खास मिशन में जुटी अमेरिका की खुफिया एजेंसियां, विश्वभर में कोरोना से हुई मौत के आंकड़ो का लगाएंगी पता

नई दिल्ली। कोरोना वायरस के कारण दुनिया के बहुत से देशों से लगातार मौतों की खबर आ रही है, लेकिन कई देशों को लेकर यह आरोप लग रहा है कि वो मामलों की संख्या को कम करके दिखा रहे हैं। कई देशों में कोरोना के कारण कितनी मौतें हुई हैं, इसे लेकर जानकारियां भी सामने आ रही हैं। हालांकि यह कहना मुश्किल है कि यह कितनी सही है। अब अमेरिका की खुफिया एजेंसियां इसका पता लगाने के लिए जुटी हुई हैं।
इसलिए पड़ी जरूरत
अमेरिकी अधिकारियों ने संक्रमण के मामलों की वास्तविक संख्या को लेकर चीन, उत्तर कोरिया और ईरान जैसे देशों के खिलाफ सवाल उठाया है। उदाहरण के लिए, उत्तर कोरिया में स्वास्थ्य को लेकर दुनिया में प्रति व्यक्ति सबसे कम खर्च किया जाता है, लेकिन यहां पर अभी तक वायरस से जुड़ा एक भी मामला सामने नहीं आया है।
त्रिस्तरीय सूचना तंत्र
अमेरिका के पूर्व नेशनल इंटेलीजेंस के डायरेक्टर जेम्स क्लैपर के अनुसार, ज्यादातर जानकारी नेशनल सेंटर फॅार मेडिकल इंटेलीजेंस के जरिए आ रही है। कोरोना वायरस किसी देश को कैसे प्रभावित कर रहा है, इसका सटीक चित्र देखने के लिए खुफिया विश्लेषण विभिन्न प्रकार के उपकरणों का प्रयोग करता है। इनमें सबसे मुख्य है ह्यूमन इंटेलीजेंस, सिग्नल इंटेलीजेंस और सैटेलाइट से प्राप्त तस्वीरें।
गलत आंकड़े
ईरान के पवित्र शहर कोम की गुरुवार को सैटेलाइट तस्वीरें जारी की गई हैं। यहां के एक कब्रिस्तान में दो लंबी खाइयों को खोदा गया है। यह वह शहर है, जो वायरस से सबसे ज्यादा प्रभावित शहरों में से एक है। साथ ही यह देश सूचनाओं के लिहाज से सबसे कम विश्र्वास वाले देशों में है। सोशल मीडिया पोस्ट और अन्य स्वतंत्र स्रोतों से मिली निर्धारित जानकारी से विशेषज्ञों का मानना है कि मौतों की संख्या कम बताई जा रही है। बीबीसी की पर्शियन सेवा ने वीडियो के जरिए बताया है कि नीले कपड़े में श्रमिक शवों को ले जा रहे हैं और दफना रहे हैं। जबकि अनाउंसर कह रहा है कि 80 से ज्यादा लोगों को जलाया गया है, लेकिन उन्होंने सिर्फ 34 मौतों के बारे में कहा है।
ह्यूमन इंटेलीजेंस मुश्किल
ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देशों में जासूसों द्वारा ह्यूमन इंटेलीजेंस काफी मुश्किल काम है। ऐसे में खुफिया एजेंसियों का अन्य संसाधनों जैसे सिग्नल इंटेलीजेंस की ओर झुकाव रहता है। यह समझना मुश्किल है कि कैसे एक देश संकट से मुकाबले के लिए अपने संसाधनों का दोहन करता है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के कार्य में अवरोध पैदा करता है।
पहले ही कर दी थी भविष्यवाणी
खुफिया एजेंसियों ने वायरस से लड़ने के लिए अमेरिकी सरकार के प्रयासों की मदद के बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा है। वार्षिक अवर्गीकृत रिपोर्ट उन चुनिंदा रास्तों में से हैं जिनके जरिए वे अपनी प्राथमिकताओं और विश्लेषण के बारे में जनता के साथ बात करते हैं। इसे वर्ल्डवाइटड थ्रेट एसेसमेंट कहा जाता है। पिछले जनवरी में, रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि अमेरिका और दुनिया फ्लू महामारी या संक्रामक बीमारी के बड़े पैमाने पर फैलने की चपेट में आएंगे,
जिसमें मृत्यु और विकलांगता की दर काफी बढ़ सकती है। साथ ही विश्र्व अर्थव्यवस्था को और अंतरराष्ट्रीय संसाधनों को प्रभावित करेगा।
इस साल नहीं आई रिपोर्ट
अभी तक रिपोर्ट का 2020 का संस्करण सामने नहीं आया है और खुफिया समुदाय ने सदन और सीनेट की खुफिया समितियों के समक्ष परंपरागत रूप से इसके साथ होने वाली खुली सुनवाई को आगे बढ़ाने पर जोर दिया है। पिछले साल की सुनवाई के बाद राष्ट्रपति ने नाराजगी जताई थी और ट्वीट किया कि उनके खुफिया प्रमुखों को स्कूल वापस जाना चाहिए। खुफिया अधिकारियों के बीच ऐसा कुछ भी करने की भूख नहीं है जो उन्हें और उनके काम को राष्ट्रपति के सामने बेहतर बना सकें।