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झारखण्ड

Education Crisis: रांची यूनिवर्सिटी के ILS संस्थान पर BCI की टेढ़ी नजर; बुनियादी सुविधाओं के अभाव में कैसे होगी वकीलों की पढ़ाई?

रांची: रांची विश्वविद्यालय के मोरहाबादी स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज (ILS) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. एलएलएम जैसे प्रोफेशनल कोर्स की पढ़ाई यहां बिना एक भी नियमित शिक्षक के संचालित की जा रही है. दो बैच पासआउट भी हो चुके हैं, लेकिन छात्रों का आरोप है कि संस्थान में न तो बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के मानकों के अनुरूप शैक्षणिक सुविधाएं हैं और न ही पर्याप्त फैकल्टी.

अब इस मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने भी सख्त रुख अपनाते हुए सत्र 2026-27 में नए एडमिशन पर रोक लगा दी है. इंस्टीट्यूट में एलएलएम दो वर्षीय कोर्स के रूप में संचालित होता है, जिसमें चार सेमेस्टर हैं. प्रत्येक बैच में करीब 60 छात्रों का नामांकन होता है. इसके अलावा पांच वर्षीय बीबीए एलएलबी कोर्स भी संचालित है. बावजूद इसके, संस्थान में एक भी स्थायी शिक्षक नियुक्त नहीं है. कुल सात शिक्षक कार्यरत हैं और वे भी संविदा आधारित हैं, जिन्हें हर 11 महीने पर नियुक्त किया जाता है.

क्या है नियम

BCI लीगल एजुकेशन रूल 2008 के अनुसार किसी भी लॉ संस्थान में कम से कम 10 स्थायी लॉ फैकल्टी होना अनिवार्य है. नियमों के तहत स्थायी निदेशक और पर्याप्त शैक्षणिक संसाधनों की भी आवश्यकता होती है. छात्रों और विशेषज्ञों का आरोप है कि ILS इन मानकों पर खरा नहीं उतरता. हाल ही में नैक टीम ने भी स्थायी नियुक्ति को लेकर सवाल उठाए थे.

कोर्ट ने क्या कहा था

20 मार्च 2026 को झारखंड हाईकोर्ट की जस्टिस आनंदा सेन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए ILS में 2026-27 सत्र के नए एडमिशन पर पूर्ण रोक लगाने का निर्देश दिया. कोर्ट ने कहा कि जब तक BCI मानकों के अनुरूप मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जातीं और 10 योग्य लॉ शिक्षकों की नियुक्ति नहीं होती, तब तक नए छात्रों का नामांकन नहीं लिया जा सकता.

कोर्ट ने लाइब्रेरी, कॉमन रूम, मूट कोर्ट, स्पोर्ट्स फील्ड, कंप्यूटर सुविधा और अलग वॉशरूम जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी को गंभीर माना. इससे पहले 2024 और 2025 में भी BCI ने विश्वविद्यालय प्रशासन को कई कमियों की ओर ध्यान दिलाते हुए सुधार का निर्देश दिया था. इसके बावजूद 2025 बैच में एडमिशन लिया गया.

संस्थान की लाइब्रेरी भी सवालों के घेरे में

संस्थान की लाइब्रेरी भी सवालों के घेरे में है. यहां अधिकांश किताबें दान में मिली हैं और जर्नल की संख्या बेहद सीमित है. स्मार्ट बोर्ड लगे जरूर हैं, लेकिन उनका नियमित उपयोग नहीं होता. मूट कोर्ट की व्यवस्था भी बेहद छोटी है, जहां एक साथ केवल 10 छात्रों के बैठने की जगह है. नई बिल्डिंग होने के बावजूद दीवारों में रिसाव, गंदगी और खराब रखरखाव की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं.

क्या कहते हैं छात्र

छात्रों का कहना है कि उन्हें ऐसी डिग्री दी जा रही है जिसकी वैधता और भविष्य को लेकर संशय बना हुआ है. कई विद्यार्थियों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से लगातार BCI नियमों को लागू करने की मांग की, लेकिन कार्रवाई नहीं होने पर छात्रों अम्बेश चौबे, आर्यन देव, देवेश तिवारी और तुषार दुबे ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

संस्थान के निदेशक बिनोद नारायण ने कहा कि प्रबंधन अपने स्तर पर व्यवस्था सुधारने का प्रयास कर रहा है और छात्रों की समस्याओं के समाधान के लिए लगातार काम किया जा रहा है. वहीं रांची विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ. गुरुचरण साहू ने कहा कि यह वोकेशनल कोर्स के तहत संचालित होता है, इसलिए स्थायी पद सृजित नहीं किए जा सके हैं. उन्होंने बताया कि मूट कोर्ट और लाइब्रेरी के लिए राशि जारी की जा चुकी है तथा संस्थान का नाम बदलकर सेंटर फॉर लीगल एजुकेशन करने की प्रक्रिया चल रही है.

फिलहाल BCI की निगरानी और हाईकोर्ट के आदेश के बाद ILS की व्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है. अब देखना होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए कितनी तेजी से सुधारात्मक कदम उठाता है.

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