विश्व संगीत दिवस: छत्तीसगढ़ में 175 तरह के जनजातीय वाद्य यंत्रों का अनोखा संसार

भिलाई शहर के मरोदा में एक ऐसा संग्रहालय है, जहां 175 तरह के ऐसे वाद्य यंत्र हैं, जो आपको शायद ही कहीं और देखने को मिलें। ऐसे दुर्लभ वाद्य यंत्रों के शौकीन और संग्राहक रिखी क्षत्रिय 1985 से इन यंत्रों का संग्रहण कर रहे है। कुछ वाद्य तो ऐसे हैं जो चौंकाते हैं। जैसे शेर की आवाज निकालने वाला वाद्य और परिंदों की तरह चहचहाने वाले छोटे-छोटे यंत्र। इस अनोखे संसार को सजाने वाले रिखी क्षत्रिय के पिता रामायण मंडली के मुखिया थे। इस नाते मंडली का सामान मुखिया के घर ही रखा जाता था। घर में रखे वाद्य यंत्र नन्हे रिखी को आकर्षित करते थे। प्रतिदिन वाद्य यंत्रों को देखना, उसके बारे में नई-नई जिज्ञासाओं के साथ उसे छूते थे, बजाते थे और ऐसे ही धीरे-धीरे वे यंत्रों से जुड़ते चले गए।
1985 से शुरू हुआ वाद्य यंत्र संजोने का सिलसिला अभी भी जारी
1985 से शुरू हुआ वाद्य यंत्र संजोने का सिलसिला अभी भी जारी है। पेशे से भिलाई इस्पात संयंत्र (बीएसपी) के सेवानिवृत्त और लोक कलाकार रिखी क्षत्रिय बताते है कि 1984-85 में केंद्र सरकार का प्रोजेक्ट आया था। इसमें आदिवासियों की संस्कृति का अध्ययन करना था। संगीत का नेतृत्व रिखी के कंधों पर था। तब उन्होंने शोध किया और उसके साथ ही वाद्य यंत्रों के प्रति उनकी दीवानगी बढ़ती चली गई।
कुहुकी है डेढ़ इंच का सबसे छोटा वाद्य यंत्र
रिखी के संग्रहालय में सबसे छोटा यंत्र ‘कुहुकी’ है। इसी के नाम से उन्होंने संग्रहालय का नाम ‘कुहुकी कलाग्राम’ रखा है। पहले घर के हॉल में वाद्य यंत्रों को रखना शुरू किया, लेकिन जल्दी ही वह छोटा पड़ने लगा। इसके बाद उन्होंने बड़ा हॉल बनवाया। ‘कुहुकी’ संग्रहालय का सबसे छोटा (डेढ़ इंच) का वाद्य यंत्र है, जिससे कोयल की आवाज निकालती है। संग्राहलय में सबसे बड़ा माड़िया वाद्य यंत्र है जो सवा पांच फीट लंबा होता है। इसकी गोलाई डेढ़ फीट होती है। ‘कुहुकी कलाग्राम’ में हूबहू शेर की आवाज निकलने वाली घुमरा भी मौजूद है।






