शिक्षकों की चुनावी ड्यूटी पर चुनाव आयोग का बड़ा रुख: स्कूल टाइमिंग में नहीं लगेगी ड्यूटी, केवल 10-14% टीचर्स ही होंगे तैनात

नई दिल्ली: चुनाव संबंधी कार्यों में शिक्षकों (Teachers) की ड्यूटी लगाए जाने का मुद्दा आए दिन विवादों और सुर्खियों में बना रहता है। हाल ही में मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) के दौरान भी देश के कई राज्यों में इसे लेकर शिक्षक संघों द्वारा कड़ा विरोध दर्ज कराया गया था।
अब इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामले में कानूनी स्थिति पूरी तरह साफ हो गई है। दिल्ली हाई कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने एक विस्तृत हलफनामा दाखिल किया है। चुनाव आयोग ने इस हलफनामे के माध्यम से शिक्षकों की चुनाव ड्यूटी को लेकर अपनी नीति स्पष्ट कर दी है।
आयोग के अधिकृत जवाब के अनुसार, स्कूल में अध्यापन (पढ़ाई) के कार्य समय के दौरान किसी भी शिक्षक की ड्यूटी चुनावी कार्यों में नहीं लगाई जाती है और न ही भविष्य में लगाई जाएगी। इतना ही नहीं, आयोग के नियमों के तहत किसी एक स्कूल से कुल शिक्षकों की संख्या के मात्र 10 से 14 प्रतिशत शिक्षकों को ही चुनावी ड्यूटी पर तैनात किया जा सकता है।
⚖️ चुनाव आयोग के पास संवैधानिक अधिकार, दिल्ली में SIR के दौरान शिक्षकों ने खोला था मोर्चा
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग को देश में निष्पक्ष मतदान कराने, मतदाता सूची (Voter List) तैयार करने और मतगणना कराने के सर्वाधिकार प्राप्त हैं।
चुनाव आयोग अपने इसी संवैधानिक अधिकार का उपयोग करते हुए केंद्र व राज्य सरकार के कर्मचारियों की चुनाव कार्यों में ड्यूटी लगाता है। इसी व्यवस्था के तहत शिक्षकों की सेवाएं भी ली जाती हैं। हालांकि, शिक्षण कार्य प्रभावित होने के आधार पर समय-समय पर शिक्षक संगठन इसका विरोध करते रहे हैं। हाल ही में राजधानी दिल्ली में SIR कार्यों को लेकर शिक्षकों ने निर्वाचन आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था, जिसके बाद यह मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा और कोर्ट में सुनवाई के दौरान अब व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी हो गई है।
📋 कब और कैसे लगाई जा सकती है शिक्षकों की चुनाव ड्यूटी? समझिए 5 प्रमुख नियम
1. 👨⚖️ सुप्रीम कोर्ट का 2007 का ऐतिहासिक फैसला
सेंट मैरी बनाम चुनाव आयोग के ऐतिहासिक मामले में वर्ष 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया था, जिसका उल्लेख हाई कोर्ट की सुनवाई में भी किया गया। शीर्ष अदालत ने कहा था कि चुनाव आयोग को शिक्षकों को चुनावी ड्यूटी पर लगाने का पूरा अधिकार है, लेकिन आयोग को यह अनिवार्य रूप से सुनिश्चित करना होगा कि इससे विद्यार्थियों की पढ़ाई पर कोई प्रतिकूल असर न पड़े।
2. 🏫 10 से 14 प्रतिशत शिक्षकों की सीमा तय
दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि किसी भी एक स्कूल से कुल फैकल्टी का केवल 10 से 14 प्रतिशत हिस्सा ही चुनाव कार्यों में लगाया जा सकता है। चुनाव आयोग ने भी इस मानक को स्वीकार किया। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि यदि किसी प्राथमिक या माध्यमिक स्कूल में 10 शिक्षक कार्यरत हैं, तो वहां से अधिकतम 2 शिक्षकों की ही चुनाव ड्यूटी लगाई जा सकती है।
3. 📖 राइट टू एजुकेशन (RTE) और पढ़ाई का अधिकार
सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने सख्त लहजे में स्पष्ट किया कि चुनावी प्रक्रियाओं से बच्चों की शिक्षा किसी भी कीमत पर प्रभावित नहीं होनी चाहिए। अदालत ने रेखांकित किया कि बच्चों की निर्बाध पढ़ाई अत्यंत आवश्यक है और वर्ष 2009 में इसी उद्देश्य से ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ (RTE Act) बनाया गया था। इसलिए हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि स्कूल के नियमित शिक्षण समय (School Hours) के दौरान शिक्षकों को चुनावी कार्यों में नहीं झोंका जा सकता।
4. 🧘♂️ शिक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य और तनाव का ध्यान
हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि आप किसी भी शिक्षक से यह व्यावहारिक अपेक्षा नहीं कर सकते कि वह स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के बाद थकान की स्थिति में चुनाव का काम भी करे। अदालत ने सुझाव दिया कि केवल गैर-शैक्षणिक या छुट्टियों के दिनों में ही अध्यापकों की ड्यूटी लगाई जानी चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि शिक्षकों के मानसिक तनाव और कार्य-संतुलन (Work Stress) का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।
5. ☕ मानदेय और जलपान की समुचित व्यवस्था
चुनाव आयोग ने कोर्ट में पेश अपने हलफनामे में जानकारी दी कि चुनावी ड्यूटी पर तैनात होने वाले शिक्षकों को नियमानुसार उचित मानदेय (Honorarium) प्रदान किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, ड्यूटी के दौरान स्थल पर जलपान और भोजन की समुचित व्यवस्था भी की जाती है। आयोग का प्रयास है कि सभी प्रशासनिक व्यवस्थाओं को सुचारू और पारदर्शी तरीके से संचालित किया जाए।






