Jharkhand High Court Verdict: 20 साल के बेटे की हत्या के मामले में 88 साल के बुजुर्ग पिता को बड़ी राहत, 13 साल की कैद के बाद रिहाई के आदेश

रांची: झारखंड उच्च न्यायालय से एक मानवीय और बड़ा न्यायिक फैसला सामने आया है, जहां अपने ही 20 वर्षीय बेटे की चाकू घोंपकर हत्या करने के आरोपी 88 वर्षीय बुजुर्ग पिता को अदालत ने बड़ी राहत प्रदान की है। न्यायमूर्ति आनंद सेन और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा में संशोधन करते हुए इस पूरे मामले को हत्या की गंभीर धारा 302 के बजाय गैर-इरादतन हत्या यानी धारा 304 भाग-II के अंतर्गत माना है। खंडपीठ ने अपीलकर्ता की अत्यधिक वृद्धावस्था और उनके द्वारा जेल में पहले ही काटी जा चुकी करीब 13 लंबी साल की सजा की अवधि को ध्यान में रखते हुए, इस काटी गई अवधि को ही उनकी कुल सजा मानते हुए तत्काल प्रभाव से जेल से रिहाई का आदेश जारी कर दिया है।
बचाव पक्ष की ओर से एमिकस क्यूरी ने रखी दलील, अभियोजन पक्ष ने किया था विरोध
इस कानूनी लड़ाई के दौरान अपीलकर्ता गोमा गोप की पैरवी के लिए नियुक्त की गई एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) अधिवक्ता अल्पना वर्मा ने माननीय खंडपीठ के समक्ष पक्ष रखते हुए दलील दी कि अपीलकर्ता को केवल अंदेशों और शंकाओं के आधार पर इस मामले में झूठा फंसाया गया है। उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि अपीलकर्ता बिना किसी ठोस और पुख्ता आधार के इतने लंबे समय से सलाखों के पीछे जिंदगी बिता रहा है, इसलिए निचली अदालत के दोषसिद्धि के आदेश को खारिज कर उसे बरी किया जाए। इसके विपरीत, राज्य सरकार की ओर से उपस्थित अपर लोक अभियोजक तरुण कुमार ने इस याचिका का कड़ा विरोध करते हुए तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट का फैसला पूरी तरह से न्यायसंगत था, क्योंकि आरोपी ने अपने ही बेटे पर चाकू से वार किया था और पुलिस द्वारा घटनास्थल से खून से सनी मिट्टी तथा हत्या में प्रयुक्त चाकू भी बरामद किया गया था।
अदालत की मुख्य टिप्पणियां: अचानक हुए विवाद और आवेश में उठाया गया था कदम
मामले से जुड़े गवाहों और डॉक्टरों की मेडिकल रिपोर्ट का बारीकी से विश्लेषण करने के बाद खंडपीठ ने यह निष्कर्ष निकाला कि मृतक पुत्र पर चाकू से केवल एक ही बार प्रहार किया गया था। यह पूरी दुखद घटना अत्यधिक नशे की हालत में अचानक उपजे विवाद और आवेश के क्षण में घटी थी, जिसमें पहले से किसी की जान लेने का पूर्व नियोजित इरादा साबित नहीं होता है। अदालत ने माना कि यह पूरा प्रकरण भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 300 के अपवाद-4 के दायरे में आता है, जो अचानक भड़के गुस्से और बिना किसी क्रूरता के किए गए कृत्य से संबंधित है। यही वजह है कि इसे धारा 302 के अंतर्गत हत्या न मानकर गैर-इरादतन हत्या (धारा 304 Part-II) माना गया। अदालत ने इस बात पर भी विशेष गौर किया कि जब सीआरपीसी की धारा 313 के तहत आरोपी का बयान दर्ज हुआ था, तब उसकी उम्र लगभग 80 वर्ष थी और आज वह लगभग 88 वर्ष की आयु का हो चुका है, जो पिछले करीब 13 वर्षों से लगातार कानूनी कार्रवाई और कैद का सामना कर रहा है। इन तमाम परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने उसे किसी अन्य मामले में वांछित न होने की स्थिति में तुरंत रिहा करने के निर्देश दिए। इसके साथ ही, अदालत ने उत्कृष्ट कानूनी सहायता प्रदान करने वाली एमिकस क्यूरी अधिवक्ता अल्पना वर्मा के प्रयासों की सराहना करते हुए झारखंड हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी (HCLSC) को उन्हें 7,500 रुपये का पारिश्रमिक देने का भी निर्देश दिया है।
क्या था पश्चिम सिंहभूम के मुफस्सिल थाना क्षेत्र से जुड़ा यह पूरा पुराना मामला?
यह सनसनीखेज और पारिवारिक त्रासदी से जुड़ा मामला मूल रूप से झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के मुफस्सिल थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले छोटा लगिया गांव का है। घटना 21 नवंबर 2013 की है, जब अपीलकर्ता गोमा गोप अपने घर पर स्थानीय पारंपरिक शराब (हड़िया) के नशे में धुत था। जब उसके 20 वर्षीय जवान बेटे प्रताप गोप ने उसे इतनी अधिक मात्रा में शराब पीने से मना किया और इस पर ऐतराज जताया, तो दोनों पिता-पुत्र के बीच तीखी कहासुनी शुरू हो गई। गुस्से और आवेश में आकर पिता ने सब्जी काटने वाले चाकू से अपने ही बेटे के पेट पर जोरदार वार कर दिया, जिससे गंभीर रूप से घायल होकर उसकी मौके पर ही मौत हो गई थी। इस मामले में चाईबासा के मुफस्सिल थाने में 22 नवंबर 2013 को एफआईआर संख्या 120/2013 दर्ज की गई थी, जिसके बाद चाईबासा की एक अदालत ने वर्ष 2018 में आरोपी पिता को उम्रकैद और 5,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसी फैसले को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में अपील दायर की गई थी, जिस पर अब हाईकोर्ट ने यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।





