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झारखण्ड

दिशोम गुरु शिबू सोरेन इंजीनियरिंग एंड मेडिकल कोचिंग सेंटर, यहां गढ़ा जा रहा झारखंड का भविष्य

रांची: झारखंड के सुदूर गांवों और पहाड़ी इलाकों में आज भी सुबह की शुरुआत खेत, जंगल और मजदूरी से होती है. यहां बच्चे स्कूल जाते जरूर हैं, लेकिन उनके सपनों की उड़ान अक्सर वहीं रुक जाती है, जहां परिवार की आर्थिक सीमाएं शुरू हो जाती हैं. किसी का पिता कुली है, किसी की मां मनरेगा में मजदूरी करती है, तो कोई किसान परिवार मौसम और फसल के भरोसे जिंदगी चलाता है. इन हालातों में डॉक्टर या इंजीनियर बनने का सपना देखना कई बार बच्चों को खुद ही अव्यवहारिक लगने लगता है. लेकिन अब झारखंड के इन्हीं आदिवासी और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए यह सपना धीरे-धीरे हकीकत में बदल रहा है. इसकी वजह है राज्य सरकार की एक बड़ी और दूरदर्शी पहल दिशोम गुरु शिबू सोरेन इंजीनियरिंग और मेडिकल कोचिंग संस्थान.

22 दिसंबर, जब सपनों को एक ठिकाना मिला

22 दिसंबर का दिन झारखंड के शिक्षा इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में दर्ज हो गया, जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस संस्थान का उद्घाटन किया. राज्य सरकार के अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग की यह पहल उन बच्चों के लिए शुरू की गई, जो प्रतिभाशाली तो हैं, लेकिन संसाधनों के अभाव में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी नहीं कर पाते थे.

यह संस्थान झारखंड के गरीब आदिवासी छात्रों को JEE और NEET की निशुल्क आवासीय कोचिंग उपलब्ध करा रहा है. देश के प्रतिष्ठित मोशन संस्थान द्वारा यहां शैक्षणिक मार्गदर्शन दिया जा रहा है, ताकि बच्चों को वही स्तर और गुणवत्ता मिले, जो बड़े निजी कोचिंग संस्थानों में मिलती है.

जहां फीस नहीं, सिर्फ मेहनत की कीमत है

इस संस्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां पढ़ाई से जुड़ा कोई भी खर्च छात्रों को नहीं उठाना पड़ता. पढ़ाई, किताबें, स्टडी मटीरियल, टेस्ट सीरीज, अनुभवी शिक्षकों का मार्गदर्शन सब कुछ निशुल्क है. इसके साथ ही छात्रों के रहने के लिए सुरक्षित छात्रावास, पढ़ने के लिए लाइब्रेरी और भोजन की पूरी व्यवस्था की गई है. यह व्यवस्था उन परिवारों के लिए राहत बनकर आई है, जिनके लिए प्राइवेट कोचिंग की फीस सपने तोड़ने जैसी होती थी. यहां बच्चे सिर्फ एक ही चिंता के साथ रहते हैं अच्छा पढ़ना और परीक्षा में सफल होना.

संघर्ष की पृष्ठभूमि से निकलती उम्मीद

इस संस्थान में पढ़ने वाले बच्चों की कहानियां किसी एक जैसी नहीं हैं, लेकिन दर्द और संघर्ष सबका लगभग समान है. किसी छात्र के पिता कुली का काम करते हैं, किसी छात्रा की मां मनरेगा में ईंट ढोती है, तो कोई किसान का बेटा है, जिसने बचपन से फसल खराब होने की चिंता देखी है. NEET की तैयारी कर रही एक छात्रा बताती है कि पहले बड़े सपने देखने से डर लगता था. संसाधनों की कमी ने आत्मविश्वास को दबा दिया था. लेकिन अब जब सरकार ने यह अवसर दिया है, तो उसे लगने लगा है कि वह भी डॉक्टर बन सकती है.

मेधा का चयन, सिफारिश नहीं

इस संस्थान में दाखिला किसी पहचान या सिफारिश के आधार पर नहीं होता. इसके लिए प्रवेश परीक्षा आयोजित की जाती है, जिसमें सफल होने वाले मेधावी छात्रों को ही चयनित किया जाता है. इस प्रक्रिया ने यह सुनिश्चित किया है कि यह अवसर सही मायनों में उन बच्चों तक पहुंचे, जो मेहनती हैं और आगे बढ़ने की क्षमता रखते हैं. यह चयन प्रक्रिया बच्चों में एक जिम्मेदारी का भाव भी पैदा करती है कि उन्हें जो अवसर मिला है, उसका पूरा लाभ उठाना है.

‘मन की बात’ से राष्ट्रपति भवन तक पहुंची एक छात्रा

इसी संस्थान में पढ़ने वाली एक छात्रा की कहानी आज बाकी छात्रों के लिए प्रेरणा बन चुकी है. इस छात्रा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम में सवाल पूछा था, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर सुना गया. इतना ही नहीं, इस उपलब्धि के बाद उसे राष्ट्रपति भवन से आमंत्रण भी मिला, जहां वह एक बार जा चुकी है. एक साधारण परिवार से आने वाली इस छात्रा के लिए यह अनुभव असाधारण था. आज जब वह अपने साथियों के बीच बैठकर पढ़ाई करती है, तो उसकी कहानी बाकी बच्चों को यह भरोसा देती है कि मेहनत और अवसर मिल जाए, तो रास्ते कहीं तक भी जा सकते हैं.

यहां भविष्य गढ़ा जा रहा है

रांची के हिंदपीढ़ी इलाके में स्थित यह आवासीय परिसर आज सिर्फ एक संस्थान नहीं, बल्कि उम्मीद का ठिकाना बन चुका है. यहां पढ़ने वाले बच्चे खुद को अब सीमित नहीं मानते. वे अपने गांव, परिवार और समाज के लिए कुछ कर गुजरने का सपना देखने लगे हैं. यहां शिक्षा को किसी एहसान की तरह नहीं, बल्कि एक अवसर की तरह लिया जा रहा है. एक ऐसा अवसर जो जिंदगी की दिशा बदल सकता है.

दिशोम गुरु शिबू सोरेन के नाम पर एक मजबूत संदेश

इस संस्थान का नाम दिशोम गुरु शिबू सोरेन के नाम पर रखा जाना केवल एक औपचारिकता नहीं है. यह नाम आदिवासी समाज के संघर्ष, अधिकार और स्वाभिमान का प्रतीक है. उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए यह संस्थान शिक्षा के माध्यम से आदिवासी समाज के भविष्य को मजबूत करने का काम कर रहा है. यह सिर्फ एक कोचिंग सेंटर नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की एक प्रयोगशाला है, जहां से निकलने वाले डॉक्टर और इंजीनियर आने वाले वर्षों में झारखंड की तस्वीर बदल सकते हैं.

जब शिक्षा बनती है सामाजिक न्याय का माध्यम दिशोम गुरु शिबू सोरेन इंजीनियरिंग एवं मेडिकल कोचिंग संस्थान यह साबित करता है कि अगर सरकार की नीयत साफ हो और नीति सही दिशा में हो, तो शिक्षा सामाजिक न्याय का सबसे मजबूत औजार बन सकती है. यहां पढ़ रहे बच्चे सिर्फ अपने लिए नहीं पढ़ रहे, बल्कि अपने परिवार, अपने समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक नई राह तैयार कर रहे हैं.

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