Israel Election News: प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य का फैसला आज, ईरान हमले के आदेश और IDF चीफ से विवाद के बीच वोटिंग

यरूशलम: वैश्विक राजनीति के केंद्र में चल रहे इजराइल में आज एक बड़ा राजनीतिक मुकाबला देखने को मिल रहा है, जहां देश की 120 संसदीय सीटों के लिए कुल 73 लाख मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस चुनाव में देश के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य का फैसला होना है। एक तरफ जहां वाशिंगटन और तेल अवीव के बीच कूटनीतिक शह-मात का खेल जारी है, वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी खुलकर नेतन्याहू के पक्ष में बयान दिए हैं। हालांकि, मतदान से ठीक पहले प्रधानमंत्री नेतन्याहू और इजराइली डिफेंस फोर्सेज (IDF) के प्रमुख इयाल जामिर के बीच ईरान पर सैन्य कार्रवाई को लेकर तीखा टकराव सामने आने से राजनीतिक सरगर्मी काफी बढ़ गई है।
चुनाव से दो दिन पहले ईरान पर हमले के आदेश पर हुआ विवाद
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मतदान से ठीक दो दिन पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू चाहते थे कि ईरान के खिलाफ एक सीक्रेट सैन्य कार्रवाई को अंजाम दिया जाए। इसके लिए उन्होंने सेना प्रमुख इयाल जामिर को निर्देश भी दिए थे। लेकिन, आईडीएफ चीफ ने इस जल्दबाजी में उठाए जाने वाले कदम का कड़ा विरोध किया और इस पर गहन रणनीतिक चर्चा की मांग की। सेना प्रमुख का मानना था कि वर्तमान समय में ईरान इजराइल के लिए कोई तात्कालिक खतरा नहीं है, क्योंकि पिछले हमलों ने उसकी परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को काफी हद तक कमजोर कर दिया है।
सेना प्रमुख द्वारा लिखित मंजूरी की मांग और कड़ा रुख
आईडीएफ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि इजराइल को केवल दो ही परिस्थितियों में तुरंत हमला करना चाहिए—या तो ईरान खुद इजराइल पर बड़ा हमला करने वाला हो, या फिर अमेरिका इस नए युद्ध की शुरुआत करे और इजराइल को यूएस का पूर्ण समर्थन प्राप्त हो। जब नेतन्याहू ने आदेश का दबाव बनाया, तो सेना प्रमुख ने इसके लिए औपचारिक रूप से लिखित अनुमति की मांग कर डाली, जिसके बाद प्रधानमंत्री या उनके करीबियों की तरफ से कोई जवाब नहीं दिया गया। इस घटना के बाद से यह बहस छिड़ गई है कि क्या नेतन्याहू चुनाव टालने या जनता का ध्यान भटकाने के लिए युद्ध को एक चुनावी टूल के तौर पर इस्तेमाल करना चाहते थे।
डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन और ईरान के मुद्दे पर सियासत
चुनाव से ठीक 48 घंटे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर नेतन्याहू का समर्थन किया और ऑपरेशन मिडनाइट हैमर तथा ऑपरेशन एपिक फ्यूरी जैसी सैन्य कार्रवाइयों का जिक्र करते हुए जनता से नेतन्याहू के पक्ष में वोट करने की अपील की। जानकारों का कहना है कि नेतन्याहू को अपनी हार का डर सता रहा है, इसलिए वे लगातार चुनाव प्रचार में ईरान के सुरक्षा मुद्दों और ट्रंप के समर्थन का राजनीतिक लाभ उठाने की जुगत में लगे रहे, लेकिन आईडीएफ चीफ के कड़े रुख ने उनकी इन रणनीतियों को झटका दे दिया है।
IDF चीफ के हमले से इनकार करने की चार मुख्य वजहें
विश्लेषकों के अनुसार, सेना प्रमुख इयाल जामिर द्वारा इस समय ईरान पर हमला करने से इनकार करने के पीछे मुख्य रूप से चार बड़े कारण थे। पहला कारण देश की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान की आशंका था, क्योंकि जवाबी कार्रवाई में लंबा युद्ध छिड़ सकता है। दूसरा कारण कूटनीतिक मोर्चे पर अंतरराष्ट्रीय बहिष्कार का डर था, यदि यह साबित हो जाता कि युद्ध पूरी तरह राजनीतिक हितों के लिए शुरू किया गया है। तीसरा कारण गाजा और लेबनान मोर्चे पर पिछले तीन साल से लगातार लड़ रहे सैनिकों की शारीरिक और मानसिक थकान है, और चौथा कारण लगातार संघर्ष के चलते गोला-बारूद व संसाधनों की कमी होना है।
नेतन्याहू और सैन्य नेतृत्व के बीच ऐतिहासिक असहमतियों का दौर
यह पहला मौका नहीं है जब इजराइली प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख के बीच युद्ध की रणनीति को लेकर मतभेद उभरे हों। इतिहास गवाह है कि वर्ष 1967 के युद्ध के दौरान तत्कालीन सेना प्रमुख यित्ज़ाक राबिन और प्रधानमंत्री लेवी एशकोल के बीच पहले हमला करने को लेकर तीखी बहस हुई थी। इसी तरह 1973 के योम किप्पूर युद्ध और 1993 में शांति समझौतों के दौरान भी राजनीतिक नेतृत्व और सेना के शीर्ष अधिकारियों के बीच असहमति देखने को मिली थी। हालांकि, मौजूदा मामलों में नेतन्याहू पर सीधे तौर पर युद्ध के जरिए राजनीतिक फायदा उठाने के गंभीर आरोप लग रहे हैं, जो आज के चुनाव परिणामों पर गहरा असर डाल सकते हैं।





