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हरियाणा के छोटे शहरों के लिए पहली बार नई टाउन प्लानिंग नीति लागू: बिना लाइसेंस नहीं कटेंगे प्लॉट, बदल जाएगा विकास का मॉडल

चंडीगढ़: हरियाणा के छोटे शहरों में वर्षों से विकास का एक ऐसा बेतरतीब मॉडल चलता आ रहा था, जिसमें पहले खेतों को काटकर प्लॉट बेचे जाते थे, फिर कॉलोनियां बसती थीं और उसके उपरांत सड़क, पेयजल, सीवरेज व स्ट्रीट लाइट जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए आम जनता को सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते थे।

अनेक कॉलोनियां अवैध घोषित होती थीं और सरकारों को उन्हें नियमित करने हेतु विशेष नीतियां बनानी पड़ती थीं। अब मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के नेतृत्व में प्रदेश सरकार इस पूरी व्यवस्था को बदलने जा रही है। सरकार ने 76 नगर परिषदों और नगर पालिकाओं के लिए पहली बार अलग टाउन प्लानिंग नीति लागू की है, जिसका उद्देश्य छोटे शहरों में नियोजित, व्यवस्थित और टिकाऊ शहरी विकास सुनिश्चित करना है।

🏗️ छोटे शहरों के लिए पहली बार अलग प्लानिंग फ्रेमवर्क, बिना सरकारी लाइसेंस के डेवलपर नहीं काट सकेंगे प्लॉट

अब तक टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग की लाइसेंस प्रणाली मुख्य रूप से नियंत्रित क्षेत्रों और बड़े महानगरों तक ही सीमित थी।

नगर परिषद और नगर पालिका क्षेत्रों में स्पष्ट नियोजन व्यवस्था न होने के कारण अनियोजित कॉलोनियों का तेजी से विस्तार होता रहा। नई नीति इस बड़ी कमी को दूर करती है। अब इन 76 शहरी निकायों में कोई भी निजी डेवलपर सरकारी लाइसेंस के बिना कॉलोनी विकसित नहीं कर सकेगा। साथ ही, परियोजना को शुरुआत से ही निर्धारित शहरी मानकों के अनुरूप विकसित करना अनिवार्य होगा।

📐 अब केवल प्लॉट बेचने से नहीं चलेगा काम, 5 एकड़ भूमि और 10 मीटर चौड़ी अंदरूनी सड़कें होंगी अनिवार्य

नई नीति में डेवलपर की जवाबदेही स्पष्ट रूप से तय कर दी गई है। केवल भूमि के प्लॉट काटकर बेच देना अब पर्याप्त नहीं होगा।

नई व्यवस्था के अनुसार, कॉलोनी विकसित करने के लिए कम से कम 5 एकड़ भूमि होना आवश्यक होगा। मुख्य परियोजना तक 33 फुट चौड़ी संपर्क सड़क अनिवार्य रहेगी। इसके अलावा, कॉलोनी के भीतर की सभी सड़कें कम से कम 10 मीटर चौड़ी बनाई जाएंगी। पार्क, सार्वजनिक स्थल और अन्य सामुदायिक सुविधाएं स्वीकृत लेआउट के अनुसार पहले विकसित करनी होंगी।

💧 पहले नागरिक सुविधाएं, फिर बसेगी आबादी: सीवर नेटवर्क न होने पर लगाना होगा एसटीपी (STP)

नई टाउन प्लानिंग नीति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि नागरिक सुविधाओं को सीधे लाइसेंस प्रक्रिया से जोड़ दिया गया है।

डेवलपर को पेयजल, सीवरेज, वर्षा जल निकासी (Storm Water Drainage) और सड़क की व्यवस्था स्वयं सुनिश्चित करनी होगी। जहां जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग की जलापूर्ति उपलब्ध होगी, वहां से कनेक्शन लिया जाएगा। यदि किसी क्षेत्र में सीवर नेटवर्क उपलब्ध नहीं है, तो डेवलपर को आवश्यक क्षमता का सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) स्थापित करना अनिवार्य होगा, जिससे अधूरी सुविधाओं वाली कॉलोनियों पर रोक लगेगी।

🏠 किफायती आवास को मिलेगा बढ़ावा, 50 प्रतिशत प्लॉट 150 वर्गमीटर से कम क्षेत्रफल के होंगे

नई नीति मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए भी राहत लेकर आई है।

इसके तहत कुल प्लॉटों में कम से कम 50 प्रतिशत प्लॉट 150 वर्गमीटर या उससे कम क्षेत्रफल के होंगे, ताकि आम परिवारों को किफायती आवास उपलब्ध हो सके। पूरी परियोजना क्षेत्र का अधिकतम 65 प्रतिशत भाग आवासीय एवं व्यावसायिक उपयोग के लिए रखा जा सकेगा, जबकि व्यावसायिक (Commercial) गतिविधियों की सीमा अधिकतम 5 प्रतिशत निर्धारित की गई है।

💳 लाइसेंस प्रक्रिया और शुल्क हुए पारदर्शी, 10 रुपये प्रति वर्गमीटर तय की गई स्क्रूटनी फीस

नगर परिषद और नगर पालिका क्षेत्रों के लिए पहली बार लाइसेंस प्रक्रिया के साथ-साथ पारदर्शी शुल्क व्यवस्था भी तय कर दी गई है।

डेवलपर को ₹10 प्रति वर्गमीटर की स्क्रूटनी फीस, परिवर्तन शुल्क का 50 प्रतिशत, बाह्य विकास शुल्क (EDC) का 25 प्रतिशत तथा टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग की मौजूदा लाइसेंस दरों का 25 प्रतिशत शुल्क देना होगा। इससे पूरे प्रदेश में एक समान, निष्पक्ष और पारदर्शी व्यवस्था लागू होगी।

💬 “अवैध कॉलोनियों पर लगेगा प्रभावी अंकुश, छोटे शहरों को मिलेगा नया ढांचा”: शहरी स्थानीय निकाय मंत्री विपुल गोयल

शहरी स्थानीय निकाय मंत्री विपुल गोयल ने नई नीति का स्वागत करते हुए कहा कि, “यह नीति नगर परिषद और नगर पालिका क्षेत्रों में अनियोजित शहरी विकास पर प्रभावी अंकुश लगाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। अब कॉलोनी विकास को स्पष्ट नियमों, बुनियादी सुविधाओं और जवाबदेही से जोड़ा गया है। सड़क, पेयजल और सीवरेज के बिना कॉलोनियों के विकास को बढ़ावा नहीं मिलेगा। इससे किफायती आवास को प्रोत्साहन मिलेगा और छोटे शहरों में नियोजित विकास का नया ढांचा तैयार होगा।”

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