ब्रेकिंग
BSF Attari Border News: अटारी सीमा पर रिट्रीट सेरेमनी का नया शेड्यूल जारी; शाम 5:30 बजे शुरू होगी पर... Batala Viral Video: गुरु नानक देव जी के विवाह पर्व में ट्रैक्टर स्टंट पड़ा भारी; तेज रफ्तार में पलटा... Dubai Visa Fraud: 90 हजार में दुबई भेजा, छीना पासपोर्ट और मुर्गीखाने में रखा! जालंधर के पीड़ित ने सु... Amritsar Flooding Alert: तरनतारन रोड के पास नहर टूटने से मचा हड़कंप; मिट्टी की बोरियों से दरार भरने ... Punjab Gold Silver Price Today: पंजाब में उछले सोना-चांदी के दाम; जालंधर में 24 कैरेट सोना ₹1.58 लाख... Ferozepur Central Jail: केंद्रीय जेल फिरोजपुर में फिर चला तलाशी अभियान; 10 और मोबाइल फोन बरामद, कैदि... Etah Fake University Scam: एटा में चायवाले के नाम पर चल रही थी फर्जी यूनिवर्सिटी; भेद खुला तो प्रिंस... Bihar Flood Relief: सीएम सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री राहत कोष में दान दी एक महीने की सैलरी; नितिन नब... Durg News Today: फेसबुक पोस्ट पर बवाल; भिलाई-3 थाने पहुंचे कांग्रेसी, भाजयुमो नेता पर FIR और गिरफ्ता... Agra Mahakumbh Ambikapur: सीएम विष्णु देव साय ने किया 'अग्र महाकुंभ 2026' का शुभारंभ; अग्रवाल समाज क...
देश

किसान आंदोलन से उपजे हालात को देखते हुए देश के दुश्मनों को मतभेदों का लाभ उठाने से रोकें

किसी भी देश के नेताओं के लिए यह स्वाभाविक है कि वे राजनीति में सक्रिय रहकर अपने दल, कार्यक्रम और विचारधारा को प्रोत्साहन दें। इतिहास ने हमें यह सबक सिखाया है कि जब भी राजनीतिक वर्ग ने अपने संकीर्ण हितों की र्पूित के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा हितों की अनदेखी की तो देश को उसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ा। कई बार तो यह कीमत सदियों तक चुकाई गई। हमारी कमजोरियों का लाभ उठाकर देश के दुश्मन अगर अपना पूरा नियंत्रण स्थापित नहीं कर पाए तो भी वे उसे और कमजोर करने में सफल रहे। भारत में ऐसी स्थितियों के तमाम उदाहरण भरे पड़े हैं। भारतीय इतिहास का सबक स्पष्ट है कि चाहे कोई राजनीतिक दल सत्तारूढ़ हो या फिर विपक्ष में, उसे अपने राजनीतिक एजेंडे की र्पूित करने के लिए किसी भी सूरत में देश के सुरक्षा हितों को तिलांजलि नहीं देनी चाहिए। मैं यह बात इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि फिलहाल देश सुरक्षा चुनौतियों के जोखिम से जूझ रहा है। इन चुनौतियों को देखते हुए राजनीतिक वर्ग के लिए यह आवश्यक है कि वह सुरक्षा चुनौतियों पर अपने राजनीतिक मतभेद भुलाकर किसी आम सहमति पर पहुंचे। व्यापक स्तर पर हो रहे वैचारिक टकराव के बावजूद सुरक्षा संबंधी इन मुद्दों का समाधान निकालना ही होगा, क्योंकि इन मुद्दों पर भारत के भविष्य को लेकर देश-विदेश में सवाल उठ रहे हैं।

सामाजिक एवं आर्थिक मुद्दा सुरक्षा की चुनौती न बन पाए

राजनीतिक वर्ग को सामाजिक एवं आर्थिक मुद्दों को इस प्रकार संभालना चाहिए कि वे सुरक्षा की चुनौती का सवाल न बन जाएं। किसानों के मौजूदा आंदोलन के संदर्भ में यह बहुत प्रासंगिक है। राजनीतिक वर्ग को यह सुनिश्चित करना होगा कि देश के दुश्मनों को इसमें दखल देकर लाभ उठाने का कोई अवसर न मिले। इसे अनदेखा न किया जाए कि ब्रिटेन और कनाडा के साथ ही कई देशों में कुछ समूह खालिस्तान की मुहिम के लिए सक्रिय हो गए हैं। इन देशों में मुख्यधारा की राजनीति के कई नेता भी किसान आंदोलन पर अनुचित टिप्पणियां कर चुके हैं। भारत सरकार ने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप वाली इन टिप्पणियों को खारिज करके उचित ही किया।

भारतीय सिख देशभक्त हैं लेकिन अनदेखी नहीं की जा सकती

किसान आंदोलन से उपजे हालात को देखते हुए भारतीय राजनीतिक वर्ग को इन देशों से अधिक पाकिस्तान की भूमिका पर ध्यान देना होगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीय सिख देशभक्त हैं और राष्ट्र के प्रति उनका अमूल्य योगदान है, जो निरंतर जारी है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पाकिस्तान हमेशा से भारतीय सिख समुदाय को बरगलाने के प्रयास में जुटा रहा है। तमाम पाकिस्तानी विद्वान और सामरिक विशेषज्ञ मानते हैं कि विभाजन के दौरान सिखों को निशाना बनाना ऐतिहासिक गलती थी और यदि केवल हिंदुओं पर ही हमला किया जाता तो शायद सिखों ने पाकिस्तानी इलाकों से पलायन न किया होता। इस प्रकार हिंदुओं के खिलाफ मुस्लिमों और सिखों की मजबूत दोस्ती गांठी जा सकती थी।

पाकिस्तान सिखों को साधने की हरसंभव तिकड़म आजमा रहा है

पाकिस्तानी विद्वान हिंदुओं और सिखों के बीच चले आ रहे रोटी और बेटी के रिश्तों के बावजूद ऐसी सोच रखते हैं। पाकिस्तानियों के ऐसे विचारों को अनदेखा नहीं किया जा सकता, क्योंकि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियां खालिस्तान सहित तमाम अन्य मुद्दों के माध्यम से सिखों को साधने की हरसंभव तिकड़में आजमा रही हैं। इस संदर्भ में मैं अपने राजनयिक दौर के कुछ अनुभव भी साझा करना चाहूंगा।

पाकिस्तान खालिस्तान को लेकर दुष्प्रचार करता है

मैंने जब भी पाकिस्तानियों से पूछा कि जब दोनों देशों के बीच पंजाब सीमा पर कोई विवाद नहीं है तो फिर वे क्यों खालिस्तानी मुहिम का समर्थन करते हैं? इस पर उनका जवाब हमेशा गोलमोल रहता था। मैंने उन्हेंं बताया कि भारत इससे वाकिफ है कि तीर्थयात्रा के लिए पाकिस्तान जाने वाले सिख जत्थों के समक्ष वे खालिस्तान को लेकर दुष्प्रचार करते हैं। आखिर जब तमाम सिखों को यह नागवार गुजरता है तब फिर वे अपनी आदत से बाज क्यों नहीं आते? इस सवाल का भी उनके पास कोई सीधा जवाब नहीं होता था। यह किसी से छिपा नहीं कि कई खालिस्तानी समर्थक पाकिस्तान में शरण लिए हुए हैं।

सरकार और विपक्ष किसान आंदोलन का ठोस समाधान निकालें

जब पाकिस्तानी राजनयिकों का इस ओर ध्यान दिलाया जाता तो अधिकांश इससे इन्कार करते और या फिर चुप्पी साध लिया करते। इससे जाहिर होता है कि भारत की परेशानी बढ़ाने का पाकिस्तान कोई अवसर नहीं छोड़ेगा। किसी भी देश के राजनीतिक वर्ग को यह समझना चाहिए कि दुश्मनों को उसके सामाजिक एवं आर्थिक मतभेदों का लाभ उठाने का कोई मौका न मिले। मैं एक बार फिर दोहराना चाहूंगा कि सिखों की वफादारी असंदिग्ध है, लेकिन पाकिस्तानी एजेंसियां बहुत शातिर हैं। उन्हेंं किसी साजिश के लिए कोई अवसर न दिया जाए। सरकार और विपक्ष के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे किसान आंदोलन का मिलकर कोई ठोस समाधान निकालें।

जब बात भारत के सुरक्षा हितों की आती है तो सभी राजनीतिक मतभेद किनारे कर दिए जाते हैं

राजनीतिक वर्ग को दुनिया को यही संदेश देना चाहिए कि जब बात भारत के सुरक्षा हितों की आती है तो सभी राजनीतिक मतभेद किनारे कर दिए जाते हैं। वर्ष 1994 में ऐसा ही एक अवसर आया था, जब संसद ने दुनिया को संदेश देने के लिए सर्वानुमति से संकल्प पारित किया था कि जम्मू-कश्मीर में अपने हितों को लेकर भारत कभी कोई समझौता नहीं करेगा। फिलहाल वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर चीन का रवैया भी लगातार आक्रामक बना हुआ है। उससे सैन्य एवं कूटनीतिक वार्ता जारी है, लेकिन यह सवाल अभी भी जस का तस बना हुआ है कि क्या वह गत वर्ष अप्रैल वाली स्थिति की ओर वापस लौटेगा? किसी भी सूरत में भारत 1998 की अपनी उस नीति पर कायम नहीं रह सकता, जो एलएसी पर शांति सुनिश्चित करने पर आधारित है।

चीन और पाकिस्तान के नापाक इरादों के कारण बढ़ती सुरक्षा चुनौतियां

चीन की गतिविधियों ने फिर से दर्शा दिया है कि उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। ऐसे में राष्ट्रीय सहमति के आधार पर चीन को लेकर नए सिरे से दृष्टिकोण और नीति बनानी होगी। यह दृष्टिकोण साथ-साथ विकास की गुंजाइश जैसे किसी मुगालते के बजाय वास्तविकता पर आधारित होना चाहिए। चीन और पाकिस्तान के नापाक इरादों के कारण बढ़ती सुरक्षा चुनौतियां और तेजी से बदलते वैश्विक ढांचे और कोविड-19 जैसी महामारी के कारण बदलते समीकरण जैसे मसले हमारे राजनीतिक वर्ग की प्राथमिकता में होने चाहिए। इसका यही अर्थ है कि हमें किसान आंदोलन का तत्काल समाधान निकालना होगा।

Related Articles

Back to top button