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18 की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा, मौत से कुछ घंटे पहले आई थी आयशा की बुक

“ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं’! बाबू मोशाय फिल्म आनंद का यह डायलॉग 18 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाली आयशा चौधरी पर पूरी तरह से सटीक बैठती है। आयशा की किताब ‘My Little Epiphanies‘ उसकी मौत से कुछ घंटे पहले ही छपकर आई थी और आज भी उसकी किताब कई लोगों को प्रेरित कर रही है। आयशा को दुनिया से गए हुए करीब चार साल हो गए हैं और आज एक बार फिर से लोग उसे याद कर रहे हैं। दरअसल प्रियंका चोपड़ा और फरहान अख्तर स्टारर फिल्म द स्काई इज पिंक जल्द ही रिलीज होने वाली है जो आयशा के जीवन पर बनी है। इस फिल्म में प्रियंका चोपड़ा और फरहान अख्तर आयशा के माता-पिता के रोल में नजर आएंगे। फिल्म में आयशा का रोल जायरा वसीम निभा रही है।

जानिए कौन है आयशा
गुरुग्राम की रहने वाली 13 साल की मोटिवेशनल स्‍पीकर आयशा चौधरी को जन्म के समय से ही SCID (Severe Combined Immuno-Deficiency) नाम की बीमारी थी। जब वह मजह 6 महीने की थीं, तब उसका बोन मैरो ट्रांसप्लान्ट हुआ था, फिर 13 साल की उम्र में pulmonary fibrosis नामक बीमारी हो गई थी, जिससे उसके फेफड़े सिर्फ 20 फीसदी काम करते थे, लेकिन इन सबके बावजूद उसके उत्साह में कभी कोई कमी नहीं आई। बहुत कम उम्र में ही उसने TEDx, INK जैसे प्लेटफॉर्म पर स्पीच दी थी।

क्या है SCID (Severe Combined Immuno-Deficiency)
आयशा की मां अदिति चौधरी ने इंक टॉक में बताया था कि आयशा जब छह महीने की थीं, तभी डॉक्टरों ने बताया कि उसे एससीआईडी (Severe Combined Immuno-Deficiency) की समस्या है। इस बीमारी में बच्चे बिना रोग प्रतिरोधक क्षमता सिस्टम के पैदा होते हैं, इससे उनकी किसी भी बीमारी यहां तक कि जुकाम से भी मौत हो सकती है। आयशा का यूनाइटेड किंगडम में बोन मैरो ट्रांसप्लांट भी कराया गयी था। डॉक्टर ने कहा था कि अगर बोन मैरो ट्रांसप्लांट नहीं होता तो वो सिर्फ एक साल ही जिएंगी लेकिन ट्रांसप्लांट के बाद ये खतरा पूरी तरह से खत्म नहीं होता। 13 साल की उम्र में उसे पल्मोनरी फाइब्रोसिस बीमारी हो गई जिससे उसके फेफड़ों ने ठीक से काम करना बंद कर दिया। उसके लिए सांस तक लेना मुश्किल हो गया था लेकिन फिर भी आयसा ने मुस्कुराना नहीं छोड़ा। आयशा ने TedX में बोलते हुए बताया था कि उसने कई स्लीपलेस नाइट बिताई हैं लेकिन वह घबराई नहीं क्योंकि उसको पता है कि एक दिन उसको मरना है..तो फिर क्यों न हम आज और इस पल को जिएं। आयशा रोज करीब कम से कम 5000 शब्द लिखती थी और उसके लेखों ने एक किताब का रूप ले लिया। वो अपनी बाते फोन में रिकॉर्ड करती जो उसकी खूबसूरत फीलिंग्स थीं और लोगों को प्रेरित कती थी। आयशा जब तक जिंदा रही उसने हर पल को एक नए उत्साह के साथ जिया।

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