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झारखण्ड

Jharkhand Bazar Samiti Crisis: झारखंड में दम तोड़ रहीं 28 बाजार समितियां; FD तोड़कर दी जा रही है कर्मचारियों को सैलरी

रांची: झारखंड में किसानों को उपज का सही मूल्य दिलाने और व्यापार को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई कृषि बाजार समितियां वर्तमान में खुद अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रही हैं। सरकारी आंकड़े और रिकॉर्ड्स गवाही देते हैं कि पूरे राज्य में कुल 28 बाजार समितियां चिन्हित हैं, लेकिन इनमें से आधी से ज्यादा गंभीर वित्तीय घाटे (Financial Loss) की मार झेल रही हैं। हालत इस कदर बदतर हो चुकी है कि इस घाटे को दूर करने के लिए ठोस नीतिगत उपाय करने के बजाय, बाजार समितियों के फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) को समय से पहले तोड़कर (निकालकर) कर्मचारियों को वेतन (सैलरी) बांटा जा रहा है। इन विषम हालातों के बीच, झारखंड के गरीब स्थानीय किसानों को उम्मीद थी कि सरकार जल्द ही कोई मजबूत नियमावली बनाएगी और स्थानीय खेती की उपज की बिक्री के लिए पर्याप्त सरकारी मदद देगी, लेकिन धरातल पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

📁 सरकारी फाइलों के चक्कर काट रही है नई कृषि उत्पाद नियमावली: बाहरी राज्यों के सामान से सजे बाजार, किसान बेहाल

विगत एक साल से भी अधिक समय से नई कृषि उत्पाद नियमावली फाइलों में उलझकर केवल टेबल-दर-टेबल घूम रही है। कृषि विभाग से शुरू होकर यह फाइल वित्त विभाग और विधि विभाग की संशयात्मक आपत्तियों से गुजरते हुए कृषि मंत्री के दफ्तर तक तो पहुंची, लेकिन पुरानी और नई नियमावली के बीच अंतर को स्पष्ट करने और इसके दूरगामी लाभों की समीक्षा करने की कानूनी प्रत्याशा (लूपहोल) में फंसी पड़ी है। जाहिर तौर पर जब नियमावली ही स्वीकृत नहीं होगी, तो पूरा कामकाज भगवान भरोसे ही चलेगा। कुछ ऐसी ही बदहाल स्थिति रांची सहित राज्य की अन्य सभी बाजार समितियों की है। इसका सीधा असर यह हो रहा है कि दूसरे राज्यों के बाहरी आयातित सामानों से झारखंड की बाजार समितियों की दुकानें तो सजी रहती हैं, लेकिन हमारे अपने स्थानीय किसान या तो सड़कों के किनारे औने-पौने दामों में या फिर शातिर बिचौलियों के हाथों अपनी खून-पसीने की मेहनत की उपज को बेचने के लिए मजबूर हैं।

📊 आंकड़ों की नजर में झारखंड कृषि विपणन परिषद का ढांचा: आधे से ज्यादा पद खाली, 11 समितियां बंद होने के कगार पर

राज्य के कृषि विपणन तंत्र की रीढ़ माने जाने वाले इस विभाग की जमीनी हकीकत इन महत्वपूर्ण आंकड़ों से समझी जा सकती है:

  • 🌾 कुल बाजार संरचना: राज्य भर में 28 मुख्य बाजार समितियां, 95 उप बाजार प्रांगण और 605 साप्ताहिक ग्रामीण हाट बाजार चिन्हित हैं।

  • 👥 कर्मचारियों का घोर अभाव: बाजार समितियों में सुचारू संचालन के लिए कुल 935 स्वीकृत (सृजित) पद हैं, लेकिन वर्तमान में केवल 115 नियमित कर्मचारी ही कार्यरत हैं। बाकी सभी समितियां प्रभारी सचिवों के भरोसे चलाई जा रही हैं।

  • 🏚️ अस्तित्व का संकट: कुल 28 बाजार समितियों में से 11 समितियां पूरी तरह से अस्तित्वहीन होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं, जबकि 15 समितियां वित्तीय रूप से दिवालिया होकर केवल बैंक के फिक्स डिपॉजिट के भरोसे जिंदा हैं।

  • 📍 इन प्रमुख जिलों में हैं बाजार समितियां: रांची, जमशेदपुर, चाकुलिया, हजारीबाग, रामगढ़, डालटनगंज, बोकारो, बेरमो, गढ़वा, मधुपुर, गुमला, सिमडेगा, लोहर्दगा, कोडरमा, सरायकेला, गोड्डा, खूंटी, धनबाद, गिरिडीह, साहिबगंज, बरहरवा, लातेहार, पाकुड़, चतरा, चाईबासा, जामताड़ा और दुमका।

💼 लंबे इंतजार के बाद बना बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स लेकिन एमडी (MD) का पद महीनों से खाली: अध्यक्ष रविंद्र सिंह ने दी सफाई

किसानों की इस गंभीर समस्या को दूर करने और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूती प्रदान करने के लिए गठित राज्य के कृषि विपणन परिषद को लंबे अरसे के बाद आखिरकार नया ‘बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स’ तो मिल गया है। बीते 16 अप्रैल को कृषि विपणन परिषद के अध्यक्ष रविंद्र सिंह के नेतृत्व में 11 सदस्यीय बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स का गठन किया गया। हालांकि, विडंबना यह है कि इसमें अध्यक्ष के अलावा बाकी सदस्यों का औपचारिक चयन अभी बाकी है। नियमावली के अनुसार, विभाग के जो विभागीय सचिव होंगे, वही विपणन परिषद के पदेन प्रबंध निदेशक (MD) होंगे। एक तरफ सरकार ने बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के लिए बड़ी अधिसूचना जारी कर दी है, वहीं दूसरी ओर विपणन परिषद में एमडी का मुख्य प्रशासनिक पद महीनों से खाली पड़ा है। ऐसे में बोर्ड की बैठकों और महत्वपूर्ण फैसलों पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है। इस संबंध में झारखंड कृषि विपणन परिषद के अध्यक्ष रविंद्र सिंह कहते हैं कि, “बाजार समिति को सुदृढ़ करने के लिए सरकार पूरी तरह से कृतसंकल्पित है और इस दिशा में लगातार सकारात्मक कदम बढ़ाए जा रहे हैं। बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के पूर्ण गठन के बाद इसके माध्यम से समुचित और बड़े नीतिगत निर्णय लिए जा सकेंगे। यह सच है कि वर्तमान में झारखंड की बाजार समितियां बदहाल स्थिति से गुजर रही हैं, लेकिन इन्हें वापस पटरी पर लाने के लिए प्रक्रियाधीन नियमावली पर जल्द ही विचारोपरांत अंतिम निर्णय लिया जाएगा।”

😡 बुनियादी सुविधाओं के अभाव से बाजार समिति के व्यापारियों में भारी आक्रोश: चैंबर ऑफ कॉमर्स ने अवैध वसूली पर उठाए सवाल

राज्य का सबसे बड़ा और व्यावसायिक रूप से हमेशा फायदे में रहने वाला राजधानी रांची का ‘पंडरा बाजार समिति’ भी वर्तमान में घोर प्रशासनिक उपेक्षा और बदहाली के दौर से गुजर रहा है। यहाँ के स्थानीय व्यवसायी बुनियादी सुविधाओं के अभाव को लेकर सरकार और विपणन बोर्ड से खासे नाराज हैं। झारखंड चैंबर ऑफ कॉमर्स (Jharkhand Chamber of Commerce) के बाजार समिति अध्यक्ष संजय महुरी ने तीखे लहजे में सवाल उठाते हुए कहा कि, “सरकार आखिर यह नई नियमावली किसके लिए और किस फायदे के लिए लाना चाहती है? यहाँ तो स्थानीय किसानों के कृषि उत्पादों का कोई वास्तविक या संगठित व्यापार होता ही नहीं है। अगर सरकार केवल दूसरे राज्यों से आयातित होने वाले सामानों पर टैक्स लगाकर अपना खजाना भरना चाहती है, तो व्यापारी इसका पुरजोर विरोध करेंगे। सरकार को चाहिए कि पहले वह अपने राज्य के किसानों की फसलों को सुरक्षित बाजार समिति तक लाने की पक्की व्यवस्था करे, न कि केवल टैक्स और अवैध वसूली के लिए इस तरह की जटिल नियमावली व्यापारियों पर थोपने का काम करे।”

वरिष्ठ व्यवसायी मूलचंद जैन ने भी बुनियादी ढांचे पर चोट करते हुए कहा कि बाजार समिति परिसर के भीतर प्राथमिक सुविधाओं का घोर अभाव है। न तो पुराने पड़ चुके व्यावसायिक भवनों और दुकानों की कोई मरम्मत कराई जाती है और न ही जर्जर सड़कों, बिजली और शुद्ध पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं टैक्स देने वाले व्यापारियों को मुहैया कराई जाती हैं। रांची बाजार समिति में हर दिन छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे विभिन्न पड़ोसी राज्यों से सैकड़ों मालवाहक गाड़ियां और ट्रक आते हैं, हजारों मजदूर दिन-रात काम करते हैं, लेकिन उनके ठहरने या न्यूनतम मानवीय सुविधाओं के लिए यहाँ कोई उचित व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।

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