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मध्यप्रदेश

अगरतला के पार्षद की गांधीगिरी से बदल गई वार्ड की रंगत, इंदौर में ले रही हैं स्वच्छता की सीख

इंदौर: ‘लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती’. त्रिपुरा की राजधानी अगरतला की महिला पार्षद सोमा मजूमदार इन पंक्तियों को चरितार्थ कर रही हैं. वे इन दिनों अपने वार्ड के रहवासियों के घरों की साफ-सफाई को लेकर चर्चा में हैं. देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर की स्वच्छता से प्रभावित होकर सोमा मजूमदार यहां अध्ययन करने पहुंची हैं. स्वच्छता के लिए गांधीगिरी करने वाली सोमा ने अपने वार्ड में कचरा कलेक्शन के लिए हर महीने 60 रुपए की फीस भी रखी है.

वार्ड को स्वच्छ बनाने के लिए पार्षद को सहना पड़ा अपमान

अपने शहर को स्वच्छता रैंकिंग में लाने के लिए सभी वार्डों के हर घर में सफाई की चुनौती शायद पार्षदों से बेहतर कोई नहीं जानता होगा. वार्डों में कई लोग ऐसे भी होते हैं जो सफाई के महत्व को नहीं समझते और ऐसे ही लोगों की वजह से पूरे वार्ड में गंदगी फैली रहती है. ऐसी ही स्थिति का सामना कुछ साल पहले तक वार्ड नंबर 10 की पार्षद सोम मजूमदार देवनाथ को भी करना पड़ा था. सोमा ने अपने अपमान को नजरअंदाज किया और अपने वार्ड को साफ और स्वच्छ बनाया.

अपामनित होने के बाद भी खुद सफाई करने पहुंची गई पार्षद

सोमा बताती हैं कि वार्ड में सफाई की अपील करने पर उनके वार्ड के एक परिवार ने उनके साथ बदतमीजी की और कई अन्य लोगों को इस पहल से बुरा लगा. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और वे अगले दिन खुद ही झाड़ू-पोंछा लेकर उस परिवार के घर में सफाई करने पहुंच गईं. एक पार्षद को इस तरह सफाई के लिए घर पर आना देखकर वार्ड के लोग आश्चर्यचकित रह गए. जिन लोगों ने उन्हें अपमानित किया था उन्हें भी अपनी गलती का एहसास हुआ.

नगर निगम के कर्मचारियों ने सोमा को सफाई करने से मना किया, लेकिन उन्होंने किसी की भी परवाह किए बिना सफाई की और उसे आगे भी जारी रखा. अब स्थिति यह है कि जहां सबसे ज्यादा गंदगी रहती थी, आज वो वार्ड सबसे ज्यादा स्वच्छ हो गया है. इतना ही नहीं अगरतला नगर निगम के कर्मचारियों के साथ कंधे से कंधा मिलाते हुए उन्होंने अपने वार्ड की तमाम नालियां साफ कराई. वार्ड में पानी इतना स्वच्छ हो गया कि वार्ड में बनने वाले घरों के निर्माण में उसी नालियों के पानी का उपयोग होने लगा.

इंदौर के स्वच्छता मॉडल को समझने को इंदौर आई हैं सोमा

सोमा मजूमदार बताती हैं कि “किसी भी काम को करने के लिए इच्छा शक्ति जरूरी है. यही इंदौर में हो रहा है. यहां के शहर की जनता का संस्था के प्रति लगाव उसे स्वच्छता में शीर्ष मुकाम पर बनाये हुए है.” उन्होंने बताया कि इंदौर वास्तव में पहले नंबर पर रहने लायक है, क्योंकि यहां स्वच्छता को लेकर जो इनोवेशन होते हैं वह फिलहाल देश के किसी शहर में उतने प्रभावित तरीके से नहीं हो रहे हैं. सोमा मजूमदार के साथ अन्य पार्षदों का दल इंदौर में स्वच्छता मॉडल का अध्ययन करने पहुंचा है. जिसकी कोशिश है कि इंदौर की स्वच्छता की व्यवस्था को सीख कर त्रिपुरा की राजधानी अगरतला को भी स्वच्छता की दिशा में आगे बढ़ाया जा सके.

सोमा ने बनाया है वार्ड का अपना रेवेन्यू मॉडल

अगरतला में इंदौर की तरह प्रभावी कचरा कलेक्शन सिस्टम नहीं है. लिहाजा सोमा मजूमदार ने अपने क्षेत्र की स्व-सहायता समूहों की महिलाओं को अपने साथ जोड़कर खुद का कचरा कलेक्शन सिस्टम विकसित किया है. वह बताती हैं कि उनके वार्ड के जो रहवासी घर-घर से कचरा कलेक्शन की सुविधा चाहते हैं. वह उनसे 60 रुपए महीना लेती हैं, जो रहवासी यह चार्ज देता है उनके घर स्व-सहायता समूह से जुड़ी दो-दो महिलाओं की टीम ट्राईसाईकिल में कचरा कलेक्शन के लिए पहुंचती हैं.

इससे बाकी लोग भी मोटिवेट होकर पैसे जमा करते हैं. इससे वार्ड में विकास कार्यों के अलावा स्व-सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं के वेतन की भी व्यवस्था हो रही है. इस तरह सोमा मजूमदार अपने वार्ड को स्वच्छ रख पा रही हैं. सोमा एक सामान्य परिवार से आती हैं और पहली बार भाजपा से पार्षद चुनी गई हैं. वो अपने शहर को भी स्वच्छता में आगे ले जाना चाहती हैं इसलिए वो स्वच्छा का मॉडल सिखने के लिए इंदौर आई हैं.

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