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झारखण्ड

धनबाद में थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों का जीवन संकट में, खून चढ़ाने के अलावा स्वास्थ्य व्यवस्था की बाकी सुविधाएं अधूरी

धनबाद: हर 15 से 20 दिन पर खून चढ़वाकर जिंदगी की जंग लड़ रहे मासूम बच्चों की लड़ाई सिर्फ गंभीर बीमारी से नहीं, बल्कि ‘स्वास्थ्य व्यवस्था’ की बड़ी कमियों से भी है। धनबाद में थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के इलाज को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में फिलहाल खून चढ़ाने की सामान्य सुविधा तो उपलब्ध है, लेकिन हेमेटोलॉजिस्ट विशेषज्ञ, अलग डे-केयर सेंटर, आयरन ओवरलोड जैसी जरूरी जांच और समुचित चिकित्सा व्यवस्था अब भी पूरी तरह अधूरी बताई जा रही है।

🔬 निजी लैब पर आश्रित हैं गरीब मरीज, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रशासन को दिया 15 दिनों का अल्टीमेटम

अस्पताल में कई प्राथमिक जांचों की सुविधा न होने के कारण मरीजों को मजबूरन निजी लैब का सहारा लेना पड़ता है, जिससे गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। अब सामाजिक कार्यकर्ताओं और पीड़ित बच्चों के अभिभावकों ने जिला प्रशासन से तत्काल व्यवस्था सुधारने की मांग करते हुए 15 दिनों का अल्टीमेटम दिया है।

🩺 केवल ब्लड ट्रांसफ्यूजन ही इलाज नहीं; धनबाद के 260 बच्चों के साथ आसपास के जिलों के मरीज भी परेशान

थैलेसीमिया एक ऐसी आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें बच्चों को जीवनभर नियमित अंतराल पर खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है, लेकिन इसका इलाज केवल ब्लड ट्रांसफ्यूजन तक सीमित नहीं होता। विशेषज्ञ डॉक्टरों की निरंतर निगरानी, नियमित रक्त जांच, शरीर में आयरन ओवरलोड की मॉनिटरिंग, विशेष दवाएं और संक्रमण से बचाव जैसी सुविधाएं भी उतनी ही अनिवार्य होती हैं।

धनबाद में इन मूलभूत सुविधाओं के अभाव का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अकेले धनबाद जिले में करीब 260 बच्चे थैलेसीमिया से पीड़ित हैं। इसके अलावा गिरिडीह, जामताड़ा, बोकारो, देवघर, हजारीबाग और आसपास के जिलों से भी बड़ी संख्या में गंभीर मरीज इलाज के लिए धनबाद पहुंचते हैं।

💔 ‘सालों से नहीं बदली मरीजों की स्थिति’, सामाजिक कार्यकर्ता अंकित राजगढ़िया ने अलग डे-केयर सेंटर की उठाई मांग

थैलेसीमिया मरीजों के हक के लिए सालों से संघर्ष कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अंकित राजगढ़िया का कहना है कि यह समस्या नई नहीं है, बल्कि वर्षों पुरानी है। प्रशासन और अधिकारी बदलते रहे, लेकिन मासूम मरीजों की स्थिति जस की तस बनी हुई है।

उनका कहना है कि थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के लिए पूरी तरह से अलग डे-केयर सेंटर होना चाहिए था, जहां संक्रमण से सुरक्षित वातावरण में उनका इलाज हो सके। फिलहाल इन बच्चों को सामान्य और संक्रामक मरीजों के साथ पीडियाट्रिक्स वार्ड में भर्ती किया जाता है, जिससे उनमें इंफेक्शन का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

🧪 एसआरएल (SRL) लैब बंद होने से बढ़ा आर्थिक बोझ, बिना डोनर नहीं मिल पा रहा ब्लड

अंकित राजगढ़िया का दावा है कि डे-केयर सेंटर की मांग को लेकर पहले भी बड़ा आंदोलन हुआ था। तत्कालीन उपायुक्त ने आश्वासन दिया था, लेकिन आज तक यह सुविधा धरातल पर शुरू नहीं हो सकी।

इसके अलावा, इलाज के दौरान होने वाली महंगी जांच भी मरीजों की जेब पर भारी पड़ रही है। पहले अस्पताल में सरकार के अनुबंध पर संचालित एसआरएल (SRL) लैब में रियायती दर पर जांच हो जाती थी, लेकिन उसके बंद होने के बाद मरीजों को निजी लैबों में कई गुना अधिक खर्च करना पड़ रहा है। साथ ही आरोप है कि निजी ब्लड बैंकों में थैलेसीमिया मरीजों को बिना डोनर के रक्त उपलब्ध कराने के नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया जा रहा, जिससे परिजनों को अतिरिक्त परेशानी उठानी पड़ती है।

⚠️ 3 महीनों में 3 मासूमों की मौत, धनबाद में आज तक नहीं हो सकी स्थायी हेमेटोलॉजिस्ट की नियुक्ति

विशेषज्ञ डॉक्टरों की घोर कमी भी बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है। धनबाद जैसे बड़े जिले और मेडिकल कॉलेज अस्पताल में आज तक एक भी स्थायी हेमेटोलॉजिस्ट (रक्त रोग विशेषज्ञ) की नियुक्ति नहीं हो सकी है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि बीते तीन महीनों में समय पर सही इलाज न मिलने के कारण तीन थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों की मौत हो चुकी है। हाल ही में कतरास निवासी एक बच्चे की भी जान चली गई। उनका मानना है कि यदि समय पर बेहतर इलाज और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हों, तो कई मासूमों की जिंदगी बचाई जा सकती है।

🤰 गर्भावस्था के दौरान थैलेसीमिया जांच अनिवार्य करने और जागरूकता फैलाने पर जोर

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह महत्वपूर्ण मुद्दा भी उठाया कि गर्भावस्था के दौरान थैलेसीमिया की प्रारंभिक जांच (Prenatal Screening) को लेकर जागरूकता और अनिवार्यता पर प्रशासनिक स्तर पर पर्याप्त काम नहीं हो रहा है। यदि सही समय पर जांच और उचित चिकित्सकीय परामर्श मिले, तो भविष्य में इस बीमारी के नए मामलों को काफी हद तक रोका जा सकता है।

🛑 व्यवस्था न सुधरी तो सड़क पर उतरेंगे परिजन; बच्ची बोली—’दवाएं और किट भी खरीदनी पड़ती है बाहर से’

प्रशासन को 15 दिनों का समय देते हुए सामाजिक कार्यकर्ताओं ने साफ कर दिया है कि यदि ठोस पहल नहीं हुई, तो वे उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।

इलाज कराने पहुंची थैलेसीमिया से जूझ रही एक बच्ची ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि अस्पताल में उनके लिए न तो अलग वार्ड की व्यवस्था है और न ही दवाइयां नियमित रूप से मिल पाती हैं। यहां तक कि ब्लड चढ़ाने में इस्तेमाल होने वाली ब्लड सेट किट और कई जरूरी सामग्री भी बाहर से खरीदनी पड़ती है, जिससे गरीब परिवार पूरी तरह कर्ज में डूब रहे हैं।

डॉ. आलोक विश्वकर्मा (सिविल सर्जन, धनबाद) का वक्तव्य: “थैलेसीमिया मरीजों का इलाज सदर अस्पताल में किया जाता है। अस्पताल में फिलहाल अलग से डे-केयर सेंटर उपलब्ध कराना संभव नहीं है, क्योंकि सीमित संसाधनों में सभी प्रकार के मरीजों की देखभाल करनी पड़ती है। यह सच है कि जिले में हेमेटोलॉजिस्ट की कमी है। अधिकांश मरीज एसएनएमएमसीएच (SNMMCH) जाते हैं, दवाओं की उपलब्धता पर अस्पताल प्रबंधन ही सही जानकारी दे पाएगा।”

डॉ. डी.के. गिंदौरिया (अधीक्षक, SNMMCH) का वक्तव्य: “अस्पताल में डे-केयर की व्यवस्था मौजूद है, लेकिन थैलेसीमिया मरीजों का संपूर्ण इलाज केवल चार-पांच घंटे में पूरा नहीं हो सकता। इसी वजह से बच्चों को पीडियाट्रिक्स वार्ड में भर्ती किया जाता है, जहां चौबीसों घंटे डॉक्टरों और नर्सों की टीम उपलब्ध रहती है। अस्पताल में दवाओं की कोई कमी नहीं है और सभी मरीजों का बेहतर इलाज सुनिश्चित किया जा रहा है।”

❓ बड़ा सवाल: क्या सिर्फ ब्लड ट्रांसफ्यूजन ही थैलेसीमिया का मुकम्मल इलाज है?

अस्पताल प्रबंधन के दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है—क्या सिर्फ हर 15 दिन में खून चढ़ा देना ही थैलेसीमिया का पूर्ण इलाज है? जब तक अस्पताल में विशेषज्ञ हेमेटोलॉजिस्ट, अलग व सुरक्षित डे-केयर सेंटर, नि:शुल्क व सस्ती जांचें और नियमित दवाइयां उपलब्ध नहीं होंगी, तब तक इन मासूम बच्चों और उनके लाचार परिवारों की यह जंग यूं ही जारी रहेगी। अब देखना होगा कि 15 दिनों के भीतर जिला प्रशासन कोई ठोस कदम उठाता है या फिर परिजनों को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

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