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जानिए भारत के लिए क्‍यों अहम है ब्रिटेन में बोरिस जॉनसन की जीत, रिश्तों में गर्माहट आने के आसार

नई दिल्ली। ब्रिटेन में हुए आम चुनाव में पीएम बोरिस जॉनसन की अगुवाई में कंजरवेटिव पार्टी को मिली प्रचंड बहुमत को वैश्विक कूटनीतिक विशेषज्ञ चाहे जिस भी नजरिए से देखे लेकिन यह भारत के हितों के लिए यह परिणाम मुफीद साबित हो सकता है। ब्रेक्‍जि‍ट के चक्कर में राजनीतिक तौर पर उलझा ब्रिटेन पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत के साथ अपने रिश्तों को खास तवज्जो नहीं दे पाया था। दूसरी तरफ प्रमुख विपक्षी दल लेबर पार्टी का पाकिस्तान प्रेम बढ़ता जा रहा था। ऐसे में भारत के साथ खास रिश्तों की हमेशा से वकालत करने वाले जॉनसन के दोबारा पूरे कार्यकाल के लिए पीएम बनने से द्विपक्षीय रिश्तों की सुस्त गाड़ी की रफ्तार बढ़ना तय है। भारत ने भी ब्रिटेन के साथ अपने रिश्तों में नई गर्माहट भरने को तैयार है। पीएम नरेंद्र मोदी ने जॉनसन को तुरंत ही बधाई दे कर अपनी मंशा भी साफ कर दी है।

 कश्मीर को लेकर जॉनसन की सरकार भारत के रुख को लेकर दिखाएगी सम

जॉनसन की जीत से भारत ने इसलिए भी राहत की सांस ली है कि प्रमुख विपक्षी दल लेबर पार्टी ने हाल के महीनों में बेहद कड़ा भारत विरोधी स्टैंड ले रखा था। लेबर पार्टी के पाकिस्तान समर्थन रुख से भारत संशकित था। खास तौर पर कश्मीर से धारा 370 समाप्त करने के बाद जिस तरह से लेबर पार्टी भारत की नीतियों पर सवाल उठा रही थी और ब्रिटेन में भारत विरोधी रैलियों का समर्थन कर रही थी, उससे नई दिल्ली की चिंताएं बढ़ी थी। लेबर पार्टी की राजनीतिक दबाव के बावजूद जॉनसन ने कश्मीर के मुद्दे पर राजनीति नहीं की और उन्होंने भारत विरोधी बयान नहीं दिया। इस आशंका से ब्रिटेन के भारतवंशियों ने भी कंजरवेटिव पार्टी का समर्थन किया है। ऐसे में भारत को उम्मीद है कि जॉनसन की अगुवाई में नई सरकार कश्मीर के साथ ही खालिस्तान के मुद्दों को भड़काने में जुटे वर्ग को भी कोई बढ़ावा नहीं देगी।

हिंद प्रशांत क्षेत्र में नए सहयोग पर किये गये समझौते पर आगे बढ़ा जाएगा

कूनीतिक सूत्रों के मुताबिक सबसे अहम बात यह है कि पीएम मोदी और ब्रिटेन के नई पीएम जॉनसन के बीच पहले से ही संवाद कायम है। मोदी और जॉनसन के बीच मुलाकात भी जल्द हो सकती है। दोनों के बीच पहली और अंतिम मुलाकात फ्रांस में ग्रूप-7 देशों की बैठक के दौरान अगस्त, 2019 में हुई थी। अब ये दोनो नेता कम से कम अगले साढ़े चार वर्षों तक एक साथ काम कर सकते हैं। इससे द्विपक्षीय रिश्ते को आगे बढ़ाने में स्थाई नेतृत्व मिलेगा। चाहे दोनो देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की बात हो या हिंद प्रशांत क्षेत्र में नए सहयोग की शुरुआत करने की बात हो, इन पर तेजी से फैसला हो सकता है।

ब्रेक्‍जि‍ट पर फैसले के बाद भारत-ब्रिटेन कारोबारी रिश्तों की स्थिति होगी स्पष्ट

चुनाव जीतने के बाद जिस तरह से बोरिस जॉनसन ने 31 जनवरी, 2020 से यूरोपीय संघ से अलग होने की प्रक्रियाओं के पूरा होने की बात कही है, उससे भारत के व्यापारिक हितों पर असर पड़ेगा। ब्रिटेन किन शर्तों के साथ यूरोपीय संघ से अलग (ब्रेक्‍जिट) होता है, उसके आधार पर भारत इन दोनो क्षेत्रों के लिए भावी कारोबारी नीति तैयार करेगा। ब्रिटेन में कारोबार करने वाली भारतीय कंपनियां भी ब्रेक्‍जिट पर वहां की सरकार के फैसला का इंतजार कर रही है।

आर्थिक अपराधी विजय माल्या, नीरव मोदी के प्रत्यर्पण में होगी मदद

ब्रिटेन की नई सरकार से भारत को एक बड़ी उम्मीद यह है कि यहां से आर्थिक अपराध कर वहां शरण पाये अपराधियों के प्रत्यर्पण की राह आसान करे। भारत के दो सबसे बडे़ आर्थिक अपराधी विजय माल्या और नीरव मोदी अभी ब्रिटेन में है। वहां वे भारत सरकार की तरफ से प्रत्यर्पण के आवदेन के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। इनका भविष्य बहुत कुछ नई सरकार के गृह मंत्रालय के हाथ में होगी। इसी तरह से ब्रिटेन में शिक्षा के लिए जाने वाले छात्रों को लेकर वहां की सरकार की तरफ से लगाई गई पाबंदी का मुद्दा भी भारत लगातार उठाता रहा है। वैसे कंजरवेटिव पार्टी का रुख बाहर से आने वाले शरणार्थियों को लेकर बहुत सकारात्मक नहीं है, ऐसे में देखना होगा कि वह भारतीय छात्रों को शिक्षा के बाद रोजगार देने के मुद्दे पर नरमी अपनाते हैं या नहीं।

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