पशुओं में मुंह-खुर बीमारी का कहर! जानें लक्षण, घरेलू उपचार और बचाव के आसान उपाय; डॉक्टर की सलाह

कुरुक्षेत्र (हरियाणा): पशुओं में मुंह-खुर (Foot and Mouth Disease – FMD) एक अत्यंत गंभीर, तेजी से फैलने वाली और संक्रामक विषाणु जनित बीमारी है। यह विशेष रूप से भैंस, गाय, भेड़, बकरी और सूअर जैसे खुर वाले पशुओं को अपना शिकार बनाती है।
यद्यपि यह बीमारी आमतौर पर वयस्क पशुओं के लिए सीधे तौर पर जानलेवा नहीं होती, लेकिन यह पशुओं के शारीरिक स्वास्थ्य, दूध उत्पादन क्षमता और कार्यक्षमता को बुरी तरह प्रभावित कर देती है। इससे दूध उत्पादन में अचानक भारी गिरावट आ जाती है, जिससे पशुपालकों और किसानों को बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
⚠️ मुंह-खुर बीमारी के प्रमुख लक्षण: मुंह से गाढ़ी लार टपकना और खुरों में घाव
यदि पशुओं के बाड़े में किसी भी पशु को यह बीमारी होती है, तो उसमें निम्नलिखित लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं:
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तेज बुखार: इस बीमारी की चपेट में आते ही पशु को बहुत तेज बुखार हो जाता है।
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मुंह में छाले व लार: पशुओं की जीभ, मसूड़ों और होंठों के अंदर दर्दनाक छाले पड़ जाते हैं, जिससे पशु के मुंह से लगातार गाढ़ी लार टपकती रहती है।
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खुरों में घाव और लंगड़ापन: पशुओं के खुरों के बीच की जगह में गहरे घाव (जख्म) हो जाते हैं, जिससे पशु को चलने-फिरने या खड़े रहने में अत्यधिक दर्द होता है और वह लंगड़ाकर चलने लगता है।
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दूध उत्पादन में भारी गिरावट: मुंह और खुरों में तीव्र दर्द के कारण पशु खाना-पीना पूरी तरह छोड़ देता है, जिसके परिणामस्वरूप दूध उत्पादन में अचानक बहुत बड़ी गिरावट दर्ज की जाती है।
🛡️ बचाव और रोकथाम के प्रभावी उपाय: वर्ष में 2 बार अनिवार्य रूप से लगवाएं FMD की वैक्सीन
कुरुक्षेत्र के पशु चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. रोहतास सैनी ने बताया कि एफएमडी एक तेजी से फैलने वाला विषाणु जनित रोग है, इसलिए इससे बचाव ही सबसे उत्तम और प्रभावी उपाय है।
उन्होंने बताया, “पशुपालक अपने पशुओं को वर्ष में दो बार (प्रत्येक 6 महीने के अंतराल पर) एफएमडी (FMD) की वैक्सीन अनिवार्य रूप से लगवाएं। केंद्र सरकार के ‘राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम’ के तहत चलाए जाने वाले नि:शुल्क टीकाकरण अभियानों का पूरा लाभ उठाएं। पशुपालन विभाग द्वारा यह वैक्सीन बिल्कुल नि:शुल्क लगाई जाती है। यदि अभियान के बाद भी किसी किसान का कोई पशु टीकाकरण से छूट गया है, तो वे तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सालय में जाकर टीकाकरण अवश्य करवाएं।”
🧼 बीमार पशु को स्वस्थ पशुओं के समूह से तुरंत करें अलग, बाड़े की स्वच्छता का रखें ध्यान
डॉ. रोहतास सैनी ने पशुपालकों को स्वच्छता से जुड़े निम्नलिखित महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं:
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आइसोलेशन: बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखते ही प्रभावित पशु को तुरंत स्वस्थ पशुओं के समूह से अलग कर दें।
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अलग बर्तन व चारा: बीमार पशु के खाने-पीने का बर्तन और चारा पूरी तरह अलग रखें।
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बाड़े का सेनेटाइजेशन: बाड़े को हमेशा साफ, सूखा और हवादार रखें। बाड़े, खुरली और बर्तनों को 1% पोटेशियम परमैंगनेट (लाल दवा), फिनाइल या धोने वाले सोडे (सोडियम कार्बोनेट) के घोल से नियमित धोएं।
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व्यक्तिगत स्वच्छता: बीमार पशु को छूने के बाद अपने हाथों और कपड़ों को अच्छी तरह साबुन से साफ किए बिना स्वस्थ पशुओं के पास बिल्कुल न जाएं।
🩺 लक्षण दिखने पर सही प्रबंधन और प्राथमिक उपचार: लाल दवा और बोरेक्स का करें उपयोग
डॉक्टर के अनुसार, एफएमडी का कोई सीधा एंटीवायरल इलाज नहीं है, इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर पशु की उचित देखभाल और सहायक उपचार किया जाता है:
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मुंह की सफाई: दिन में 2 से 3 बार लाल दवा (पोटेशियम परमैंगनेट) के हल्के घोल से पशु का मुंह साफ करें।
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छालों पर लेप: मुंह के छालों पर सुहागा (बोरेक्स) और शहद का मिश्रण बनाकर लगाएं, इससे पशु को तुरंत ठंडक और दर्द से बड़ी राहत मिलती है।
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खुरों का उपचार: खुरों के घावों को लाल दवा के घोल से साफ करें और वहां मक्खियों को बैठने से रोकने के लिए उपयुक्त स्प्रे/मरहम लगाएं।
🌾 पोषण और आहार प्रबंधन: बीमार पशु को दें दलिया, खिचड़ी और उबला हरा चारा
इस बीमारी में मुंह और दांतों में दर्द के कारण पशु सूखा चारा (भूसा/कुट्टी) नहीं खा पाता है। इसलिए उसे सुपाच्य और ऊर्जावान आहार दें:
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पशु को दलिया, खिचड़ी, उबला हुआ हरा चारा, या गुड़ और ग्लूकोज का पानी दें ताकि उसके शरीर में ताकत और ऊर्जा बनी रहे।
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तेज बुखार को नियंत्रित करने के लिए तुरंत निकटतम पशु चिकित्सक (Veterinary Doctor) से संपर्क करें और उनके परामर्शानुसार ही एंटीबायोटिक या दर्द निवारक दवाएं दें।
🐄 नियमित टीकाकरण और स्वच्छता से ही सुरक्षित रहेगा आपका पशुधन
डॉ. रोहतास सैनी ने अंत में कहा कि मुंह-खुर बीमारी पशुपालकों के लिए एक बड़ी आर्थिक चुनौती बन सकती है, लेकिन समय पर नियमित टीकाकरण, बाड़े की स्वच्छता और त्वरित प्राथमिक उपचार अपनाकर इस बीमारी के खतरे को पूरी तरह से टाला जा सकता है। जागरूक किसान ही अपने पशुधन और अपनी वार्षिक आय की सुरक्षा कर सकते हैं।






