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ऑक्सफोर्ड की टॉपर और वो ‘खौफनाक’ 120 मिनट! लूसी की जिंदगी में उस दिन क्या हुआ, जिसने बदल दिया सब कुछ? रोंगटे खड़े कर देगी ये कहानी

भोपाल: लंदन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग में बैचलर्स और मास्टर्स पूरा कर चुकी थी लूसी. इन्वेंस्टमेंट बैकिंग की एक कंपनी में नौकरी कर रही थी. 28 बरस की थी वो जब उनकी पूरी ज़िंदगी को 365 डिग्री पर बदल देने वाले दो घंटे आए. लूसी के ही शब्दों में हाथ में सब कुछ था लेकिन मन खाली. क्या ये डिग्रियां, ये नौकरी में है लूसी. या उसे खुद को तलाशना है अभी. मैं कौन हूं ये सवाल मुझे बेचैन किए था. और फिर लूसी की ज़िंदगी में वो दो घंटे आए. जिसके बाद लूसी ने मन की सुनी और मुल्क की सरहदें लांघ दीं.

लूसी की जिंदगी के वो दो घंटे और पूरी जिंदगी बदल गई

डॉ. लूसी गेस्ट ने अपनी मेहनत से अपनी जिंदगी से वो सबकुछ पा लिया था जिसका कोई सपना देखता है. ऑक्सफोर्ड जैसी यूनिवर्सिटी में पढ़ाई और उसके बाद बैकिंग की अच्छी खासी नौकरी. भोपाल में छठवी अंतर्राष्ट्रीय योगिनी कॉन्फ्रेंस में शामिल होने पहुंची लूसी खुद बताती हैं और वो भी धाराप्रवाह हिंदी में. वे कहती हैं मेरी जीवन यात्रा में मैने कई पर्वत चढ़े उतरे. लेकिन 28 बरस की उम्र में जब मैं बैकिंग में काम कर रही थी एक सवाल मुझे घेरने लगा कि मैं कौन हूं?

वे बताती हैं मैं एक साधना कक्ष में गई. दो घंटे वहां साधना में रही. वहां विज्ञानदेव महाराज ने हमको ध्यान सिखाया. बस यूं समझिए कि वो दो घंटे मेरा जीवन बदलने वाले थे. उस दो घंटे में मेरा पूरा जीवन बदल गया. वहां गुरु जी से मुलाकात हुई.. ब्रम्हऋषि विश्वात्मा बावरा जी महाराज. बस उसके बाद सब बदलता ही गया. मैंने पहले नौकरी छोड़ी और तीन महीने के लिए पहली बार 2000 में भारत आ गई.

तीन महीने को आई लूसी फिर लंदन लौटी ही नहीं

लूसी की आंखों में वो दिन आज भी दर्ज है. वे बताती हैं, गुरुजी ने मुझसे कहा कि आध्यात्म की इसी राह पर अब भारत चलना है. शुरुआत में मेरा वीजा केवल तीन महीने का ही था. लेकिन फिर मैं ऐसी रमी भारत आकर कि स्टूडेंट वीजा मिला और मैंने तय किया कि मैं योग साधना के साथ वेदों का अध्ययन करूंगी. संस्कृत सीखूंगी-पढ़ूंगी. शुरुआत हाईस्कूल से की फिर बैचलर्स और मास्टर्स डिग्री की. बैचलर डिग्री में मैं गोल्ड मेडलिस्ट हूं.

वे बतााती हैं, वो 2000 का वर्ष था. हरिद्वार में गुरुजी प्रतीक्षा कर रहे थे. मैने सोच लिया कि अभी तो पढ़ूंगी. मैने संस्कृत का अध्ययन किया और लौटना स्थगित ही हो गया. लूसी अब दिव्यप्रभा हो चुकी थीं. वे कहती हैं, मैने संस्कृत व्याकरण में पीएचडी की. डॉ लूसी बन गई. स्वामी जी के सथ गुरुकुल की स्थापना की. संस्कृत में दूसरी पीएचडी कर रही हूं.

लूसी से सुनिए भारत की परिभाषा

लूसी के मुताबिक भारत का अर्थ है जो आपको दिव्य प्रकाश से युक्त कर दे. विश्व कल्याण और विश्व शांति के मार्ग पर ले जाए. वे कहती हैं योग हमें स्थित प्रज्ञ होना सिखाता है. किंतु मोह से मुक्ति जरूरी है. वे कहते हैं कि अपने जीवन के उत्थान के लिए सबसे सरल मार्ग है, मंत्र. मंत्र आपको मनन करने से सुरक्षित करते हैं. अर्थात व्यर्थ के विचारों से आपको बचाते हैं. और सबसे सरल दिव्य बीज मंत्र है ऊं. वे उपनिषद और वेद का उदाहरण देते हैं.

ओंकार आपको दुख से अत्यंत सुख तक लेकर जाएंगे और आपको अमृत की प्राप्ति हो जाएगी. पच्चीस बरस पहले तीन महीने के लिए भारत आई लूसी अब भारत की ही हो गई. अब उनका नाम दिव्यप्रभा है वे काशी में बस गई हैं. वह संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से संस्कृत में फिर पीएचडी कर रही हैं.

लूसी यानि दिव्यप्रभा अब काशी की हो

योग साधना के लिए यहां आकर भगवतगीता का अध्ययन किया. देवनागिरी पढ़ रही थी, मैंने देखा कि इतनी गंभीर शांति विद्या संस्कृत पढ़ने की इच्छा पैदा हुई. यही है परिवर्तित हो जाता है. मंत्र जपेंगे. मंत्र करने से जो वृत्ति होती है मन में उससे सुरक्षा हो जाती है. गलत विचार हट जाते हैं. एक प्रकार का परिवर्तन हुआ. इससे वेद मंत्र, गीता पढ़ने में संस्कृत पढ़ने में और गंभीर से परिवर्तन हो जाता है.

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