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क्रोध में कैंपस: कहीं स्थापित ताकतों को चुनौती का नतीजा तो नहीं है JNU हिंसा

नई दिल्ली। जेएनयू में लंबे समय से चल रहे छात्र आंदोलन का एक वीभत्स रूप तब देखने को मिला जब पिछले दिनों यह हिंसा में तब्दील हो गया। कहा जा रहा है कि यह हिंसक लड़ाई वामपंथी और दक्षिणपंथी या कहें कि राष्ट्रवादी विचारधारा के समर्थक छात्रों के बीच हुई है। पिछले कुछ समय से देश भर में विश्वविद्यालयी कैंपसों में लेफ्ट और राइट विचारधारा के बीच संघर्ष बढ़ा है। पहले भी कॉलेज-विश्वविद्यालयों के छात्र राजनीतिक विचारधाराओं से प्रभावित होते थे, और इनमें विवाद, तनाव और कभी-कभी संघर्ष भी होता था। आजकल सुर्खियों में छाए जेएनयू से ही मैंने अपनी उच्चतर शिक्षा हासिल की। हमारे समय में भी छात्र वैचारिक रूप से बंटे होते थे।

इनके बीच बहसें कभी-कभी उग्र रूप अख्तियार कर लेती थीं लेकिन, अंत में हाथ में हाथ डालकर मित्र-भाव से लोग साथ-साथ अपने-अपने कमरों में वापस लौट जाते। दूसरे दिन फिर गर्मागर्म बहसें, लेकिन मारपीट की घटनाएं शायद ही होती हों। हालांकि जेएनयू का यह अनोखा रूप देश में एक अपवाद ही था, लेकिन अन्य कैंपसों में भी छात्रों में वैचारिक- राजनीतिक मतभेद के बावजूद वैसा मनभेद और संघर्ष नहीं होता था जो आज दिखाई पड़ता है। राज्यों के विश्वविद्यालयों में जहां छात्र राजनीतिक पार्टियों के साथ-साथ क्षेत्रीय या आंचलिक अस्मिताओं से जुड़े होते थे, वहां लड़ाई जेएनयू जैसी वैचारिक न होकर राजनीतिक वर्चस्व के लिए ज्यादा होती थी।

यह कभी-कभार हिंसक भी हो जाती थी, लेकिन आज के मुकाबले में बहुत कम ही थी। यह बात मैं देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ने-पढ़ाने के अपने वैयक्तिक अनुभवों के आधार पर कह सकता हूं। छात्रों के बीच इन हिंसक संघर्षों के कारणों की पड़ताल करें तो सबसे बड़ा कारण है बीजेपी से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) और अन्य अस्मिताई राजनीति से जुड़ी विचारधाराओं का उभार, जिससे वामपंथी दलों और कांग्रेस समर्थक छात्र संगठनों के वर्चस्व को चुनौती मिल रही है। पहले केंद्रीय सत्ता कांग्रेस के पास थी। कांग्रेस के नेहरूवादी शिक्षा मॉडल और बाद में इंदिरा गांधी शासन में कांग्रेस समर्थक तथाकथित उदारवादियों के अलावा वामपंथी विद्वानों और छात्रों को फलने-फूलने का खूब मौका मिला। काफी लंबे समय तक कॉलेज, विश्वविद्यालयों में इन्हीं लोगों का वर्चस्व रहा। हालांकि दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी विचारधारा और लोहियावाद आदि के समर्थक छात्र भी होते थे, लेकिन इनकी तादाद कम होती थी। इसलिए ये अपेक्षाकृत दबे और कम मुखर रहते थे और शिक्षकों में तो, अपवादों को छोड़कर, तथाकथित उदारवादियों और वामपंथियों का एकाधिकार रहा। 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के बाद धीरे-धीरे जेएनयू व केंद्रीय विश्वविद्यालयों में राष्ट्रवादी वैचारिक पृष्ठभूमि के शिक्षकों की संख्या बढ़ी।

छात्रों में भी इस विचारधारा का प्रभाव बढ़ने लगा। इससे वामपंथ- कांग्रेस समर्थक छात्र संगठनों के एकाधिकार को चुनौती मिलनी शुरू हुई। जेएनयू आदि संस्थानों में एबीवीपी के उभार के बाद वामपंथी छात्र संगठनों से इनके संघर्ष को इस रूप में समझा जा सकता है। छात्रों के बीच के हिंसक संघर्ष को पश्चिमी संस्कृति और आधुनिक जीवनशैली के बढ़ते हुए असर से भी जोड़कर देखा जा सकता है। संचार क्रांति, स्मार्टफोन, इंटरनेट, पश्चिमी संस्कृति पर आधारित एप्स और टीवी कार्यक्रमों ने आक्रामकता को बढ़ावा दिया है। आधुनिक जीवनशैली में बढ़ती हुई वैयक्तिकता और घटती हुई सामूहिकता ने उत्प्रेरक का काम किया है। माक्र्सवादी और पश्चिमी चिंतन पद्धति जो चीजों को सिर्फ पक्ष या विपक्ष की स्थापित अवधारणा के रूप में देखती है, न कि उनकी समग्रता तथा जटिलता में, जो कि भारतीय चिंतन परंपरा है; इसने भी छात्रों के आपसी मतभेद को समरस तरीके से सुलझाने के बजाय और उलझाया है। चाहे किसी भी विचारधारा, जाति-पंथ के छात्र हों, वे सभी हमारे अपने हैं, इसी भारत मां की संतान हैं। तमाम मतभेदों के साथ भी वे सहिष्णु रहकर शिक्षा, समाज और देश के लिए समवेत रूप से कार्य कर सकते हैं। इस संदर्भ में हमारी भारतीय चिंतन पद्धति एक सही मार्गदर्शक होगी। आदिग्रंथ ऋग्वेद में उल्लिखित है:, ‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् , देवा भागं यथा पूर्वे सज्जानाना उपासते’। अर्थात हम सब एकसाथ आएं, आपस में बात करें, एक-दूसरे को समझें। यही आचरण वंदनीय और श्रेष्ठ है।

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