Is Ashwagandha Safe? अश्वगंधा के लंबे समय तक सेवन पर फ्रंटियर्स इन मेडिसिन की रिसर्च, मिले चौंकाने वाले राहत भरे नतीजे

अश्वगंधा के दीर्घकालिक उपयोग और उसकी शारीरिक सुरक्षा को लेकर किए गए एक व्यापक एवं बहु-केंद्रीय (Multi-Center) क्लिनिकल ट्रायल में बेहद सकारात्मक और राहत देने वाले परिणाम सामने आए हैं।
‘फ्रंटियर्स इन मेडिसिन’ (Frontiers in Medicine) में प्रकाशित एक प्रतिष्ठित शोध के अनुसार, मानकीकृत (Standardized) अश्वगंधा की जड़ के अर्क का लगातार 24 सप्ताह तक सेवन करने वाले प्रतिभागियों में लिवर या किडनी को उपचार से संबंधित किसी भी प्रकार के नुकसान का कोई प्रमाण नहीं मिला है।
अध्ययन के दौरान अश्वगंधा को एक नियंत्रित दिनचर्या के तहत दिया गया और इसकी उत्कृष्ट सहनशीलता (Tolerability) का प्रमाण यह रहा कि किसी भी प्रतिभागी ने किसी प्रतिकूल प्रभाव के कारण परीक्षण को बीच में नहीं छोड़ा।
🧪 7 रिसर्च सेंटर्स और 1,200 प्रतिभागियों पर अध्ययन: 28 सप्ताह तक चली गहन निगरानी
ट्रायल की वैज्ञानिक कार्यप्रणाली और संरचना:
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दो समूहों में विभाजन: इस वैज्ञानिक शोध में शामिल प्रतिभागियों को दो अलग-अलग समूहों में बांटा गया था। एक समूह को प्रतिदिन 500 मिलीग्राम जैल अश्वगंधा रूट एक्सट्रैक्ट दिया गया (जो 4 ग्राम कच्ची अश्वगंधा जड़ के चूर्ण के समतुल्य था), जबकि दूसरे समूह को उसी रूप-रंग वाला प्लेसिबो (डमी दवा) दिया गया।
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7 प्रमुख केंद्रों पर परीक्षण: यह क्लिनिकल ट्रायल भारत के 7 प्रमुख रिसर्च सेंटरों पर आयोजित किया गया, जिसमें क्लिनिकल, पैथोलॉजिकल और इम्यूनोलॉजिकल जांचों के माध्यम से प्रतिभागियों के स्वास्थ्य का विस्तृत आकलन हुआ।
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86% प्रतिभागियों ने पूरा किया ट्रायल: कुल 1,200 नामांकित प्रतिभागियों में से 1,032 (लगभग 86%) ने अध्ययन को सफलतापूर्वक पूरा किया। प्रतिभागियों को 24 सप्ताह तक निर्धारित खुराक दी गई और उसके बाद 28वें सप्ताह तक उनके स्वास्थ्य की निरंतर निगरानी की गई।
🩺 लिवर और किडनी की जांच रिपोर्ट: सभी बायोमार्कर्स सामान्य रेफरेंस रेंज में दर्ज
अंगों की कार्यप्रणाली पर प्रभाव का चिकित्सीय विवरण:
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सामान्य रहे सभी पैरामीटर: 24 सप्ताह के निरंतर सेवन के दौरान प्रतिभागियों के लिवर और किडनी फंक्शन से जुड़े सभी महत्वपूर्ण मानक सामान्य शारीरिक सीमा (Normal Reference Range) के भीतर पाए गए।
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इंजरी का कोई संकेत नहीं: लिवर एंजाइम (SGOT/SGPT), सीरम बिलीरुबिन, सीरम क्रिएटिनिन और ब्लड यूरिया जैसे महत्वपूर्ण संकेतकों में दवा से संबंधित किसी भी प्रकार के लिवर या रीनल डैमेज का कोई साक्ष्य नहीं मिला।
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कोई गंभीर प्रतिकूल प्रभाव नहीं: अध्ययन अवधि के दौरान कोई भी गंभीर प्रतिकूल घटना (Adverse Event) दर्ज नहीं की गई जिसे अश्वगंधा के सेवन से जुड़ा माना जाए, जिससे इसकी उच्च सुरक्षा प्रोफाइल की पुष्टि होती है।
🛡️ कोविशिल्ड वैक्सीन की इम्युनिटी पर असर: न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज 85% से अधिक बरकरार
प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यूनिटी) पर प्रभाव का आकलन:
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वैक्सीन प्रभावशीलता की जांच: रिसर्च के तहत यह भी बारीकी से परखा गया कि क्या 24 सप्ताह तक अश्वगंधा का नियमित सेवन कोविशिल्ड (Covishield) वैक्सीन से विकसित हुई एंटीबॉडीज या प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया में कोई बाधा उत्पन्न करता है।
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वायरस न्यूट्रलाइजिंग क्षमता अक्षुण्ण: परिणामों से स्पष्ट हुआ कि अश्वगंधा और प्लेसिबो—दोनों ही समूहों में वायरस को निष्प्रभावी करने वाली गतिविधि (Virus-Neutralising Activity) 85% से अधिक बनी रही।
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कोई नकारात्मक हस्तक्षेप नहीं: दोनों समूहों के प्रतिरक्षा स्तर में कोई सांख्यिकीय अंतर नहीं देखा गया, जिससे सिद्ध होता है कि अश्वगंधा वैक्सीन जनित इम्युनिटी को प्रभावित या कमजोर नहीं करता।
🏛️ 9 प्रतिष्ठित संस्थानों के 45 वैज्ञानिकों का संयुक्त प्रयास: CTRI में पंजीकृत था ट्रायल
सहयोगी संस्थान और विधिक पंजीकरण:
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शीर्ष वैज्ञानिकों का दल: इस बहु-विषयक क्लिनिकल ट्रायल में आयुर्वेद, क्लिनिकल मेडिसिन, रूमेटोलॉजी तथा इंटीग्रेटिव हेल्थ से जुड़े 45 अग्रणी वैज्ञानिक और विशेषज्ञ शामिल थे।
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प्रमुख प्रतिभागी संस्थान:
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केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS)
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अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIIA), नई दिल्ली
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राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान (NIA), जयपुर
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आयुष सेंटर ऑफ एक्सीलेंस
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ट्रांसलेशनल हेल्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट (THSTI)
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सेंटर फॉर कॉम्प्लिमेंट्री एंड इंटीग्रेटिव हेल्थ (CCIH)
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सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय का इंटरडिसिप्लिनरी स्कूल ऑफ हेल्थ साइंसेज
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आधिकारिक पंजीकरण: यह ऐतिहासिक ट्रायल क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री-इंडिया में पंजीकरण संख्या CTRI/2021/06/034496 के तहत विधिवत दर्ज था।
🗣️ आयुष मंत्रालय और प्रमुख विशेषज्ञों की राय: वैश्विक पटल पर आयुर्वेद के साक्ष्य मजबूत
शोध के निष्कर्षों पर नीति निर्माताओं और वैज्ञानिकों के विचार:
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वैद्य राजेश कोटेचा (सचिव, आयुष मंत्रालय): उन्होंने कहा कि उच्च गुणवत्ता वाले ऐसे वैज्ञानिक परीक्षण आयुर्वेद के पारंपरिक ज्ञान को साक्ष्य-आधारित मजबूती प्रदान करते हैं। इससे आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में मानकीकृत आयुर्वेदिक दवाओं के जिम्मेदार और वैश्विक उपयोग का मार्ग प्रशस्त होगा।
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डॉ. अरविंद चोपड़ा (मुख्य शोधकर्ता एवं रूमेटोलॉजिस्ट): उन्होंने स्पष्ट किया कि 24 सप्ताह का यह रैंडमाइज्ड ट्रायल मानकीकृत अश्वगंधा की दीर्घकालिक सुरक्षा और उच्च सहनशीलता का ठोस प्रमाण प्रस्तुत करता है, जहां लिवर-किडनी पैरामीटर पूरी तरह सुरक्षित रहे।
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प्रो. भूषण पटवर्धन (नेशनल प्रोफेसर, आयुष): उन्होंने बताया कि यह शोध इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण है कि आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों को अक्षुण्ण रखते हुए आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों से उसका प्रमाण-आधारित मूल्यांकन कैसे संभव है।
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प्रो. रबिनारायण आचार्य (महानिदेशक, CCRAS): उन्होंने रेखांकित किया कि ऐसे सुव्यवस्थित क्लिनिकल परीक्षण मानकीकृत आयुर्वेदिक उत्पादों पर जन-विश्वास बढ़ाने और उनके सुरक्षित चिकित्सीय उपयोग को बढ़ावा देने के लिए मील का पत्थर साबित होते हैं।





