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छत्तीसगढ़

Kanker News: कांकेर में धार्मिक आस्था पर विवाद; ग्रामीणों का आरोप- बहिष्कार कर खेती और रोजगार से किया जा रहा वंचित

कांकेर जिले से एक चिंताजनक मामला सामने आया है, जहां कुछ परिवारों ने जिला प्रशासन और पुलिस के समक्ष सामाजिक बहिष्कार और आर्थिक प्रताड़ना की शिकायत दर्ज कराई है। पीड़ित परिवारों का आरोप है कि केवल एक विशेष आस्था का पालन करने के कारण उन्हें गांव में प्रताड़ित किया जा रहा है। उन्हें न केवल सामाजिक गतिविधियों से अलग-थलग किया जा रहा है, बल्कि खेती-किसानी और रोजगार के अवसरों से भी वंचित करने की धमकी दी जा रही है।

🚜 आजीविका और खेती पर संकट

पीड़ित ग्रामीण कमलेश मंडावी ने बताया कि यह मामला केवल प्रार्थना तक सीमित नहीं है, बल्कि अब उनकी रोजी-रोटी पर बन आई है। मानसून की दस्तक के साथ ही किसान खेती की तैयारी में जुटे हैं, लेकिन उन्हें खेत जोतने और बीज बोने से रोकने की चेतावनी दी जा रही है। उन्होंने बैंक से ऋण लेकर खेती की तैयारी की है, ऐसे में प्रतिबंध उनके परिवारों के लिए भुखमरी की स्थिति पैदा कर सकता है। वहीं, ज्योति दर्रो और मोतीलाल जैसे पीड़ितों का कहना है कि उन्हें तेंदूपत्ता संग्रहण, मनरेगा कार्यों और यहाँ तक कि पीने के पानी की पाइपलाइन से भी वंचित किया जा रहा है।

⚖️ संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन

पीड़ितों का कहना है कि वे भारतीय संविधान के तहत अपनी आस्था के अनुसार जीवन जीने के हकदार हैं। मोतीलाल ने स्पष्ट किया कि वे किसी विवाद के बजाय शांति से समाज में रहना चाहते हैं, लेकिन कुछ प्रभावशाली लोग उन्हें लगातार ‘ईसाई’ बोलकर प्रताड़ित कर रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी बच्चों को छात्रवृत्ति से वंचित रखा जाना प्रशासनिक लापरवाही और सामाजिक भेदभाव की ओर इशारा करता है।

👮 प्रशासन का रुख

मामले की गंभीरता को देखते हुए कांकेर एसडीएम अरुण कुमार वर्मा ने कहा कि अंतागढ़, कोयलीबेड़ा और भानुप्रतापपुर के ग्रामीणों से उन्हें शिकायत मिली है। उन्होंने संबंधित एसडीएम को उचित निर्देश दे दिए हैं। एसडीएम ने कहा, “धार्मिक आस्था के कारण किसी भी नागरिक को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित करना कानूनन गलत है। यह जांच का विषय है, जो भी दोषी पाया जाएगा उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।”

संपादकीय टिप्पणी: बस्तर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में परंपरा, संस्कृति और आस्था के बीच संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। क्या आपको लगता है कि प्रशासन को ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ‘शांति समितियों’ को और अधिक सक्रिय करना चाहिए ताकि गांव के भीतर ही आपसी विवादों का समाधान हो सके? अपने विचार नीचे साझा करें।

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