अंतर्राष्ट्रीय मोटापा दिवस – योग का उद्देश्य वसा कम करना नहीं बल्कि आध्यात्मिक अज्ञान तथा सभी प्रकार के कष्टों को दूर करना है

भोपाल। आदर्श योग आध्यात्मिक केंद्र स्वर्ण जयंती पार्क कोलार रोड़ भोपाल के संचालक योग गुरु महेश अग्रवाल ने बताया कि 4 मार्च को विश्व मोटापा दिवस मनाया जाता है। मोटापे से जुड़े खतरों की जानकारी देने, उसके व्यावहारिक समाधान, और सही इलाज करते हुए लोगों को हेल्दी वेट हासिल करने और बनाए रखने में मदद करने के लिए मनाया जाता है। विश्व मोटापा दिवस 2022 की थीम ‘एवरीबडी नीड्स टू एक्ट है, मतलब सभी को काम करने की जरूरत है।
योग गुरु अग्रवाल ने बताया कि योग का उद्देश्य भार को कम करना नहीं है, फिर भी योग को भार सम्बन्धी समस्याओं के लिए प्रभावपूर्ण और स्थायी निदान के रूप में मान्यता मिली है। वास्तव में यह न तो विशेष आहार का परिणाम होता है, और न ही उत्तेजक व्यायाम का। मूल ग्रीक भावार्थ के अनुसार योग एक उपयुक्त आहार देता है, एक जीवन-चर्या देता है। योग हमें हमारी आवश्यकताओं और स्वभाव के अनुरूप जीवन के प्रति एक सामंजस्यपूर्ण अभिवृत्ति देता है। योग की नजर भार पर नहीं होती, बल्कि आप पर होती है। योग आपको एक शरीर नहीं, बल्कि एक व्यक्ति मानकर ऐसी व्यावहारिक तकनीक बताता है जो न केवल आपको वसा और मितांहार (डायटिंग) से मुक्ति दिलाती है, बल्कि आपके जीवन के प्रत्येक पक्ष को स्वस्थ और समस्वरित बनाती है।
योग उपचार  – सर्वप्रथम समेकित योग साधना के लिए समय निर्धारित करना होगा जिसके अनुसार दिनचर्या संचालित होगी।
आसन – अनेक व्यक्ति समझते हैं कि अपने भार को कम करने का मतलब है हाँफ-हाँफ कर व्यायाम करना और पसीने में डूब जाना। आसन कुछ अधिक सरल प्रतीत होते हैं। सम्भवतः प्रारम्भ में आसन करते समय आपको पसीना आये, किन्तु यह मुख्य बिन्दु नहीं। चिकित्सा जगत् अनुसन्धानों से यह ज्ञात हुआ है कि आसनों के द्वारा कॉलेस्ट्राल और रक्त की तरल वसा की मात्रा में कमी आती है; इस प्रकार आसन शरीर की आन्तरिक प्रक्रियाओं को सामंजस्यपूर्ण बनाते हैं।
विशेषकर स्त्रियों में भार वृद्धि का सम्बन्ध प्रजनन तन्त्र के असन्तुलित हॉर्मोनों से हो सकता है। सुस्त अवटु (थॉयरायड) भी इसका कारण हो सकता है। आसन न केवल झूलती हुई मांसपेशियों को सबल बनाते हैं, बल्कि शरीर की आन्तरिक प्रणालियों को भी प्रभावित कर असन्तुलित हॉर्मोनों को समंजित करते हैं और आन्तरिक अवयवों की मालिश करते हैं। इस प्रकार भार का समान रूप से क्षरण होता है और शरीर का यथोचित पुनर्गठन होता है।
इस सन्दर्भ में अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि आसनों का उचित अभ्यास हमें अपने अन्तर की पुकार के प्रति जागरूक बनाता है जो अधिकतम स्वास्थ्य लाभ के लिए हमारा मार्गदर्शन करती है। शरीर का अपना भाव तत्त्व होता है, और हम आसनों के अभ्यास से शरीर द्वारा दिये गये अनेक छोटे संकेतों और सूक्ष्म सन्देशों को समझना सीख जाते हैं।
हमें कब, कितना और क्या खाना चाहिए, कब अधिक काम करना चाहिए, कब आराम करना चाहिए और ऐसी ही अनेक बातें हम सीख जाते हैं जो स्वास्थ्य और शक्ति को कायम रखने में सहायक होती हैं। जब आप योग के माध्यम से अपने अन्तर की पुकार पर ध्यान देने लगेंगे तो कभी आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि कतई यह आहार नहीं है जिसकी आपको आवश्यकता है।
शायद आप सोना चाहते हों या तनावमुक्त होने के लिए घूमना चाहते हों तो इसके विकल्प के रूप में भोजन आपको सन्तुष्ट नहीं कर पायेगा, बल्कि आपके भार में ही वृद्धि कर देगा।
आसन हमारी ऊर्जा को कम नहीं करते हैं, जैसा कि अनेक व्यायामों और खेलों में होता है। अपितु ये ऊर्जा को सुरक्षित रखते हैं और उसका नवीनीकरण कर देते हैं जो अधिक भार वाली स्त्रियों के भारीपन और सुस्ती को कम करने में मदद करती है।
*आरम्भ में गत्यात्मक आसनों का अभ्यास किया जाना चाहिए*, जैसे – तिर्यक ताड़ासन, सूर्यनमस्कार, कटिचक्रासन और इनके साथ कुछ सहज आसन, जैसे- वज्रासन, सुप्तवज्रासन, प्रणामासन या भूमि शीर्षासन। बाद में आसनों के अभ्यास में कुछ कटौती करके प्राणायामों, विशेषकर भस्त्रिका एवं नाड़ीशोधन को अधिक समय देना चाहिए।
*षट्कर्म -* एक सुनियोजित कार्यक्रम के अन्तर्गत भार को कम करने वाले अधिक प्रभावकारी आसनों के साथ एकान्तर क्रम से कुंजल क्रिया और शंख प्रक्षालन भी किये जाने चाहिए। भार वृद्धि के बाद हम जितने अधिक दिनों तक उस अतिरिक्त भार को कायम रखते हैं, हमारे शरीर का समय चक्र उतना ही धीमा होता जाता है। षट्कर्म आसनों के प्रभाव को अधिक प्रबल बना देते हैं और मन्द पड़ गये चयापचय में जान डाल देते हैं।
लघु शंखप्रक्षालन से रक्त शर्करा में तुरन्त कमी आती है जिसकी पूर्ति के लिए शरीर संचित वसा का उपयोग करने के लिए प्रेरित होता है। इससे यकृत को भी शक्ति प्राप्त होती है जो वसा के संग्रह और उसके उपयोगी तत्त्व रक्त शर्करा में पुनर्परिवर्तन के लिए अत्यावश्यक है।
पाचन संस्थान की क्षमता वृद्धि में तथा अति अम्लता के कारण ‘कूट में क्षुधा’ को समाप्त करने में भी कुंजल क्रिया सहायक होती है। वसा के पिघल जाने पर अनेक अवांछित तत्त्व जो वसा कोशिकाओं में संचित रहते हैं, रक्त में चले जाते हैं। ये दोनों क्रियायें टॉक्सिन के निष्कासन को द्रुत कर देती हैं और शरीर हल्केपन का अनुभव करता है।
शिथिलन – उचित शिथिलन के लिए योगनिद्रा या गहन ध्यान आपके कार्यक्रम का एक अनिवार्य अंग है। सामान्यतया यह समझा जाता है कि अत्यधिक तनाव से आप दुर्बल हो जायेंगे और यदि आप का भार अधिक है तो शिथिलन से वह और बढ़ जायेगा। स्त्रियों के साथ हमेशा ऐसा नहीं होता है। कुछ व्यक्ति तनावयुक्त होने पर कम खाते हैं, किन्तु अधिकतर व्यक्ति, उनमें से अधिकतर स्त्रियाँ अधिक खाने लगती हैं, यह एक प्रकार से क्षति पूर्ति का प्रयास होता है।
प्राय: जब हम थकावट से व्याकुल हो जाते हैं तो अपने आराम के लिए कुछ समय चाहते हैं। स्त्रियाँ, विशेषकर वे जो दिन-भर रसोई घर में रहती हैं, जब थकान का अनुभव करती हैं तो उन्हें लगता है कि उन्हें कुछ खाने की आवश्यकता है। जबकि उनके शरीर को भोजन की आवश्यकता नहीं होती, और इस प्रकार उनका मोटापा बढ़ता जाता है। तनाव हमें भोजन का आनन्द नहीं लेने देता है। चूँकि मन विचलित रहता है, इसलिए भोजन के स्वाद पर हमारा ध्यान नहीं जाता और भरपेट खा लेने के बाद भी हम असन्तुष्ट ही रह जाते हैं। फलस्वरूप हम अधिक खा लेते हैं,अधिकतर ऐसी तली हुई और मीठी चीजें जो भार बढ़ाती हैं ।
इसके अतिरिक्त तनाव की निरन्तरता शरीर की सूक्ष्म और संवेदनशील प्रक्रियाएँ अस्त-व्यस्त जाती और भार को बढ़ने का अवसर मिल जाता भोजन से हमारे सम्बन्ध को विकृत करने वाले तनाव को दूर आन्तरिक संकेतों के प्रति हमारी संवेदनशीलता को प्रोत्साहित करने लिए शिथिलन अनिवार्य हो जाता  है । सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास की दृष्टि से भार कमी से अधिक महत्त्वपूर्ण है तनाव कम होना और यह योग का वास्तविक उद्देश्य है ।
अपनाने योग्य लाभप्रद आदतें-
भोजनों के बीच पर्याप्त जल पीयें। सलाद या सूप से भोजन आरम्भ करें। दक्षिण भारत में भोजन के अन्त में रसम पीया जाता है, किन्तु जब आप पथ्याहार ले रहे हैं तो भोजन के रूप आरम्भ करने के पूर्व सूप में कुछ पीयें। पर्याप्त सब्जियाँ खायें इनमें पौष्टिकता अधिक और कैलोरी कम होती है। इडली, चावल और चपाती में अधिक घी से परहेज करें। तले हुए भोजन में कटौती करें और प्रतिदिन मिठाई न खायें। रस, चाय और कॉफी में कम शक्कर लेने की आदत डालें। दो भोजनों के बीच कुछ नहीं खायें निश्चित समय पर पानी, चाय, कॉफी या मट्ठा लें, किन्तु बिना किसी अल्पाहार के। धीरे-धीरे खायें। जिस क्षण आप पहला ग्रास लेते हैं उसके लगभग बीस मिनटों के बाद मस्तिष्क का परितृप्ति केन्द्र ‘पर्याप्त’ का संकेत देता है। शीघ्रता से खाने पर आप बीस मिनटों में आवश्यकता से अधिक खाना ले सकते हैं। धीरे खाने पर आप भोजन के स्वाद का आनन्द उठाते हैं और आपका शरीर यह अनुमान भी लगा पाता है कि उसे कितने भोजन की आवश्यकता है। भोजन के पूर्व और पश्चात् वज्रासन में बैठें। वज्रासन पाचन को सुगम बनाता है। भोजन के पूर्व बैठने पर यह आपको शान्त होकर भोजन के प्रति अधिक जागरूक होने का अवसर देता है। यह आपको अपने संकल्प को स्मरण करने का भी समय देता है।
अपराध-बोध से ग्रस्त न हों  –  यौगिक जीवन का महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि आप अपने भोजन का मूल्यांकन करना छोड़ दें और मिताहार बन्द कर दें। इसके स्थान पर आप यह देखें कि आप किस प्रकार खाते हैं और इसके प्रति अधिक जागरूक हो जायें कि आपके लिए क्या आवश्यक है। जागरूकता और अवलोकन के द्वारा आप यह पता लगायें कि आपको कितने भोजन की आवश्यकता है जो शारीरिक और भावनात्मक रूप से आपको सन्तुष्ट करता है, और सुनिश्चित करें कि आप इतना सब खा लेते हैं न कम, न अधिक। यदि सभी सामग्रियों के एक साथ करने पर आपको भोजन की मात्रा अधिक लगे तो उतना ही खायें जितना उस नियत समय पर आवश्यक हो। यदि आप एक भोजन में अधिक खा लेती हैं तो अपराध-बोध से ग्रस्त होकर अगला भोजन छोड़ने का लोभ न करें, इससे सन्तुलन और भी बिगड़ेगा।
योग हममें अपने अन्तर की पुकार के प्रति आत्म स्वीकृति एवं विश्वास उत्पन्न कर शरीर के प्रति सकारात्मक जागरूकता की अनुभूति प्राप्त करने के योग्य बनाता है। आप स्वयं को एक सामान्य व्यक्ति के रूप में देखना आरम्भ कर देती हैं और तब आप एक सामान्य व्यक्ति के रूप में खाने लगते हैं – बिना अपराध बोध के।
योग का उद्देश्य वसा कम करना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अज्ञान तथा सभी प्रकार के कष्टों को दूर करना है। योग का लक्ष्य शरीर को हल्का बनाना नहीं बल्कि मन को प्रबुद्ध करना है। यदि आप इस विचार को सदा अपने सामने रखें तो आपका शरीर आपको एक बोझ के समान प्रतीत नहीं होगा, बल्कि एक वरदान बन जायेगा।

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