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चीन के दुस्साहस का जवाब: चीनी दुस्साहस को मात देने के लिए दूसरी ताकत पर निर्भरता राष्ट्रहित में नहीं

गलवन में हमारे 20 बहादुर जवानों के बलिदान ने समूचे देश को गुस्से से भर दिया है। इस घटना से हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान को चोट पहुंची है। अब भारत चीन के दुस्साहस का जवाब कैसे देता है, यह न केवल हमारे लिए महत्वपूर्ण होगा, बल्कि विश्व व्यवस्था पर भी अपना प्रभाव छोड़ेगा। मौजूदा समय में हमारे पास तीन रणनीतिक विकल्प हैं। पहला, हम दृढ़ राष्ट्रीय संकल्प के साथ चीन का डटकर मुकाबला करने का निश्चय करें और युद्ध छोड़कर सभी उपलब्ध राजनीतिक एवं कूटनीतिक विकल्पों का उपयोग करें। दूसरा, हम अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान की कीमत पर गैर-बराबरी वाले कथित दोस्ताना रिश्तों के झूले पर झूलते रहें और शांत बैठ जाएं। युद्ध में कूदने का तीसरा रास्ता 21वीं शताब्दी के इस परमाणु युग में हमारा अंतिम विकल्प ही हो सकता है। इससे पहले कि हम तीन विकल्पों में से कोई एक चुनें, कुछ मूलभूत बातें समझना आवश्यक है।

डोकलाम से गलवन तक चीन की मंशा एक जैसी

डोकलाम से गलवन तक चीन की मंशा लगभग एक जैसी रही है। डोकलाम संकट के दौरान मैंने चेताया था कि डोकलाम भारत और बाकी दुनिया के प्रति चीन की नई नीति का सूचक है, क्योंकि शी चिनफिंग का लक्ष्य राष्ट्रवादी उन्माद के सहारे खुद को माओ के समकक्ष खड़ा करना है। चीन को अपनी अर्थव्यवस्था की तेजी बनाए रखने के लिए ऐसे दोस्ताना विकासशील बाजारों की जरूरत है जहां उसके सरकारी बैंक बड़े पैमाने पर ऋण दे सकें।

विदेशी बाजारों में पैर पसारना चीन के आर्थिक विकास के लिए आवश्यक

चूंकि विदेशी बाजारों में पैर पसारना चीन के आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है इसलिए उसने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के जाल में तमाम अफ्रीकी और एशियाई देशों को फंसाया। बीते तीन वर्षों में चीन की इस पहल में शामिल देशों की संख्या सौ के करीब पहुंच गई है। इनमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल भी हैं। चीन की इस पहल से विकासशील देशों पर चीनी कर्ज का बोझ बढ़ा है और वे पूरी तरह उसके दबाव में आ गए हैं। चीन अपने अधिकांश पड़ोसियों को नाराज करने का भी कोई मौका नहीं छोड़ रहा।

या तो चीन की शर्तों पर समझौता करो या चीन की चुनौती स्वीकार करो

वह दक्षिण चीन सागर में वियतनाम, मलेशिया, ब्रूनेई, इंडोनेशिया, फिलीपींस और हिमालय की चोटियों में भारत को ललकार रहा। वह अपने पारंपरिक प्रतिद्वंद्वियों जापान और ताइवान की संप्रभुता पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा और दक्षिण कोरिया एवं ऑस्ट्रेलिया जैसे स्वतंत्र सोच वाले देशों से तकरार बढ़ा रहा। इसका मकसद साफ है। चीन अब खुद को सबसे बड़ी वैश्विक ताकत के तौर पर देखता है और इसीलिए वह समय-समय पर संदेश देता है कि या तो उसकी शर्तों पर समझौता करो या उसकी चुनौती स्वीकार करो।

व्यापार युद्ध: अमेरिका चीन के बीच नए शीत युद्ध का बिगुल बजने को है

अमेरिका और अन्य कई देश चीन के आक्रामक तेवरों पर गंभीर चिंता व्यक्त कर चुके हैं। अमेरिका चीन से व्यापार युद्ध लड़ रहा है और लगता है कि नए शीत युद्ध का बिगुल बजने को है। 20वीं शताब्दी के शीत युद्ध में भारत के पास तटस्थ रहने की गुंजाइश थी, लेकिन चीन का पड़ोसी होने के कारण हमें 21वीं सदी के इस संभावित शीत युद्ध में न चाहते हुए भी बड़ी भूमिका निभानी होगी।

चीन की विस्तारवादी प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए भारत को पहल करनी होगी 

चीन की विस्तारवादी प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने एवं शक्ति संतुलन के लिए भारत को पहल करनी होगी। दुर्भाग्य से चीन जब अपने खतरनाक कदम बढ़ा रहा था तब हमारी विदेश नीति में दूरगामी सोच का अभाव दिखा। घरेलू राजनीति के चलते इस दौर में विदेश नीति केवल पाकिस्तान के इर्दगिर्द ही घूमती दिखाई दी। हम यह भूल गए कि पाकिस्तान चीन का पिट्ठू बन चुका है। इसकी गवाही चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा है जो खैबर दर्रे से शुरू होकर और गिलगिट-बाल्टिस्तान से होते हुए ग्वादर बंदरगाह पर खत्म होगा।

अब नेपाल हमारे सदाबहार दोस्त की सूची में नहीं

नि:संदेह भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका से रिश्तों की गहराई बढ़ाई है, लेकिन इसका भी प्रयास किया है कि उसके साथ रिश्ते चीन से रिश्तों को प्रभावित न करें। अहमदाबाद में नमस्ते ट्रंप सभा हुई तो शी चिनफिंग भी वहीं झूला झूले, लेकिन अब चीन ने यह साबित कर दिया कि वह मित्रता की भाषा नहीं समझता। हमारी ढुलमुल नीति के कारण पड़ोसी देशों के साथ हमारे रिश्ते बिगड़ते गए। अब नेपाल हमारे सदाबहार दोस्त की सूची में नहीं।

श्रीलंका और बांग्लादेश पर भी चीन का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा

श्रीलंका और बांग्लादेश पर भी चीन का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। म्यांमार के साथ अलग तरह की चुनौतियां है। भूटान दोस्त तो है पर उसकी अपनी मजबूरियां हैं। यह स्थिति विदेश नीति की सफलता की सूचक नहीं हो सकती। भारत जैसा देश अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान और संप्रभुता से समझौता नहीं कर सकता।

समय आ गया है हर मोर्चे पर चीन से मुकाबले की तैयारी का

समय आ गया है कि राष्ट्रीय संकल्प और स्पष्ट दीर्घकालिक सोच के साथ हर मोर्चे पर चीन से मुकाबले की तैयारी की जाए। इसके लिए भावनाओं के ज्वार पर नहीं, बल्कि र्आिथक विकल्पों पर आधारित तार्किक एवं ठोस रणनीति की जरूरत है। चीन में बने टीवी सेट और मोबाइल तोड़ने से हमारा लक्ष्य हासिल नहीं होगा।

भारत को क्वॉड जैसी पहल को तेज करना होगा

जरूरी है कि हमारा नेतृत्व ऐसे ठोस रणनीतिक और सामरिक समाधान दे जिससे चीन का मुगालता दूर हो और उसे सबक मिले कि शांति भंग करने की क्या कीमत हो सकती है? सबसे पहले हमें अपने पास-पड़ोस में समर्थन को मजबूत करना होगा। हमें क्वॉड जैसी पहल को भी तेज करना होगा। भारत ने जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ 2007 में क्वॉड की शुरुआत की थी। इसमें ज्यादा प्रगति नहीं हुई है।

एक देश पर आक्रमण सभी देशों पर आक्रमण माना जाता है

हमें क्वॉड को नाटो की तरह सामूहिक रक्षा ढांचे पर संगठित करना होगा जिसमें एक देश पर आक्रमण सभी देशों पर आक्रमण माना जाता है और सदस्य देशों की रक्षा करना सबकी जिम्मेदारी होती है। क्वॉड की सदस्यता भी बढ़ाई जानी चाहिए। वियतनाम इसमें शामिल होने का इच्छुक है। मलेशिया की भी इसमें दिलचस्पी हो सकती है।

भारत को जी-11 का सदस्य बनाने की अमेरिका की पहल का समर्थन करना चाहिए

भारत को जी-11 का सदस्य बनाने की अमेरिका की पहल का समर्थन करना चाहिए। साथ ही हमें इतिहास के पहिए को वापस घुमाते हुए इंदिरा युग की तरह रूस से रिश्तों को मजबूत करना चाहिए। इस चुनौतीपूर्ण समय में रूस के समर्थन की कमी सबसे ज्यादा महसूस हो रही है। रूस तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में महत्वपूर्ण आवाज होगा। मैं भारत के अमेरिकी नेतृत्व वाले मंच में एक समर्पित सदस्य के रूप में शामिल होने की हिमायत नहीं कर रहा हूं।

चीनी दुस्साहस को मात देने के लिए किसी दूसरी ताकत पर पूर्ण निर्भरता राष्ट्रहित में नहीं

चीनी दुस्साहस को मात देने के लिए किसी दूसरी ताकत पर पूर्ण निर्भरता राष्ट्रहित में नहीं, लेकिन हम उन देशों का साथ लेने में परहेज न करें जिनके हित हमारे हितों से मेल खाते हों। भारत के पास एक ऐतिहासिक मौका है। वह 21वीं सदी में भू-राजनीतिक समीकरणों को संतुलन प्रदान करने वाली रणनीतिक पहल का नेतृत्व कर सकता है।

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