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Court Verdict: पत्नी की सैलरी 1.5 लाख, फिर भी मांगी एलिमनी; कोर्ट ने पति को राहत देते हुए अर्जी की खारिज

कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक पत्नी की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उसने अपने लिए तय गुजारा भत्ता बढ़ाने की मांग की थी. हाई कोर्ट ने पाया कि पति बेरोजगार था, जबकि पत्नी को अच्छी-खासी सैलरी मिल रही थी. पत्नी ने कोर्ट में यह दलील दी कि पति का उसकी पुश्तैनी जमीन-जायदाद में हिस्सा है और उसके नाम पर भी कुछ प्रॉपर्टी है, लेकिन वह कोर्ट के सामने इन जरूरी तथ्यों को छिपा रहा है. कर्नाटक हाई कोर्ट ने मामले के हालात का जायजा लिया और पाया कि पुश्तैनी प्रॉपर्टी में पति का ठीक-ठीक कितना हिस्सा है, यह अभी तय होना बाकी है. इसलिए इस आधार पर पत्नी का गुजारा भत्ता नहीं बढ़ाया जा सकता. हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी के फाइनेंशियल स्टेटमेंट से यह साफ जाहिर होता है कि वह अपने कानूनी खर्चों पर एक बड़ी रकम खर्च कर सकती है.

पत्नी के पति पर आरोप

वैसे दोनों की शादी 13 अप्रैल, 2009 को हुई थी, लेकिन शादी के कुछ ही समय बाद पत्नी ने ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम’ के तहत धारा 12 के तहत केस दायर कर दिया. उसने आरोप लगाया कि पति ने उससे एक ‘ओमनी’ कार की मांग की थी और जब उसकी यह मांग पूरी नहीं की गई, तो उसने पत्नी के साथ शारीरिक और मानसिक दुर्व्यवहार किया. पति ने इन सभी आरोपों से इनकार किया और लंबी सुनवाई के बाद, उसकी याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर ली.

पति के वकील की दलील

पति के वकील, एडवोकेट प्रदीप ने कोर्ट को बताया कि उनके मुवक्किल (पति) का एक स्कूल था, जो बाद में बंद हो गया. इसके चलते वह बेरोजगार हो गया और अब उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह किसी को गुजारा भत्ता दे सके. वकील ने इस बात पर भी जोर दिया कि पत्नी हर महीने 1.5 लाख रुपए से ज्यादा कमा रही है, इसलिए उसे उनके मुवक्किल से किसी भी तरह के अतिरिक्त गुजारा भत्ते की कोई जरूरत नहीं है.

वकील ने आगे बताया कि पति के पास सिर्फ एक एकड़ जमीन है, जिसे उसने 4.5 लाख रुपए के बदले बैंक के पास गिरवी रखा हुआ है. कर्नाटक हाई कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि पति ने पैसों की कमी का हवाला देते हुए गुजारा भत्ता देने के कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया था. हालांकि, कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि प्रॉपर्टी को गिरवी रखकर 4.5 लाख रुपए का इंतजाम कर पाने की पति की क्षमता से यह जाहिर होता है कि वह गुजारा भत्ता देने में असमर्थ नहीं है, बल्कि वह जान-बूझकर ऐसा करने से बचना चाहता है.

पत्नी के वकील की दलील

पति के वकील ने बताया कि 18 मार्च, 2026 को पति ने 10,000 रुपए का भुगतान कर दिया था, लेकिन उसने कोर्ट से गुहार लगाई कि वह बाकी की रकम चुकाने में असमर्थ है. पत्नी के वकील ने यह दलील दी कि पति का उसकी पुश्तैनी प्रॉपर्टी में भी हिस्सा है, इसलिए उसके पास न सिर्फ गुजारा भत्ता देने के लिए, बल्कि गुजारा भत्ते की रकम बढ़ जाने पर भी उसे चुकाने के लिए पर्याप्त साधन मौजूद हैं.

कोर्ट का आदेश

ऊपर बताए गए इन सभी फैक्टर्स को ध्यान में रखते हुए-विशेष रूप से पति के इस दावे को कि वह वर्तमान में बेरोजगार है (जिस पर पत्नी ने आपत्ति जताई थी)-कर्नाटक हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि गुजारा-भत्ता की राशि में और अधिक बढ़ोतरी करने का कोई औचित्य नहीं है. खासकर तब, जब पत्नी खुद नौकरी करती है और इस शादी से कोई संतान भी नहीं है. हाई कोर्ट ने फैसला सुनाने हुए आदेश कि रिवीजन याचिकाओं में जो आधार बताए गए हैं, वे विद्वान ट्रायल मजिस्ट्रेट द्वारा पारित और प्रथम अपीलीय न्यायालय द्वारा पुष्ट आदेशों में हस्तक्षेप करने के लिए शायद ही पर्याप्त हैं. ऐसे में रिवीजन याचिकाएं खारिज की जाती हैं.

इससे पहले कोर्ट ने क्या दिए थे आदेश

कोर्ट ने यह भरण-पोषण आदेश पारित किया था, जिसके विरुद्ध पत्नी ने कर्नाटक हाई कोर्ट में वृद्धि के लिए एक याचिका दायर की थी. उस समय कोर्ट ने आदेश दिया था कि पति को आदेश की तारीख से पीड़ित व्यक्ति (पत्नी) को किराए के मद में प्रति माह 5,000 रुपए का भुगतान करना होगा. पति को आदेश की तारीख से पीड़ित व्यक्ति (पत्नी) को भरण-पोषण के मद में प्रति माह 4,000 रुपए का भुगतान करना होगा. पति को निर्देश दिया जाता है कि वह पीड़ित व्यक्ति को मुआवजे के रूप में 40,000 रुपए का भुगतान करे. साथ ही कोर्ट ने कहा था कि पीड़ित व्यक्ति याचिका में मांगी गई किसी दूसरी राहत का हकदार नहीं है.

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