BJP Campaign Strategy UP: जाति बनाम ध्रुवीकरण: यूपी में क्यों बढ़ी बीजेपी-संघ की चिंता? नितिन नबीन और तावड़े ने संभाला मोर्चा

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव से करीब छह महीने पहले भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की राजनीतिक व संगठनात्मक गतिविधियां अचानक काफी तेज हो गई हैं। पिछले कुछ हफ्तों के भीतर राजधानी लखनऊ से लेकर पूर्वांचल, अवध और पश्चिमी यूपी तक लगातार उच्चस्तरीय बैठकों का सिलसिला जारी है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन, राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बी.एल. संतोष और प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े अलग-अलग क्षेत्रों का दौरा कर संगठन की जमीनी नब्ज टटोल रहे हैं।
🤝 संघ के साथ समन्वय बैठकों का सिलसिला जारी: जमीनी फीडबैक ने बढ़ाई पार्टी की चिंता
इसके साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के साथ समन्वय बैठकों का दौर भी समानांतर रूप से चल रहा है।
सवाल यह उठ रहा है कि जब चुनाव में अभी लगभग छह महीने का समय बाकी है, तब भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इतनी तत्परता से उत्तर प्रदेश के कोने-कोने में क्यों उतर रहा है? सूत्रों के मुताबिक, धरातल से मिल रही राजनीतिक व संगठनात्मक प्रतिक्रियाओं ने शीर्ष नेतृत्व की चिंताएं बढ़ा दी हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि चुनावी विमर्श धीरे-धीरे पारंपरिक धार्मिक ध्रुवीकरण से हटकर जातीय समीकरणों की ओर मुड़ता दिख रहा है।
🏛️ एक साथ कई स्तरों पर चला अभियान: मेरठ में सीएम योगी और नितिन नबीन ने की समीक्षा
भाजपा ने उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरण साधने के लिए एक साथ बहुस्तरीय अभियान छेड़ा है।
एक तरफ बी.एल. संतोष सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने के लिए बैठकें ले रहे हैं, तो दूसरी तरफ विनोद तावड़े क्षेत्रवार संगठनात्मक समीक्षा कर रहे हैं। इसी कड़ी में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश का विस्तृत दौरा किया। मेरठ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और वरिष्ठ पदाधिकारियों की उपस्थिति में बूथ से लेकर जिला स्तर तक की चुनावी तैयारियों का लेखा-जोखा लिया गया।
📋 संघ-बीजेपी समन्वय बैठक के मुख्य बिंदु: यूजीसी विवाद और स्थानीय शिकायतों पर मंथन
लखनऊ में आयोजित बीजेपी और संघ की समन्वय बैठक में संगठन को मजबूती देने वाले कई संवेदनशील विषयों पर विचार-विमर्श किया गया।
बैठक में बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाने, सरकार के फैसलों को जन-जन तक सही रूप में पहुंचाने और विपक्ष के राजनीतिक आख्यान (Narrative) का करारा जवाब देने की योजना बनी। यूजीसी के नए नियमों से जुड़े विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सरकार का पक्ष आम जनता तक स्पष्ट रूप से पहुंचाने की रणनीति तय की गई। इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों से जनता की नाराजगी और प्रशासनिक तालमेल जैसे आंतरिक मुद्दों पर भी गंभीरता से बात हुई।
⚖️ सबसे बड़ी चुनौती: ‘जाति बनाम ध्रुवीकरण’ और अखिलेश यादव का ‘PDA’ दांव
भाजपा की चुनावी राजनीति में राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और सख्त कानून-व्यवस्था हमेशा से प्रमुख स्तंभ रहे हैं।
हालांकि, इस बार विपक्षी दल लगातार जातीय जनगणना, आरक्षण और सामाजिक न्याय के सवालों को चुनावी चर्चा के केंद्र में लाने का प्रयास कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने 2024 के लोकसभा चुनाव में ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) का जो सामाजिक फॉर्मूला पेश किया था, उसे 2027 के चुनाव से पहले और अधिक विस्तार देने की कोशिश की जा रही है। संघ और भाजपा की बैठकों में इस बात पर गंभीर मंथन हुआ है कि यदि चुनाव ‘हिंदू बनाम मुस्लिम’ के बजाय ‘पिछड़ा बनाम सवर्ण’ या ‘जातीय हिस्सेदारी’ पर केंद्रित होता है, तो पार्टी को अपनी रणनीति में व्यापक बदलाव करने होंगे।
😡 जनप्रतिनिधियों से नाराजगी और कार्यकर्ताओं का असंतोष: जमीनी नेटवर्क सुधारने पर जोर
बैठक में दूसरा बड़ा विषय विधायकों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के प्रति आम जनता व कार्यकर्ताओं की नाराजगी का रहा।
सूत्रों के अनुसार, फीडबैक मिला है कि कई क्षेत्रों में विधायकों की पकड़ कमजोर पड़ी है और आम जनता तथा कार्यकर्ताओं की पहुंच अपने जनप्रतिनिधियों तक सुलभ नहीं हो पा रही है। भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका कैडर और बूथ स्तर का संगठनात्मक ढांचा माना जाता है। यदि कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस करेंगे तो चुनावी अभियान की गति धीमी पड़ सकती है। इसी वजह से शीर्ष नेतृत्व कार्यकर्ताओं के साथ सीधा संवाद स्थापित करने पर जोर दे रहा है।
🏢 अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर असंतोष: सरकार-संगठन में बेहतर तालमेल की मांग
भाजपा के भीतर एक और शिकायत प्रमुखता से उभरकर आई है—अधिकारियों की मनमानी और जनप्रतिनिधियों की अनदेखी।
अनेक विधायकों और मंत्रियों ने समय-समय पर प्रशासनिक अधिकारियों के ढुलमुल रवैये को लेकर सार्वजनिक व पार्टी फोरम पर अपनी बात रखी है। संघ और भाजपा के इस संयुक्त मंथन में यह बात साफ तौर पर रखी गई कि चुनावी सफलता के लिए शासन, संगठन और प्रशासनिक मशीनरी के बीच सहज व पारदर्शी समन्वय होना अत्यंत आवश्यक है।
📚 यूजीसी विवाद ने खोला नया मोर्चा: सवर्ण संगठनों के विरोध को साधने की कोशिश
यूजीसी (UGC) के नए नियमों को लेकर सामने आए विवाद ने भी भाजपा के लिए रणनीतिक तौर पर नई चुनौती खड़ी की है।
सामान्य वर्ग से जुड़े विभिन्न संगठनों ने इन नियमों के विरोध में अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। दिल्ली में प्रस्तावित यूजीसी-विरोधी महापंचायत और आगरा में हुए प्रदर्शनों के बाद केंद्रीय स्तर पर बातचीत कर माहौल को शांत करने का प्रयास किया गया। संघ-बीजेपी की बैठक में यह तय किया गया कि इस मुद्दे पर भ्रांतियों को दूर करने के लिए पार्टी कार्यकर्ता धरातल पर जाकर सही जानकारी साझा करेंगे।
🗺️ पश्चिमी यूपी से लेकर पूर्वांचल तक विशेष रणनीति: क्षेत्रवार बन रहा राजनीतिक गणित
2024 के लोकसभा चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुछ प्रमुख सीटों पर भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी।
इसी को ध्यान में रखते हुए नितिन नबीन ने मेरठ और सहारनपुर में मैराथन बैठकें कीं। पश्चिमी यूपी में जाट, गुर्जर, दलित, मुस्लिम, पिछड़ा और सवर्ण मतदाताओं का गणित काफी जटिल है। दूसरी ओर, प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े गोरखपुर, काशी और अवध क्षेत्र का दौरा कर रहे हैं। पार्टी इस बार केवल राज्यस्तरीय घोषणाओं के भरोसे रहने के बजाय प्रत्येक क्षेत्र की विशिष्ट समस्याओं, विधायक के प्रदर्शन और विपक्षी घेराबंदी के हिसाब से अलग-अलग रणनीति तैयार कर रही है।
👥 युवाओं से संवाद बढ़ा रहा है संघ: बूथ स्तर तक नेटवर्क मजबूत करने का लक्ष्य
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बढ़ी हुई भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
नोएडा, मुजफ्फरनगर सहित राज्य के विभिन्न हिस्सों में युवाओं और प्रबुद्ध वर्ग के साथ संघ के संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। आने वाले समय में ऐसे और भी आयोजन प्रस्तावित हैं। संघ की इस सक्रियता का सीधा उद्देश्य बूथ स्तर तक संगठन के नेटवर्क को धार देना और सरकार व समाज के बीच एक सकारात्मक सेतु के रूप में कार्य करना है।
🏛️ दिल्ली से लखनऊ तक महामंथन: क्या 2027 से पहले स्थितियां संभाल पाएगी बीजेपी?
आने वाले दिनों में केंद्रीय नेताओं के उत्तर प्रदेश दौरे और अधिक बढ़ने की संभावना है।
वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि 2017 और 2022 की तुलना में इस बार भाजपा के सामने जमीनी स्तर पर कई नई चुनौतियां हैं—जैसे विधायकों के प्रति स्थानीय असंतोष, प्रशासनिक अधिकारियों से शिकायतें, यूजीसी मुद्दे पर सवर्ण वर्ग की प्रतिक्रिया और डिजिटल भुगतानों/व्यापारिक नीतियों पर छोटे कारोबारियों का फीडबैक। ऐसे में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मजबूत नेतृत्व, भाजपा के संगठनात्मक ढांचे और संघ के जमीनी नेटवर्क के बल पर पार्टी इन सभी चुनौतियों से पार पाने की व्यापक योजना पर काम कर रही है।





