Madhya Pradesh Coal Mines: उमरिया कालरी के इतिहास और रोजगार पर मंडराए संकट को लेकर उग्र हुआ आंदोलन

मध्य प्रदेश के उमरिया जिले में कालरी की चपहा इन्क्लाइन के बंद होने की आशंका के विरोध में शनिवार को स्थानीय व्यापारी और नागरिक भारी संख्या में सड़कों पर उतर आए। खदान के बंद होने से क्षेत्र के रोजगार और कारोबार पर मंडरा रहे बड़े संकट के खिलाफ यह आंदोलन शुरू किया गया है। विरोध स्वरूप व्यापारियों ने नगर का पूरा बाजार बंद कराकर मुख्य मार्ग पर धरना शुरू कर दिया। युवा व्यवसायी सचिन गुप्ता ने बताया कि पूर्व विधायक अजय सिंह के मार्गदर्शन में यह आंदोलन छेड़ा गया है, जिसमें एसईसीएल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर असंतोष व्यक्त करते हुए खदान का संचालन निरंतर रखने की मांग की गई है।
📉 कर्मचारियों के स्थानांतरण और एस्क्रो खाते को लेकर गहरी आशंका: 35-40 साल का कोयला भंडार होने का दावा
स्थानीय नागरिकों और व्यापारियों का आरोप है कि कुछ महीने पहले क्षेत्रीय विधायक शिवनारायण सिंह और भाजपा पदाधिकारियों को आश्वासन दिए जाने के बावजूद चुपचाप कर्मचारियों को अन्य स्थानों पर स्थानांतरित करने की प्रक्रिया जारी है। इसके अलावा, उमरिया भूमिगत खदान के माइन क्लोजर एस्क्रो खाते में वर्ष 2023 के दौरान दो किस्तों में 1 करोड़ 15 लाख 33 हजार रुपये जमा किए जाने की जानकारी सामने आने से खदान बंद होने की आशंका और अधिक गहरी हो गई है। स्थानीय लोगों का दावा है कि चपहा खदान में अभी भी लाखों टन कोयला मौजूद है और इससे अगले 35 से 40 वर्षों तक सुगमता से उत्पादन किया जा सकता है।
📜 1882 से जुड़ा है उमरिया कालरी का ऐतिहासिक महत्व: 1966 में पलायन का दर्द झेल चुका है शहर
उमरिया कालरी का इतिहास वर्ष 1882 से जुड़ा हुआ है। स्थानीय इतिहास के मुताबिक, लगभग 1966 में भी कोयला समाप्त होने का हवाला देकर इस खदान को बंद कर दिया गया था, जिसके परिणामस्वरुप बड़े पैमाने पर कामगारों, व्यापारियों और नागरिकों को रोजगार छिनने के कारण पलायन करना पड़ा था। हालांकि, वर्ष 1974 में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश चंद्र सेठी ने इस कालरी का पुनरुद्धार और पुनः उद्घाटन किया था, जिससे शहर की आर्थिकी फिर पटरी पर लौटी थी। वर्तमान में क्षेत्र में रोजगार के सीमित विकल्प होने के कारण व्यापारी हर हाल में कालरी को बचाने की जिद पर अड़े हैं।
