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राजस्थान

‘कुकड़ेश्वर महादेव’, जहां एक मुर्गे ने मुगलों से बचाई थी महाराणा प्रताप की जान

भगवान शिव की आराधना का महीना सावन आज से शुरू हो चुका है. सबसे बड़ी बात यह है कि इस बार महीने की शुरुआत सोमवार से ही हो रही है, जो बड़ा ही शुभ संयोग बन रहा है. सावन के पहले सोमवार को लेकर शिव भक्तों में जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है. शिवालयों में पूजा-अर्चना के लिए भक्तों की भारी भीड़ लग रही है. साथ ही शिवालयों में हर-हर महादेव के जयकारों के साथ भक्ति का वातावरण बना हुआ है.

राजस्थान के मेवाड़ में भगवान भोलेनाथ के कई मंदिर हैं, जहां भक्तों की भारी भीड़ हमेशा बनी रहती है. भोलेनाथ से ऐसी आस्था मेवाड़ के हर मंदिर में देखी जाती है. वहीं मेवाड़ में कई अति प्राचीन शिव मंदिर हैं, जिनका इतिहास बहुत ही पुराना है. कई मंदिर ऐसे है, जिनका इतिहास हर कोई जानना चाहता है. ऐसा ही एक मंदिर उदयपुर शहर से 12 किलोमीटर दूर लखावली गांव के पास हरे-भरे जंगल में है. यह मंदिर श्रद्धा और पर्यटन का संगम है. इस मंदिर का शिवलिंग कैलाशपुरी के एकलिंगजी मंदिर के दौर का है.

महाराणा प्रताप ने लखावली के जंगल में बिताया था समय

हालांकि यह मंदिर करीब 575 साल पहले महाराणा प्रताप के शासन काल में अस्तित्व में आया था. इससे जुड़ी कई लोक मान्यताएं भी हैं, जो इस मंदिर धाम की विशिष्टता को दर्शाती हैं. मंदिर के पुजारी मोहन गिरि बताते हैं कि मुगलों से संघर्ष के दौरान महाराणा प्रताप ने लखावली के इस जंगल में भी कुछ समय बिताया था. यहां प्रवास के दौरान महाराणा प्रताप एक कच्चे मंदिर में रात विश्राम कर रहे थे, तभी एका-एक मुगल सैनिक इस ओर बढ़ने लगे.

कैसे रखा गया मंदिर का नाम?

महाराणा प्रताप इससे बेखबर थे. कहा जाता है कि संयोग से कुकड़े (मुर्गे) ने आधी रात को बांग दे दी, जिससे महाराणा प्रताप जाग गए. उन्होंने खुद को सुरक्षित कर लिया, तब से यह मंदिर कुकड़ेश्वर महादेव के नाम से जाना जाने लगा. सरपंच मोहन पटेल ने बताया कि मंदिर के बगल में नाला बहता है. इसकी विशेषता यह है कि कितनी भी गर्मी हो, लेकिन इस नाले का पानी कभी नहीं सूखता है.

श्रद्धालु इसे भोले के नित्य अभिषेक से जोड़ते हैं. इसी मंदिर के पास में एक कुंड भी है. यह भी कभी नहीं सूखता है. सावन के महीने में श्रद्धालु इसी पवित्र जल से कुकड़ेश्वर महादेव का जलाभिषेक करते हैं. सरपंच मोहन पटेल के मुताबिक, रविवार को अधिकांश शहर के लोग भी बड़ी संख्या में कुकड़ेश्वर धाम पहुंचते हैं, जबकि हर सोमवार इस शिव धाम पर मेले जैसी रंगत होती है.

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