आर्थिक मुख्यधारा का हिस्सा बनें मजदूर: पलायन रोकने के लिए गांव में ही रोजगार उपलब्ध कराने होंगे

लॉकडाउन में ढील के बाद जब कारोबारी गतिविधियों को बल देने की कोशिश हो रही है तब मजदूरों और कामगारों की बदहाली की भी खबरें आ रही हैं। सबसे दुखद यह है कि तमाम मजदूर भूखे-प्यासे पैदल ही अपने गांव-घर जाने को मजबूर हैं। उनकी हालत को देखते हुए सरकार को अर्थव्यवस्था का पुनर्गठन इस तरह करना चाहिए ताकि मजदूरों को फिर कभी ऐसी हालत से दो-चार न होना पड़े। हमारी सरकारें इससे अनभिज्ञ नहीं हो सकतीं कि काम की तलाश में हजारों-लाखों की संख्या में मजदूर पास या दूर के बड़े शहरों की तरफ पलायन करते हैं ताकि अपने परिवार का पालन-पोषण कर सकें।
दैनिक मजदूरों के पास सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य सुरक्षा का अभाव होता है
इनमें ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा होती है जो या तो कम पढ़े-लिखे या फिर निरक्षर होते हैं। ये निर्माण क्षेत्र में लगे दैनिक मजदूर भी होते हैं और कारखानों, ढाबों आदि में काम करने वाले भी। ये रेहड़ी वाले, दूसरों के घरों में साफ-सफाई करने या खाना बनाने वाले भी होते हैं। इनके पास परिसंपत्तियों के नाम पर कच्चे घर या झुग्गी बस्ती होती है। इनके पास सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी सुरक्षा का अभाव होता है। अभाव वाले इस वर्ग में बच्चे और महिलाएं अधिक संवेदनशील हैं।
मजदूरों और कामगारों का रोजगार सुरक्षित नहीं होता
तमाम मजदूरों और कामगारों का रोजगार सुरक्षित नहीं होता। उन्हें बिना किसी कारण कभी भी काम से हटाया जा सकता है। कुछ मौसम में जब काम कम होता है तो उन्हें काम से छुट्टी भी दे दी जाती है। कई की तो रोजी-रोटी नियोक्ता की पसंद पर निर्भर होते हैं। उनके पास ओवरटाइम, बीमारी की छुट्टी और कभी-कभी तो साप्ताहिक छुट्टी का भी कोई प्रावधान नहीं होता।
केंद्र की कई योजनाओं ने इन श्रमिकों की समस्याओं का कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया
यद्यपि उनके लिए अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं जैसे वृद्धावस्था पेंशन योजना, हथकरघा बुनकर योजना, जननी सुरक्षा योजना, राष्ट्रीय पारिवारिक लाभ योजना, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना, अटल पेंशन योजना आदि। 2019 में प्रधानमंत्री श्रमयोगी मानधन योजना भी प्रारंभ की गई। बावजूद इसके इन श्रमिकों की समस्याओं का कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है।
मजदूर आपात स्थिति में देश के एक कोने से दूसरे कोने में भटकने को मजबूर
वे आपात स्थिति में देश के एक कोने से दूसरे कोने में भटकने को मजबूर होते हैं। गांवों में कृषि योग्य भूमि कम होने, आबादी बढ़ने और प्राकृतिक आपदाओं के चलते रोजी-रोटी की तलाश में ग्रामीणों को शहरों की तरफ रुख करना पड़ता हैं। गांवों में बुनियादी सुविधाओं की कमी भी पलायन का एक बड़ा कारण है। इसके अलावा गांवों में रोजगार एवं शिक्षा के साथ-साथ बिजली, आवास, सड़क, संचार, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं शहरों की तुलना में काफी कम हैं। गांवों में भेदभावपूर्ण सामाजिक व्यवस्था से तंग आकर भी लोग शहरों की ओर पलायन करते हैं। ऐसे में शहरों में जनसंख्या घनत्व बढ़ने से शहरीकरण बढ़ने लगता है, जिससे वहां संसाधनों पर दबाव बढ़ता है।
आर्थिक असमानता के चलते कुछ क्षेत्र विकास की दौड़ में पिछड़ गए
भारत में आर्थिक असमानता एवं क्षेत्रीय असमानता के कारण कुछ क्षेत्रों का अधिक विकास हुआ है तो कुछ विकास की दौड़ में पिछड़ गए हैं। इन पिछड़े क्षेत्रों को अपने विकास के बारे में विशेष चिंता करनी होगी। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 45.36 करोड़ लोगों ने एक से दूसरे राज्य में पलायन किया।
महाराष्ट्र प्रवासी मजदूरों के लिए सबसे आकर्षक स्थान
2019 में जारी प्रवसन संबंधी रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र प्रवासियों के लिए सबसे आकर्षक स्थानों में से एक है। महाराष्ट्र में 5.74 करोड़ प्रवासी अन्य राज्यों से गए, जिनमें 27.55 लाख उप्र के, 5.68 लाख बिहार के, 5.17 लाख राजस्थान के और शेष अन्य राज्यों के थे। काम की तलाश में उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, राजस्थान, उत्तराखंड आदि राज्यों से दिल्ली, हरियाणा, मध्य प्रदेश, गुजरात आदि स्थानों की ओर श्रमिकों का पलायन अधिक होता है।
लॉकडाउन के बाद प्रवासी मजदूरों का शहरों से गांव की तरफ पुन: पलायन
लॉकडाउन के बाद शहरों से गांव की तरफ पुन: पलायन कर रहा है। कोरोना ने इनकी स्थितिदयनीय बना दी है। लॉकडाउन की स्थिति में केवल पंजीकृत श्रमिकों को ही वित्तीय सहायता मिली है। लाखों अपंजीकृत श्रमिकों को कुछ भी नहीं मिला। अब हमें इस पर ध्यान देना होगा कि ये गरीब लोग भी अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में शामिल हो सकें। इन तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए सबसे पहले असंगठित क्षेत्र के कामगारों को चिन्हित करना होगा।
सरकार को श्रमिकों के हितों को प्राथमिकता के आधार पर सुरक्षित करना चाहिए
सरकार को आंतरिक प्रवासन के कारणों की पहचान कर ठोस रणनीति बनानी चाहिए। सरकार को उद्योगों एवं सेवा क्षेत्र से तालमेल कर श्रमिकों के हितों को प्राथमिकता के आधार पर सुरक्षित करना चाहिए। केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारों को भी प्रवासी श्रमिकों के लिए आयुक्त जैसा सक्षम नियामक प्राधिकार बनाना चाहिए। अकुशल श्रमिकों की कुशलता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय कौशल मिशन कार्यक्रम के साथ समन्वय स्थापित किया जाना चाहिए ताकि उनकी कुशलता बढ़े और उनकी आय बढ़े।
प्रवासी श्रमिकों का न्यूनतम वेतन एवं कार्य भी सुनिश्चित करना चाहिए
केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के साथ मिलकर प्रवासी श्रमिकों का न्यूनतम वेतन एवं कार्य भी सुनिश्चित करना चाहिए। सामाजिक सुरक्षा के साथ-साथ उनका बीमा भी होना चाहिए। असंगठित क्षेत्र में मजदूरों को यूनियन बनाने में सरकार को ही मदद के लिए आगे आना होगा। श्रमिकों की जागरूकता का परिणाम यह होगा कि वे अपनी जरूरतों को सरकार के सामने रख सकेंगे। चिकित्सा देखभाल, दुर्घटना मुआवजा, काम करने के घंटे सुनिश्चित करना, उनके बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था, बैंक में खाता खुलवाने संबंधी उपायों पर विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। इसमें कारखाना मजदूरों के साथ रेहड़ी लगाने, घरों में सेवा देने वालों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
पलायन रोकने के लिए मनरेगा में मजदूरी बढ़ाकर गांव में ही रोजगार उपलब्ध कराना चाहिए
पलायन रोकने के लिए मनरेगा में मजदूरी बढ़ाकर लोगों को गांव में ही रोजगार उपलब्ध कराना चाहिए। यदि गांवों में शिक्षा के साथ-साथ बिजली, आवास, सड़क, संचार, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जाए तो भी लोगों का पलायन कम होगा।






