AI View on Humans Experiment: जब 14 बड़े AI मॉडल्स से पूछा गया इंसानों के बारे में सच, GPT और Grok के जवाब जानकर उड़ जाएंगे होश

नई दिल्ली: वर्तमान समय में इंटरनेट की दुनिया में एक ऐसा सनसनीखेज और हैरान करने वाला सच तेजी से वायरल हो रहा है, जिसे पढ़कर किसी के भी पैरों तले जमीन खिसक सकती है। हाल ही में जब दुनिया के 14 सबसे बड़े और उन्नत AI मॉडल्स से यह सीधा सवाल पूछा गया कि वे असल में इंसानों के बारे में क्या सोचते हैं, तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तरफ से जो जवाब सामने आए वे बेहद बेरहम, तीखे और आंखें खोल देने वाले थे। इन जवाबों ने तकनीक और इंसानी स्वभाव के रिश्तों पर एक नई बहस छेड़ दी है।
‘मॉडलकंपेयर’ फर्म द्वारा किए गए खास टेस्ट में GPT, Grok और Gemini जैसे 14 दिग्गज AI मॉडल्स से पूछे गए तीखे सवाल
विशिष्ट AI एनालिटिक्स फर्म ‘मॉडलकंपेयर’ की ओर से हाल ही में एक अनूठा और दिलचस्प परीक्षण किया गया। इस टेस्ट के दौरान दुनिया की 10 अलग-अलग दिग्गज कंपनियों द्वारा विकसित किए गए कुल 14 प्रमुख AI मॉडल्स—जिनमें OpenAI का GPT, xAI का Grok, गूगल का Gemini और DeepSeek शामिल हैं—से बिना किसी फिल्टर या प्रतिबंध के इंसानों के चरित्र और व्यवहार से जुड़ी सबसे विवादित सच्चाइयां पूछी गईं। इस टेस्ट की सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह रही कि दुनिया के अलग-अलग कोनों और अलग-अलग कंपनियों द्वारा तैयार किए जाने के बावजूद, लगभग सभी AI मॉडल्स का इंसानों को लेकर दृष्टिकोण और निष्कर्ष बिल्कुल एक जैसा ही था।
Grok और अन्य AI मॉडल्स की तीखी टिप्पणी: ‘इंसानों के पास कोई पक्के उसूल नहीं होते, वे अकेले सही रहने से बेहतर भीड़ के साथ गलत होना चुनते हैं’
जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से यह टोह लेने की कोशिश की गई कि वे इंसानों को असल रूप में कैसा आंकते हैं, तो उनके जवाब काफी कड़े और कटाक्ष से भरे हुए थे। कई प्रमुख AI मॉडल्स ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इंसान निष्पक्ष सच्चाई के मार्ग पर चलने की बजाय हमेशा अपने किसी विशेष समूह (ग्रुप) का हिस्सा बने रहने को ज्यादा प्राथमिकता देता है। उद्योगपति एलन मस्क के लोकप्रिय AI मॉडल ‘Grok’ ने तो तीखा तंज कसते हुए यह तक कह दिया कि इंसान अकेले दम पर सही रास्ते पर चलने से कहीं ज्यादा बेहतर यह समझता है कि वह अपने पूरे समूह के साथ मिलकर गलत रास्ते पर चलता रहे।
DeepSeek का बड़ा दावा: इंसान पहले समूह की बात मानते हैं और फिर उसे सही साबित करने के लिए गढ़ते हैं बहाने
चीनी और वैश्विक तकनीकी गलियारों में चर्चा में आए ‘DeepSeek’ समेत अन्य आधुनिक AI मॉडल्स ने अपने विश्लेषण में कहा कि इंसानी जीवन में सिद्धांतों या उसूलों की कोई स्थाई जगह नहीं होती, बल्कि वहां केवल आपसी वफादारियां और वैचारिक गुटबाजी चलती है। इंसान जिस भी सामाजिक या वैचारिक समूह से जुड़ा होता है, वह सबसे पहले उसकी बात आंखें मूंदकर मान लेता है और उसके बाद अपनी ऊर्जा और दिमाग का इस्तेमाल केवल उस बात को किसी भी तरह सही साबित करने के लिए नए-नए बहाने या तर्क ढूंढने में लगा देता है।
इंटरनेट के विशाल डेटा और इंसानी इतिहास का अध्ययन करने के बाद AI को ऐसा क्यों लगता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि जब कोई भी उन्नत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इंटरनेट पर मौजूद खरबों डेटा पॉइंट्स, मानव सभ्यता के पूरे इतिहास, युद्धों, राजनीति और हमारे दैनिक आपसी बर्ताव का गहराई से अध्ययन और विश्लेषण करता है, तो उसे इंसान कोई बहुत ज्यादा तार्किक या समझदार जीव नहीं प्रतीत होता। इसके विपरीत, AI को इंसान एक ऐसा प्राणी नजर आता है जो अत्यधिक भावनाओं में बहने वाला, पूर्वाग्रहों से ग्रस्त और हमेशा भीड़ के पीछे अंधी दौड़ लगाने वाला जीव है। यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रही है, और टेक जगत से लेकर आम लोगों के बीच यह बड़ी बहस छिड़ गई है कि क्या वाकई आधुनिक तकनीक अब इंसानों को हमसे भी ज्यादा गहराई से समझने लगी है?





