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जनसंवाद का नया दौर: सूचना प्रौद्योगिकी में तकनीकी बदलावों से देश जनसंवाद के नए दौर में पहुंचा

लोकतंत्र की बुनियाद जनभागीदारी है। जनसंवाद और जनभागीदारी ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को दुनिया में सर्वाधिक स्वीकार्य बनाया है। विचारों के आदान-प्रदान और संवाद की स्वस्थ प्रणाली से ही एक मजबूत और सशक्त लोकतंत्र का विकास होता है। दुनिया के अनेक देशों में लोकतंत्र के विकास के साथ-साथ जनसंवाद की नई प्रणालियां भी प्रयोग में आती रही हैं। 15वीं शताब्दी में छापाखानों के प्रयोग में आने के बाद ज्ञान-विज्ञान के प्रसार को नई दिशा मिली।

यूरोप में हुए धार्मिक पुनर्जागरण में छापाखानों की बड़ी भूमिका

यूरोप में हुए धार्मिक पुनर्जागरण में इन छापाखानों की बड़ी भूमिका रही। राजनीतिक विचारों को लोगों तक पहुंचाने के लिए जनसभाओं का पहला प्रयोग 19वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में देखने को मिला। 1892 में इंग्लैंड के राजनेता विलियम ग्लैडस्टोन, जो वहां के प्रधानमंत्री भी रहे, ने अपने राजनीतिक विचारों के प्रसार के लिए जनसभाओं और भाषणों को माध्यम बनाया। इसी कालखंड में कुछ ऐसे ही प्रयोग अमेरिका में भी हो रहे थे।

जनसंवाद के माध्यमों में बदलाव, आजादी के आंदोलन में  रेडियो गांव-गांव तक पहुंचा

समय के साथ हुए तकनीक के विकास ने जनसंवाद के माध्यमों में बदलाव किया। आजादी के आंदोलन के दौरान भारत में पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन चलन में आ गया था। इसका प्रयोग आजादी के बाद भारत की राजनीति में भी कायम रहा। पत्र-पत्रिकाएं नेताओं के विचारों की अभिव्यक्ति करने का मजबूत माध्यम बनीं। प्रिंट माध्यम के राजनीतिक क्षेत्र में बहस और विमर्श के लिए एक कारगर और प्रभावी औजार बनने के बाद रेडियो का दौर शुरू हुआ। रेडियो गांव-गांव तक पहुंचने वाला एक ऐसा माध्यम बनकर उभरा जो राजनीतिक विमर्श के साथ-साथ सामाजिक चेतना का वाहक भी बना। कृषि क्षेत्र, महिला सरोकार के विषय और देशज संवाद के कार्यक्रम रेडियो पर गांव-गांव में बहुत चाव से सुने जाने लगे।

रेडियो के बाद टेलीविजन ने राजनीतिक संवाद के क्षेत्र में बड़े बदलाव किए

रेडयो के बाद आए टेलीविजन ने राजनीतिक संवाद के क्षेत्र में लंबे समय बाद बड़े बदलाव किए। विजुअल का होना टीवी माध्यम की सबसे बड़ी ताकत बना। यही वजह है कि राजनीतिक दलों के बीच बहस और चर्चा के लिहाज से टेलीविजन की उपस्थिति दशकों से बनी हुई है। ऐसा बिलकुल नहीं है कि संचार और संवाद के नए माध्यमों के विकास ने पहले से चले आ रहे माध्यमों को अप्रासंगिक कर दिया हो।

सोशल मीडिया के बाद भी प्रिंट, रेडियो और टेलीविजन की उपयोगिता बनी हुई है

आज जब हम सोशल मीडिया जैसे त्वरित और सर्वसुलभ जनमाध्यम के दौर में प्रवेश कर चुके हैं तब भी प्रिंट, रेडियो और टेलीविजन की उपयोगिता बनी हुई है। चुनावी कवरेज के दौरान कौन बनेगा सीएम या पीएम जैसे रोचक कार्यक्रमों और एक्जिट पोल आदि के प्रति उत्सुकता ने समाचार चैनलों को प्रासंगिक बनाए रखा है। रेडियो एफएम भी युवाओं के बीच खासा लोकप्रिय है। बदलते परिवेश के लिहाज से समाचार पत्रों ने भी अपने कलेवर में समयानुकूल परिवर्तन किए हैं।

ट्वीट और फेसबुक पोस्ट अब अन्य संचार माध्यमों के लिए सूचना स्रोत बनने लगे 

इसके बावजूद यह स्वीकार करने में किसी को गुरेज नहीं होना चाहिए कि डिजिटल तकनीक ने संचार क्षेत्र के सभी पुराने माध्यमों को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। ट्वीट और फेसबुक पोस्ट अब अन्य संचार माध्यमों के लिए सूचना स्रोत बनने लगे हैं। हालांकि इन माध्यमों पर हो रही बहस और विमर्श स्थाई विचार के रूप में स्थापित होने के बजाय ज्यादातर त्वरित क्रिया-प्रतिक्रिया तक ही सीमित होते हैं।

कोरोना संकट के चलते डिजिटल मीडिया एक नए विकल्प के रूप में उभरा

कोरोना संकट की वजह से पैदा हुई परिस्थिति में संवाद और संपर्क की पद्धति में बदलाव के व्यापक संकेत दिखने लगे हैं। शारीरिक दूरी के अनुशासन और जनसंवाद की जरूरत के बीच संतुलन के लिहाज से डिजिटल मीडिया एक नए विकल्प के रूप में उभरा है।

राजनीति दल के रूप में डिजिटल माध्यम एक कारगर उपकरण बना

एक बहुदलीय लोकतांत्रिक देश होने के नाते कठिन परिस्थिति में भी राजनीतिक दलों से संवाद की अपेक्षा होती है। एक ऐसे कठिन दौर में जब शारीरिक दूरी के अनुशासन और जनसंवाद की जरूरत के बीच संतुलित रास्ता निकालने की बात आई तो एक राजनीति दल के रूप में हमारे लिए डिजिटल माध्यम एक कारगर उपकरण बना। गृहमंत्री अमित शाह की बिहार जनसंवाद रैली ने डिजिटल माध्यम के नए अनुभवों से हमें परिचित कराया।

डिजिटल माध्यम से हुई जनसंवाद रैली में करोड़ों लोग जुड़े

डिजिटल माध्यम से हुई जनसंवाद रैली में हजारों स्थानों से करोड़ों लोग सहजता के साथ जुड़े। यह प्रयोग इस मायने में भी अहम है कि इसमें कम समय और कम संसाधन में ही एक बड़ा जनसंवाद कार्यक्रम पूरा हो गया। चूंकि जनसभाओं में बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं तो उनकी सुविधा के लिए बैठने की व्यवस्था, टेंट सहित अनेक तैयारियां महत्वपूर्ण होती हैं।

कोरोना काल में डिजिटल नवाचार ने जनसंवाद के नए विकल्पों से अवगत कराया

एक जनभागीदारी वाले लोकतंत्र में लोगों का जनसंवाद में उत्साह के साथ आना और शामिल होना स्वाभाविक भी है, किंतु कोरोना काल की परिस्थिति में डिजिटल नवाचार ने जनसंवाद के नए विकल्पों से अवगत कराया है। नवाचार की इस सफलता ने भविष्य में इसकी उपयोगिता को भी साबित किया है।

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल तकनीक की समझ अधिक विकसित हुई

यह इसलिए भी आसान हुआ है, क्योंकि गत वर्षों में भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल तकनीक की समझ अधिक विकसित हुई है। इसका प्रमुख कारण इसकी सुलभता है। निश्चित ही इससे देश के लोकतंत्र में जनभागीदारी को और मजबूती मिलेगी। जनसंवाद के एक नए तकनीक संपन्न युग में प्रवेश करते हुए भारत की राजनीतिक संवाद शैली में भी बदलाव स्वाभाविक है। वर्तमान में हो रहे बदलावों से देश की जनशक्ति का राजनीतिक दलों से संवाद अधिक सरल और सहज होगा।

भविष्य में राजनीतिक दलों के संवाद में डिजिटल माध्यमों के नवाचारों के प्रति स्वीकार्यता बढ़ सकती है

संभव है कि भविष्य में राजनीतिक दलों के संवाद में बैनर, पोस्टर, पर्चे आदि का प्रयोग कम हो और डिजिटल माध्यमों के नवाचारों के प्रति नए अभ्यास की स्वीकार्यता बढे़। आज हम जिन बदलावों से गुजर रहे हैं वे भविष्य में हमारी कार्यशैली का हिस्सा बनें तो आश्चर्य नहीं। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तेजी से हो रहे तकनीकी बदलावों की बदौलत देश राजनीतिक जनसंवाद के एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है।

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