैधानिक प्रावधानों के विरुद्ध हुआ है, तो बाद की कोई भी प्रशासनिक या विधिक प्रक्रिया उस अवैध लेनदेन को वैध नहीं ठहरा सकती।
🏛️ जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की एकलपीठ का आदेश: याचिका खारिज, जमीन बहाली का फैसला बरकरार
फैसले का मुख्य आधार और न्यायिक टिप्पणियां:
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पूर्वी सिंहभूम का मामला: यह पूरा विवाद पूर्वी सिंहभूम जिले के एमजीएम थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम गौर डांगा मौजा की संरक्षित भूमि से संबंधित है।
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रिट याचिका खारिज: न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की एकलपीठ ने अनंता गौर उर्फ अनंत कुमार प्रधान द्वारा दायर रिट याचिका को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।
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राजस्व आदेश सुरक्षित: हाई कोर्ट ने राजस्व अधिकारियों द्वारा पारित उस मूल आदेश को पूरी तरह विधिमान्य माना, जिसके तहत विवादित जमीन को मूल आदिवासी रैयत के पक्ष में बहाल (Restoration) करने का निर्देश दिया गया था। अधिवक्ता धीरज कुमार ने इस न्यायिक निर्णय की पुष्टि की है।
📜 सीएनटी एक्ट की धारा 71-A के तहत बहाली का वाद: उप समाहर्ता से हाई कोर्ट तक का सफर
मामले की कानूनी पृष्ठभूमि और प्रक्रिया:
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LRDC कोर्ट का आदेश: विवादित भूमि को लेकर भूमि सुधार उप समाहर्ता (LRDC), धालभूम (जमशेदपुर) के समक्ष CNT एक्ट की धारा 71-A के अंतर्गत आदिवासी भूमि बहाली का वाद दायर किया गया था।
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रैयत के पक्ष में फैसला: 29 जून 2006 को सक्षम प्राधिकारी ने वाद स्वीकार करते हुए जमीन को प्रतिवादी संख्या-5 ममता सिंह मुंडा के पक्ष में पुनः बहाल करने का आदेश जारी किया था।
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अपील और रिवीजन में मात: इस निर्णय के विरुद्ध गैर-आदिवासी पक्ष ने शेड्यूल एरिया रेगुलेशन (SAR) अपील दायर की, जो खारिज हो गई। तत्पश्चात दायर SAR रिवीजन याचिका भी सक्षम फोरम द्वारा निरस्त कर दी गई, जिसके उपरांत मामला हाई कोर्ट पहुंचा था।
⏳ ‘1967 से है शांतिपूर्ण कब्जा’: याचिकाकर्ताओं ने समझौते और लगान रसीद का दिया था तर्क
याचिकाकर्ता पक्ष की प्रमुख दलीलें:
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दशकों पुराना कब्जा: याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि वे वर्ष 1967 से ही उक्त भूमि पर शांतिपूर्ण, निरंतर और वास्तविक रूप से काबिज हैं।
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टाइटल सूट में समझौता: अपने अधिकार के समर्थन में उन्होंने वर्ष 1967 में दायर टाइटल सूट (संख्या 791/1967) में पक्षकारों के बीच हुए सुलहनामे (Compromise Decree) को प्रस्तुत किया।
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दाखिल-खारिज और लगान: उनका यह भी तर्क था कि समझौते के आधार पर राज्य सरकार के राजस्व रिकॉर्ड में उनका विधिवत दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) हुआ और सरकार द्वारा जमीन की नियमित लगान रसीदें भी काटी जाती रही हैं।
🚫 अदालत ने खारिज की दलीलें: ‘सीएनटी एक्ट का उल्लंघन कर किया गया कोई भी समझौता अमान्य’
न्यायालय द्वारा स्थापित वैधानिक सिद्धांत:
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सीएनटी प्रावधान सर्वोपरि: हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के तर्कों को सिरे से नकारते हुए टिप्पणी की कि यदि कोई लेनदेन सीएनटी एक्ट के अनिवार्य और सुरक्षात्मक प्रावधानों का उल्लंघन करता है, तो सक्षम अदालत में हुआ कोई भी समझौता उस अवैध लेनदेन को विधिक मान्यता नहीं दे सकता।
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समझौते से अधिकार नहीं: पुराने दीवानी मुकदमे का समझौता अपने आप में ऐसा कोई अधिकार सृजित नहीं करता, जो सीएनटी अधिनियम की मूल भावना और वैधानिक रोक को दरकिनार कर सके।
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म्यूटेशन मालिकाना हक का प्रमाण नहीं: फैसले का सबसे निर्णायक पहलू यह रहा कि राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज होना या सरकार द्वारा लगान स्वीकार करना केवल वित्तीय उद्देश्य के लिए होता है; यह अपने आप में जमीन के वैध और निर्विवाद मालिकाना हक की कानूनी गारंटी नहीं है।





