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मध्यप्रदेश

आंखों पर पट्टी बांधकर बिना फोटो स्पर्श किए सब बता देती है MP के टीकमगढ़ की आकाशी

टीकमगढ़। कभी फोटो तो कभी भौतिक रूप से सामने देखकर किसी व्यक्ति के मन की परेशानी जानने का दावा अक्सर साधु-संत करते रहते हैं परंतु टीकमगढ़ की 11वीं की छात्रा आकाशी का कौशल इससे काफी अलग है वह आंखों पर पट्टी बांधकर ही किसी फोटो के बारे में बता देती है कि यह कौन है, और उसके जीवन से जुड़ी जानकारियां क्या हैं। आकाशी ने यह विद्या कोरोनाकाल के दौरान उत्तरप्रदेश के प्रयागराज स्थित संस्थान से आनलाइन कोर्स के माध्यम से सीखी।

अब साल दर साल इसमें इतनी निपुण हो गई है कि आंखों पर कपड़ा बांधकर या आंखे बंद करके लोगों की पहचान, फोटो को बिना छुए ही व्यक्ति के बारे में पूरी जानकारी देना उसके लिए एक खेल जैसा है। छोटा भाई भी इस कौशल में आगे बढ़ रहा है, जो रंगों की पहचान के साथ ही नोटों के नंबर भी बगैर स्पर्श किए बता देता है। यह पूरा सिस्टम न्यूरो साइंस पर आधारित है।

शहर के तालदरवाजा के पास रहने वाले पारितोष व्यास की 16 वर्षीय पुत्री आकाशी व्यास के लिए आंखों पर पट्टी बांधकर अखबार पढ़ लेना, बंद आंखों में केवल छूकर और बिना छुए भी केवल आभास से रंगों की पहचान कर लेना, पजल गेम में टास्क कंप्लीट करना और ड्राइंग करना, लोगों की फोटो को आंखों पर पट्टी बांधकर विभिन्न जानकारियां बताना दिनचर्या का हिस्सा बन गया है।

आकाशी ने बताया कि यह हुनर उसने कोरोना काल के दौरान तीन माह में नियमित अभ्यास से अर्जित किया है। इसके लिए दादी गीता शर्मा ने ब्राइटर माइंड फ्रेंचाइजी लता द्विवेदी प्रयागराज की आनलाइन क्लास के बारे में बताया था। वहां आकाशी ने न्यूरोसाइंस पर आधारित इस कौशल को जाना। मां प्रीति व्यास ने इसकी प्रेक्टिस कराई।

कोई जादू नहीं न्यूरोसांइस पर आधारित है यह कौशल

संस्थान के फेसिलटेटर रामकृष्ण द्विवेदी ने बताया कि पूरा सिस्टम न्यूरो साइंस पर आधारित है। न्यूरो प्लास्टिसिटी (न्यूरों के कनेक्शन को बदलने की क्षमता) 15 साल तक बच्चों में ही अच्छी होती है। इनके सैंसेज इंटरलिंक हो जाते है। आंख माध्यम है, हम देखते ब्रेन से हैं। कान केवल द्वार है, हम सुनते ब्रेन से हैं। ऐसे ही सारे सैंसेज हम अपने ब्रेन से करते हैं। ब्रेन में न्यूरांस के कनेक्शन बन जाते हैं। इसमें छठी इंद्री जाग्रत हो जाती है।

पहले बच्चा टच करके पढ़ना, पहचानना सीखता है। एक समय बाद बिना छुए भी पहचान करने लगता है। प्रेक्टिस द्वारा बच्चा एक किमी दूर का चौराहे का सिग्नल भी बता सकता है। यह 30 घंटे का पूरा कोर्स है, जो अलग-अलग स्टेप में करीब दो से तीन माह में पूरा किया जाता है। इस सिस्टम का उद्देश्य केवल आंख बंद करके पढ़ना, पहचानना, लिखना नहीं है, बल्कि आजकल का जो परिवेश है।

बच्चे टीवी, मोबाइल में तमाम तरह के इंटरनेट मीडिया में एक सीमा से ज्यादा उपयोग करने लगे हैं। इससे ब्रेन में डिस्ट्रक्शंस आ रहे हैं। बच्चों का फोकस डिस्टर्ब होता जा रहा है। प्रोग्राम का उद्देश्य बच्चों में फोकस क्रिएट करना है। बच्चों की मैमोरी पावर को कैसे बढ़ाया जाए, कैसे उनका आनलाइन ऑब्जर्वेशन पावर बढ़ाया जाए। सिक्स सेंस को कैसे उभारा जाए और उसका उपयोग जीवन बेहतर बनाने में कर सकें।

नईदुनिया की टीम ने दिखाए फोटो

नईदुनिया टीम आकाशी के घर पहुंची और उन्हें महात्मा गांधी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, गृहमंत्री अमित शाह के साथ ही कई फोटो दिखाए तो उन्होंने आंखों पर पट्टी बांधे हुए सभी के बारे में आसानी से बता दिया। इतना ही नहीं एक संत के साथ करीब 20 लोगों के बैठे होने का फोटो दिखाया, तो इस संबंध में पूरी जानकारी आकाशी ने दे दी।

11 वर्षीय भाई पार्थसार्थी व्यास ने भी आनलाइन क्लास को ज्वाइन करने के साथ ही अब तक रंगों की पहचान, नोटों के नंबर बताने की कला सीख ली है। पार्थसार्थी ने बताया कि इस कौशल को सीखने के लिए अनुशासन की जरूरत है, जिसमें ब्रेन एक्सरसाइज कराई जाती है।

खास बात यह है कि बाजार की चीजों में आइसक्रीम, काफी, नूडल्स सहित कई अन्य खाद्य पदार्थ बंद कर दिए जाते हैं और लौकी-कद्दू जैसी सब्जियां दो सप्ताह तक खानी पड़ती है।

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