रतलाम में जनसुनवाई की नई व्यवस्था पड़ी फीकी, अधिकारियों की फौज से कम पहुंचे आवेदक— भटकने को मजबूर आम जनता

रतलाम: मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में जिला प्रशासन द्वारा जनसुनवाई की व्यवस्था में किए गए बदलाव का असर जमीनी स्तर पर बेहद निराशाजनक नजर आ रहा है। हालात यह हैं कि जिला मुख्यालय के अलावा अन्य सात निर्धारित केंद्रों पर अपनी समस्याओं को लेकर पहुंचने वाले आवेदकों की संख्या काफी कम हो चुकी है। रतलाम नगर निगम, रतलाम ग्रामीण एसडीएम कार्यालय, जावरा एसडीएम कार्यालय और आलोट एसडीएम कार्यालय में मंगलवार को आयोजित होने वाली जनसुनवाई के दौरान स्थिति यह थी कि कई केंद्रों पर पहुंचने वाले कुल आवेदकों की संख्या दहाई का आंकड़ा भी पार नहीं कर सकी।
केंद्रों पर फरियादियों से ज्यादा नजर आए अधिकारी और कर्मचारी, कलेक्ट्रेट के बाहर कलेक्टर से मिलने के लिए भटकते दिखे निराश आवेदक
इन सात अलग-अलग जनसुनवाई केंद्रों पर तैनात अनुविभागीय अधिकारियों (SDM), तहसीलदारों और अन्य महत्वपूर्ण विभागों के अधिकारियों-कर्मचारियों की संख्या वहां आने वाले वास्तविक आवेदकों से काफी अधिक दिखाई दी। दूसरी ओर, जिला मुख्यालय पर आधिकारिक रूप से जनसुनवाई का आयोजन न होने के बावजूद बड़ी संख्या में परेशान लोग सीधे रतलाम कलेक्टर से मुलाकात करने की उम्मीद में उनके कक्ष के बाहर लंबी कतारों में खड़े नजर आए। अलग-अलग दफ्तरों के चक्कर काटने के बाद हताश होकर कलेक्ट्रेट पहुंचे कई फरियादियों ने प्रशासन की इस नई विकेंद्रीकृत व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं और कलेक्टर से न मिल पाने पर अपनी गहरी नाराजगी भी व्यक्त की है।
करीब ढाई महीने पहले कलेक्टर अजय कटेसरिया ने शुरू की थी व्यवस्था, सात अलग-अलग ब्लॉकों में बांटी गई थी जनसुनवाई
प्राप्त जानकारी के अनुसार, करीब ढाई महीने पहले रतलाम जिले की कमान संभालने वाले कलेक्टर अजय कटेसरिया ने पारंपरिक जिला मुख्यालय की जनसुनवाई व्यवस्था में परिवर्तन करते हुए जिले के विभिन्न ब्लॉकों में कुल 7 नए जनसुनवाई केंद्र स्थापित किए थे। इस नई व्यवस्था का उद्देश्य यह था कि स्थानीय ग्रामीण या शहरी क्षेत्र के लोग अपने ही क्षेत्र के केंद्र पर पहुंचकर आसानी से अपने आवेदन दे सकें। इन केंद्रों पर प्रत्येक मंगलवार को सुबह 11 से दोपहर 1 बजे के बीच क्षेत्रीय एसडीएम, तहसीलदार, नगरीय निकायों के कमिश्नर और सीएमओ को जनता की समस्याएं सुननी थीं, और इसके लिए तमाम विभागों के अमले को वहां मौजूद रहना था।
नई व्यवस्था से पूरी तरह असंतुष्ट नजर आ रही है आम जनता, जिला मुख्यालय पर सीधे कलेक्टर को आवेदन देने की कर रहे हैं मांग
प्रशासन द्वारा लागू की गई यह नई व्यवस्था आम जनता और दूर-दराज से आने वाले पीड़ितों को रास नहीं आ रही है। शुरुआत से ही इन नए जनसुनवाई केंद्रों पर बहुत कम संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। अधिकांश नागरिक ब्लॉक स्तर के अधिकारियों के पास जाने के बजाय सीधे जिला मुख्यालय पर पहुंचकर कलेक्टर को अपना आवेदन सौंपना चाहते हैं। हालांकि रतलाम कलेक्ट्रेट में अपर कलेक्टर (ADM) द्वारा आने वाले कुछ लोगों से आवेदन लिए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद आम आवेदक इस व्यवस्था से संतुष्ट दिखाई नहीं दे रहे हैं।
मीडिया ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आई सच्चाई, रतलाम नगर निगम और ग्रामीण कार्यालयों के रजिस्टरों में दर्ज मिले गिने-चुने आवेदन
मीडिया की टीम ने जब रतलाम शहर के नगर निगम सभा कक्ष में आयोजित जनसुनवाई का जायजा लिया, तो दोपहर 12 बजे तक के एंट्री रजिस्टर में एक भी नया आवेदन दर्ज नहीं हुआ था। जबकि उस कक्ष में एसडीएम शहर तरुण जैन, कमिश्नर अनिल भाना समेत लगभग 20 से अधिक विभिन्न विभागों के अधिकारी और कर्मचारी अपनी कुर्सियों पर बैठे हुए थे। दोपहर 1 बजे तक चलने वाली इस जनसुनवाई में बमुश्किल 10 से 15 लोग ही अपनी फरियाद लेकर पहुंचे। यही हाल रतलाम ग्रामीण एसडीएम कार्यालय का भी था, जहां ग्रामीण एसडीएम आर्ची हरित और तहसीलदार सहित एक दर्जन से अधिक कर्मचारी मौजूद थे, लेकिन दोपहर 12:30 बजे तक केवल 5 आवेदन ही रजिस्टर में दर्ज हो पाए थे। इसी तरह जावरा एसडीएम कार्यालय में दोपहर 1 बजे तक कुल 9 आवेदन ही प्राप्त हुए थे।
आलोट और कलेक्ट्रेट परिसर का भी रहा यही हाल, क्षेत्रीय व्यवस्था से परेशान होकर जिला मुख्यालय पहुंच रहे हैं फरियादी
आलोट एसडीएम कार्यालय में भी स्थिति अन्य केंद्रों जैसी ही बनी हुई थी। वहीं दूसरी ओर, रतलाम कलेक्टर कार्यालय परिसर में एडीएम बृजेंद्र रावत द्वारा वहां पहुंचने वाले कुछ फरियादियों के आवेदन स्वीकार किए जा रहे थे, और दोपहर 1 बजे तक वहां 19 आवेदन प्राप्त हो चुके थे। कलेक्टर अजय कटेसरिया के कक्ष के बाहर खड़े दो दर्जन से अधिक आवेदक ऐसे थे जो अपने-अपने अनुविभागीय क्षेत्रों में आयोजित होने वाली जनसुनवाई व्यवस्था से पूरी तरह असंतुष्ट होकर सीधे मुख्यालय का दरवाजा खटखटाने पहुंचे थे। इस पर सफाई देते हुए एडीएम बृजेंद्र रावत ने कहा कि जिले में सभी केंद्र सुचारू रूप से काम कर रहे हैं, और जो लोग वहां से असंतुष्ट होकर यहां आते हैं, उनके आवेदन भी प्रशासनिक स्तर पर लिए जा रहे हैं।
दर-दर भटकने और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर आम लोग, न्याय के लिए गुहार लगा रहे पीड़ित
अपनी समस्याओं को लेकर जनसुनवाई में पहुंचे कई लोगों ने अपना दर्द बयां किया। रतलाम शहर के रहने वाले एक आवेदक खेमराज ने बताया कि उनके निजी प्लाट पर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा अवैध कब्जा कर लिया गया है, जिसकी शिकायत लेकर वे पहुंचे थे, लेकिन उन्हें सिर्फ नगर निगम के चक्कर काटने के लिए कह दिया गया जहाँ कोई समाधान नहीं मिला। एक अन्य आवेदक युसूफ खान ने बताया कि उनकी पत्नी के नाम के प्लाट का फर्जी तरीके से नामांतरण कर लिया गया है, जिसके लिए वे पहले कलेक्ट्रेट गए, फिर उन्हें निगम भेजा गया और अंत में पुलिस अधीक्षक कार्यालय जाने की सलाह दी गई, लेकिन कहीं भी उनका आवेदन ठीक से स्वीकार नहीं किया गया। इसी प्रकार मिड डे मील का भोजन तैयार करने वाले एक स्वयं सहायता समूह के संचालक पिछले 4 महीने से अपने बकाए भुगतान की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन तीन बार जनसुनवाई में आने के बावजूद उनकी कोई सुध लेने वाला नहीं है।
प्रशासनिक स्तर पर पुनर्विचार की जरूरत, अधिकारियों की भारी फौज और संसाधनों के बीच खाली पड़े हैं जनसुनवाई केंद्र
बहरहाल, रतलाम जिला प्रशासन द्वारा लागू की गई जनसुनवाई की यह नई विकेंद्रीकृत व्यवस्था जनता के बीच पूरी तरह विफल साबित होती दिख रही है। स्थिति यह है कि जनसुनवाई के लिए बनाए गए इन 7 केंद्रों पर आम नागरिकों की तुलना में सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की संख्या कहीं अधिक नजर आती है। जनता की समस्याओं के त्वरित निराकरण के दावे कागजों तक सीमित रह गए हैं, और लोग आज भी न्याय पाने के लिए अलग-अलग दफ्तरों के बीच धक्के खाने को मजबूर हैं।





