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मध्यप्रदेश

मकर संक्रांति पर पतंगबाजी का क्रेज, लेकिन चाइनीज मांझे का खाैफ भी… इस बीच जारी है कोडवर्ड का खेल

ग्वालियर। पतंगबाजी का शाैक चायनीज मांझे के कारण खाैफ में बदल गया है। यह चाइनीज मांझा कई इलाकों में लाेगाें की जान ले चुका है, ताे हजारों पक्षी इसके शिकार बन चुके हैं। अब यह मांझा सरकारी विभागों के लिए भी टेंशन बन चुका है।

इससे उपभोक्ताओं काे, ताे परेशानी होती ही है, साथ ही लाइन फाल्ट होने से आर्थिक नुकसान भी होता है। ऐसे में बिजली कंपनी, रेलवे के साथ ही नगर निगम ने भी पतंगबाजी में चाइनीज मांझे का प्रयाेग नहीं करने की अपील की है।

प्रशासन लगातार मार रहा छापे

  • प्रशासन की टीम भी पतंग विक्रेताओं के यहां छापामार कार्रवाई कर चाइनीज मांझे काे जब्त कर रही है। हालांकि धरपकड़ बढ़ने के बाद अब कोड वर्ड बताने पर ही चाइनीज मांझा मिल रहा है।
  • दरअसल चाइनीज मांझा कहने काे चाइनीज है, लेकिन यह बनता भारत में ही है। पतंग विक्रेताओं के मुताबिक, यह मांझा बैंगलुरु से आता है। हालांकि धरपकड़ तेज हाेने के बाद अब मांझे से लेबल उतार दिया गया है।
  • इससे कंपनी की पहचान मुश्किल है। साथ ही अब यह मांझा खुलेआम नहीं बेचा जा रहा है। काेई पतंगबाज जब प्लास्टिक काेड वर्ड का प्रयाेग करता है, तभी यह मांझा निकाला जाता है।

चायनीज मांझे और सामान्य मांझे में अंतर

    • चाइनीज मांझा: इसमें कांच के टुकड़े, मेटल, एलुमिनियम आक्साइड के टुकड़े, लेड का प्रयाेग हाेता है। इन सब सामग्री के साथ लाेहे के बुरादे काे गाेंद में मिलाकर मांझे पर चढ़ाया जाता है। इसमें कैमिकल का भी प्रयाेग हाेता है। इतना ही नहीं चायनीज मांझा हाथ से आसानी से टूटता नहीं है, प्रयास करने पर हाथ कट जाते हैं। इससे 1-2 किलाे वजन तक उठाया जा सकता है।
    • सामान्य मांझा: यह सूती धागे से तैयार हाेता है। इसे बरेली का मांझा कहा जाता है। इसमें लकड़ी के लट्ठाें में एक छाेर से दूसरे छाेर तक सूती धागा लपेटा जाता है। इसके बाद धागे काे पके हुए चावल, गाेंद, पीसा हुआ शीशा, ईसबगाेल मिलाकर लुगदी तैयार की जाती है। इस लुगदी काे धागे पर रगड़ा जाता है।
    • रंगीन मांझा: ग्वालियर में सूती धागे के आगे कुछ मांझा लगाकर पतंग उड़ाई जाती है। जबकि मालवा में कुछ इलाकों में पूरा मांझा रंगीन हाेता है। इसे बनाने के लिए सूती धागे का एक छोर लेकर रंग में डुबोया जाता है। धागा जब गीला हाे जाता है ताे आगे ट्यूबलाइट और बल्ब के टुकड़ों के चूरे काे पीसकर मजबूत चमड़े में पकड़कर इसे आगे निकाला जाता है, जिससे इस पर कांच चिपक जाता है।

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