ब्रेकिंग
Supreme Court News: चुनाव आयोग के कामकाज और EVM तकनीक की जांच की मांग, सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई न... Delhi Air Pollution News: प्रदूषण के स्रोतों का लगेगा सटीक पता, दिल्ली में लॉन्च हुई Real-Time Sourc... Jammu and Kashmir Politics: एलजी मनोज सिन्हा से मिले मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, जल्द शपथ लेंगे नए मं... Samba News: जम्मू-कश्मीर के सांबा में मिला संदिग्ध कबूतर, पैर में कोड रिंग, उर्दू नोट और पाकिस्तानी ... Churu Road Accident: तारानगर रोड पर दर्दनाक सड़क हादसा, कार और ट्रेलर की भिड़ंत में एक ही परिवार के ... Ravi Shankar Prasad PC: रामलीला मैदान में प्रस्तावित रैली की तारीख को लेकर विवाद, बीजेपी ने राहुल गा... Noida News: सेक्टर-125 के कैफे में लगी भीषण आग, गैस रिसाव के चलते चार दुकानें चपेट में आईं Budaun Crime News: शराब के नशे में खूनी संघर्ष, पिता ने कुल्हाड़ी से गला काटकर की बेटे की बेरहमी से ... Gwalior News: नीट की तैयारी कर रही नाबालिग से लिफ्ट के बहाने रेप, वीडियो बनाकर 10 महीने तक किया ब्लै... Rajasthan Cyber Crime: ऑनलाइन गोल्ड ट्रेडिंग के नाम पर 12 करोड़ की ठगी का खुलासा, मुख्य आरोपी विशाखा...
देश

क्या है ‘रोमियो एंड जूलियट’ क्लॉज? सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा— “सहमति वाले किशोरों को अपराधी मानना बंद करें”

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) में जरूरी संशोधन करते हुए रोमियो-जूलियट खंड को इसका हिस्सा बनाए, जिससे इस कानून का दुरुपयोग रोका जा सके. चूंकि यह कानून बेहद सख्त है, ऐसे में शरारती तत्व इसका बेज लाभ उठा रहे हैं. वर्तमान में इस कानून के तहत 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को बच्चा माना गया है और उसकी सहमति को वैधानिक रूप से मान्य नहीं माना जाता. अगर केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुरूप संशोधन करती है तो किशोरों या युवाओं के बीच आपसी सहमति से बने प्रेम संबंध गंभीर अपराध नहीं माने जाएंगे.

आइए, सर्वोच्च अदालत के आदेश के बहाने समझते हैं कि आखिर क्या है रोमियो-जूलियट खंड की अवधारणा? कैसे इसका लाभ समाज को मिलेगा?

रोमियो-जूलियट खंड क्या है?

रोमियो-जूलियट खंड मूल रूप से ऐसा कानूनी प्रावधान है जो आपसी सहमति से बने किशोर या युवा प्रेम संबंधों को गंभीर अपराध की श्रेणी से बाहर रखने का प्रयास करता है. बशर्ते दोनों पक्षों की उम्र में अंतर बहुत अधिक न हो. संबंध में जबरदस्ती, शोषण, हिंसा या धोखाधड़ी न हो. संबंध पूरी तरह सहमति पर आधारित हो. इसका नाम प्रसिद्ध साहित्यिक पात्र रोमियो और जूलियट से लिया गया है, जो युवा प्रेम का प्रतीक माने जाते हैं. कई देशों में इस प्रकार का प्रावधान पहले से मौजूद है ताकि कम उम्र के प्रेम संबंधों को बलात्कार या गंभीर यौन अपराधों के समान न माना जाए.

पॉक्सो एक्ट में समस्या कहां से शुरू हुई?

पॉक्सो एक्ट का उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा है, लेकिन व्यवहार में इसके कुछ प्रावधानों से जटिल स्थितियां पैदा हुईं.

  • 18 वर्ष से कम उम्र में सहमति अमान्य: कानून के अनुसार, भले ही लड़की या लड़का 1617 वर्ष का हो और उसने स्वेच्छा से संबंध बनाया हो, उसे कानूनी रूप से सहमति नहीं माना जाता.
  • परिवार की शिकायतें: कई मामलों में प्रेम संबंध से नाराज़ परिवार पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज करवा देते हैं, जिससे युवक को गंभीर अपराधी के रूप में जेल तक जाना पड़ता है.
  • कानून का दुरुपयोग: अदालतों के सामने ऐसे अनेक मामले आए जहाँ आपसी सहमति के रिश्तों को भी बलात्कार या यौन शोषण के मामलों में बदल दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट की भूमिका और निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न मामलों की सुनवाई के दौरान यह माना कि पॉक्सो एक्ट का अंधाधुंध और यांत्रिक उपयोग हो रहा है. सहमति से बने किशोर प्रेम संबंधों को भी गंभीर अपराधों में गिना जा रहा है. इससे न केवल युवाओं का भविष्य बर्बाद होता है, बल्कि कानून का मूल उद्देश्य भी कमजोर पड़ता है. इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह पॉक्सो एक्ट में रोमियो-जूलियट खंड जैसे प्रावधान को शामिल करने पर गंभीरता से विचार करे, ताकि सहमति से बने कम उम्र के रिश्तों और वास्तविक यौन अपराधों के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सके.

रोमियो-जूलियट खंड की जरूरत क्यों?

  • सामाजिक वास्तविकता की स्वीकार्यता: आज के समय में किशोरावस्था में प्रेम संबंध बनना एक सामाजिक सच्चाई है. कानून को इस वास्तविकता से पूरी तरह आंख मूंद लेना व्यावहारिक नहीं माना जा रहा.
  • न्यायिक प्रणाली पर बोझ कम करना: आपसी सहमति वाले मामलों से अदालतों पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है, जिससे गंभीर अपराधों की सुनवाई प्रभावित होती है.
  • युवाओं के भविष्य की सुरक्षा: एक छोटी उम्र के प्रेम संबंध के कारण किसी युवक को आजीवन अपराधी बना देना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता.
  • कानून के दुरुपयोग को रोकना: रोमियो-जूलियट खंड से परिवार या समाज द्वारा कानून के बदले की भावना से किए जाने वाले दुरुपयोग पर अंकुश लगाया जा सकता है.

कैसा हो सकता है रोमियो-जूलियट खंड का स्वरूप?

अभी तो सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए हैं. इसे असली रूप देने की जिम्मेदारी संसद की है. सरकार की है. यह अभी अंतिम रूप से तय होना शेष है. इसमें समय भी लग सकता है. लेकिन माना जा रहा है कि अगर सरकार इस मसले पर विचार करके कोई सकारात्मक फैसला लेती है तो उम्र का अंतर सीमित हो सकता है. यह केवल आपसी सहमति वाले मामलों में लागू होगा. नाबालिग के खिलाफ किसी भी प्रकार की जबरदस्ती, धमकी या शोषण होने पर यह लागू नहीं होगा. गंभीर यौन अपराधों को इससे कोई छूट नहीं मिलेगी.

आलोचना और चिंता

जहां एक ओर इस खंड का समर्थन हो रहा है, वहीं कुछ चिंता भी सामने आई हैं. कुछ लोगों का मानना है कि इससे शोषण करने वाले लोग भी सहमति का बहाना बना सकते हैं. यह तय करना कि सहमति वास्तविक थी या दबाव में, हमेशा आसान नहीं होता. ग्रामीण या कमजोर वर्गों में लड़कियों पर सामाजिक दबाव को नजरअंदाज करने का खतरा हो सकता है.

सुप्रीम कोर्ट और कानूनी विशेषज्ञों का जोर इस बात पर है कि कानून सुरक्षा और संवेदनशीलता दोनों को संतुलित करे. वास्तविक यौन अपराधियों को सख्त सजा मिले. लेकिन सहमति से बने किशोर संबंधों को अपराध की तरह न देखा जाए. रोमियो-जूलियट खंड का उद्देश्य कानून को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसे और अधिक न्यायपूर्ण, व्यावहारिक और मानवीय बनाना है.

रोमियो-जूलियट खंड की अवधारणा पॉक्सो एक्ट में एक महत्वपूर्ण सुधार के रूप में देखी जा रही है. सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश इस बात का संकेत है कि कानून को समय, समाज और व्यावहारिक अनुभवों के अनुसार विकसित होना चाहिए. यदि इस खंड को स्पष्ट, सीमित और सावधानीपूर्वक लागू किया जाता है, तो यह बच्चों की वास्तविक सुरक्षा बनाए रख सकता है. युवाओं के भविष्य को अनावश्यक रूप से बर्बाद होने से बचा सकता है और न्याय व्यवस्था को अधिक संतुलित बना सकता है. इस सुधार का उद्देश्य यही होना चाहिए कि कानून अपराध को रोके, न कि मासूम रिश्तों को अपराधी बना दे.

Related Articles

Back to top button