सेक्स वर्कर होने के आधार पर नहीं चल सकता आपराधिक केस: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रद्द की FIR और चार्जशीट, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला

बिलासपुर (छत्तीसगढ़): छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वयस्क सेक्स वर्कर्स के अधिकारों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा को लेकर अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि किसी वयस्क महिला के विरुद्ध केवल उसके सेक्स वर्कर होने के आधार पर आपराधिक अभियोजन जारी नहीं रखा जा सकता। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए महिला के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (FIR), चार्जशीट और निचली अदालत में लंबित सभी आपराधिक कार्यवाहियों को पूर्णतः रद्द (Quash) कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का सीधा दुरुपयोग है।
🏨 रायपुर के होटल में पुलिस छापेमारी का मामला: बाद में थाने बुलाकर बनाया गया था आरोपी
केस की पृष्ठभूमि और याचिकाकर्ता की दलील:
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होटल हयात पर रेड: यह मामला रायपुर के तेलीबांधा थाना क्षेत्र अंतर्गत होटल हयात में हुई कथित पुलिस छापेमारी से संबंधित था, जहाँ पुलिस ने अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम (ITPA), 1956 की धारा 3, 4, 5 और 7 के तहत अपराध दर्ज किया था।
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याचिकाकर्ता की गैर-मौजूदगी: महिला ने अदालत को बताया कि कथित छापेमारी के समय वह न तो होटल में मौजूद थी और न ही वहां ठहरी हुई थी।
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फर्जी अभियोजन का आरोप: याचिकाकर्ता के अनुसार, पुलिस ने उसे बाद में थाने बुलाकर जबरन मामले में आरोपी बना दिया और जमानत मिलने के उपरांत उसके खिलाफ अदालत में चार्जशीट भी दाखिल कर दी।
📜 सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘बुद्धदेव करमास्कर’ फैसले का दिया हवाला
न्यायिक नजीर और दिशा-निर्देश:
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समान संरक्षण का अधिकार: हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के बुद्धदेव करमास्कर बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (19 मई 2022) के ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों पर भरोसा जताया, जिसके अनुसार सेक्स वर्कर्स को भी कानून के समक्ष समान संरक्षण का अधिकार प्राप्त है।
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सहमति से सेक्स वर्क अपराध नहीं: शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि यदि कोई सेक्स वर्कर वयस्क है और अपनी स्वेच्छा व सहमति से कार्य कर रही है, तो पुलिस को केवल इस आधार पर उसके खिलाफ दंडात्मक या आपराधिक कार्रवाई करने से बचना चाहिए।
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उत्पीड़न पर रोक: सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश हैं कि किसी भी परिसर में छापेमारी के दौरान स्वेच्छा से कार्य करने वाली महिलाओं को गिरफ्तार, प्रताड़ित या पीड़ित (Victimize) नहीं किया जाना चाहिए।
🔍 अपराध के कोई ठोस सबूत नहीं, केवल पेशे के आधार पर कार्रवाई अस्वीकार्य
अदालत के महत्वपूर्ण कानूनी निष्कर्ष:
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ठोस सामग्री का अभाव: केस डायरी और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद खंडपीठ ने पाया कि महिला के खिलाफ ऐसा कोई स्वतंत्र साक्ष्य मौजूद नहीं है, जो उस पर लगाए गए कथित अपराधों के आवश्यक कानूनी तत्वों को सिद्ध करता हो।
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उत्पीड़न से बचाव: कोर्ट ने माना कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर मुकदमा चलाना केवल याचिकाकर्ता के उत्पीड़न और विक्टिमाइजेशन को बढ़ावा देगा, जिसे रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय पहले ही बाध्यकारी निर्देश जारी कर चुका है।
🛡️ FIR और चार्जशीट रद्द: गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की जीत
फैसले का दूरगामी प्रभाव:
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कार्यवाही पूर्णतः निरस्त: हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए तेलीबांधा थाने में दर्ज FIR और सक्षम अदालत में दायर चार्जशीट को कानूनन निरस्त कर दिया।
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सिद्धांत की पुनर्पुष्टि: यह निर्णय इस विधिक सिद्धांत को पुनर्स्थापित करता है कि आपराधिक न्याय प्रणाली में केवल किसी व्यक्ति की पहचान या पेशे के आधार पर उस पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता; अभियोजन के लिए प्रत्यक्ष और ठोस कानूनी साक्ष्यों का होना अनिवार्य है।





