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शादी अमान्य हो चुकी हो तो टिक नहीं सकता दहेज प्रताड़ना का केस : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने कहा अगर शादी अमान्य हो चुकी हो तो फिर दहेज प्रताड़ना का केस नहीं टिक सकता। एक अहम फैसले में शीर्ष कोर्ट ने कहा अगर शादी ही अमान्य (यानी शादी हुआ माना ही नहीं गया हो) हो चुकी हो तो आईपीसी की धारा-498 ए (दहेज प्रताड़ना) का केस नहीं चल सकता है। मौजूदा मामले में आरोपी को आईपीसी की धारा-498 ए के तहत दोषी करार दिया गया।

इसके बाद यह मामला शीर्ष अदालत में पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि दोनों पार्टी की शादी को अमान्य करार दिया जा चुका है। मद्रास हाई कोर्ट ने शादी को अमान्य करार दिए जाने पर मुहर लगा दी थी। ऐसे में दहेज प्रताड़ना का केस नहीं बनेगा। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसले के भी हवाला दिया गया। इसके बाद शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इस बात में संदेह नहीं है कि दोनों पक्षकारों की शादी अमान्य करार दिया जा चुका है। ऐसे में दहेज प्रताड़ना का केस नहीं बनेगा। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट शिवचरण लाल वर्मा से संबंधित मामले में भी यह व्यवस्था दे चुका है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश मामले में बताया गया कि दोनों पार्टी की शादी 4 दिसंबर 2003 को हुई थी। शादी के बाद ही पति-पत्नी में अनबन हो गई और दोनों ही अलग-अलग रहने लगे। पत्नी ने कन्याकुमारी थाने में पति के खिलाफ केस दर्ज कराया। आईपीसी की धारा-498 ए यानी दहेज प्रताड़ना का केस दर्ज किया गया साथ ही दहेज निरोधक कानून के तहत भी केस दर्ज किया गया। ट्रायल कोर्ट ने सभी को दहेज प्रताड़ना और दहेज निरोधक कानून के तहत दर्ज केस में बरी कर दिया।
इस मामले में हाईकोर्ट के सामने पत्नी और पुलिस ने अपील दाखिल की। हाईकोर्ट ने पति समेत तीन ससुरालियों को दहेज प्रताड़ना केस में दोषी करार दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में आया। सुप्रीम कोर्ट में पति और अन्य की ओर से दलील दी गई कि हाईकोर्ट शादी अमान्य करार दे चुकी है। यह जजमेंट 25 फरवरी 2021 को आया था और इस तरह से दहेज प्रताड़ना का केस नहीं टिकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इसमें संदेह नहीं है कि शादी अमान्य हो चुका है और ऐसे में दहेज प्रताड़ना का केस नहीं टिकता है। जहां तक दहेज निरोधक कानून का सवाल है तो उस मामले में भी ट्रायल कोर्ट ने पूरे कारण के साथ आरोपियों को बरी किया है। ऐसे में हाई कोर्ट को ट्रायल कोर्ट आदेश में दखल नहीं देना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए हाई कोर्ट के फैसले के खारिज कर दिया।

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