रक्षाबंधन पर भद्रा और चंद्रग्रहण का साया नहीं: 28 अगस्त को दिनभर बांध सकेंगे राखी, जानें शुभ मुहूर्त और राहुकाल का समय

रायपुर (छत्तीसगढ़): भाई-बहन के अटूट स्नेह और विश्वास का महापर्व रक्षाबंधन 28 अगस्त शुक्रवार को पूरे देश में बड़े हर्षोल्लास और धूमधाम के साथ मनाया जाएगा।
इस बार रक्षाबंधन पर्व भद्रा के साए और आंशिक चंद्रग्रहण के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त रहेगा, जिससे बहनें बिना किसी संशय के सुबह से लेकर शाम तक राखी बांध सकेंगी। सावन माह की पूर्णिमा तिथि 28 अगस्त की सुबह 9:48 बजे तक रहेगी, किंतु उदयातिथि और अन्य शुभ मुहूर्तों के चलते दिनभर रक्षा सूत्र बांधने के अत्यंत अनुकूल संयोग बन रहे हैं।
🌕 चंद्रग्रहण और भद्रा का प्रभाव क्यों नहीं? ज्योतिषाचार्य ने स्थिति की स्पष्ट
ज्योतिषीय गणना और पंचांग का विश्लेषण:
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भारत में अदृश्य चंद्रग्रहण: ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित प्रियाशरण त्रिपाठी के अनुसार, यद्यपि 28 अगस्त को आंशिक चंद्रग्रहण घटित हो रहा है, लेकिन यह भारत में दृश्यमान नहीं होगा। इस कारण इसका धार्मिक सूतक काल मान्य नहीं होगा।
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भद्रा की समाप्ति: भद्रा 27 अगस्त की सुबह 9:08 बजे से प्रारंभ होकर लगभग 12 घंटे बाद उसी दिन रात में समाप्त हो जाएगी।
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दोषमुक्त पर्व: 28 अगस्त की सूर्योदय कालीन उदयातिथि पूरी तरह भद्रा और ग्रहण के सूतक से मुक्त रहेगी, जिससे यह दिन अत्यंत पावन और निर्दोष माना गया है।
⏰ राखी बांधने के विशेष शुभ मुहूर्त और राहुकाल का समय
पंचांग अनुसार निर्धारित समय-सारणी:
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पूर्णिमा काल का श्रेष्ठ मुहूर्त: सुबह 5:57 बजे से सुबह 9:48 बजे तक राखी बांधना सर्वोत्तम रहेगा, क्योंकि इस दौरान पूर्णिमा तिथि और भद्रारहित काल दोनों का संयोग है।
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दोपहर का अभिजित व शुभ मुहूर्त: यदि सुबह किसी कारणवश राखी न बांधी जा सके, तो दोपहर 1:30 बजे से शाम 4:20 बजे तक अभिजित मुहूर्त और शुभ चौघड़िया में राखी बांधी जा सकती है।
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राहुकाल से करें परहेज: सुबह 10:46 बजे से दोपहर 12:42 बजे तक राहुकाल रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार राहुकाल की अवधि में रक्षा सूत्र बांधने से बचना चाहिए।
⭐ बुधादित्य और हंस राजयोग: पर्व पर बन रहे हैं कई दुर्लभ संयोग
ज्योतिषीय योगों का शुभ प्रभाव:
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राजयोगों का निर्माण: इस पावन अवसर पर आकाश मंडल में बुधादित्य राजयोग, हंस योग, सुकर्मा योग तथा समसप्तक योग का शुभ निर्माण हो रहा है।
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संध्या व प्रदोष काल: सूर्यास्त के बाद संध्या और प्रदोष काल के साथ-साथ अमृत व शुभ चौघड़िया में भी रक्षाबंधन अनुष्ठान संपन्न किया जा सकता है।
📜 रक्षाबंधन से जुड़ी ऐतिहासिक व पौराणिक कथाएं
आस्था और परंपरा की जड़ें:
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श्रावणी उपाकर्म और आशीर्वाद: रक्षाबंधन मूलतः वैदिक श्रावणी उपाकर्म है, जिसमें आचार्य निराहार रहकर देवताओं का पूजन व यज्ञ करते हैं और अपने यजमानों को रक्षा कवच प्रदान करते हैं।
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इंद्राणी और भगवान इंद्र: देवासुर संग्राम के दौरान जब देवता पराजित होने लगे, तब देवगुरु बृहस्पति के निर्देश पर माता शची (इंद्राणी) ने अभिमंत्रित रक्षा सूत्र देवराज इंद्र की कलाई पर बांधा था, जिसके प्रभाव से देवताओं को विजय प्राप्त हुई।
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माता लक्ष्मी और राजा बलि: दानवीर राजा बलि द्वारा अपना सर्वस्व दान करने के बाद जब भगवान विष्णु उनके द्वारपाल बने, तब माता लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधकर अपने पति को मुक्त कराया था।
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भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी: शिशुपाल वध के समय जब श्रीकृष्ण की अंगुली में चोट लगी, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया था, जिसके उपलक्ष्य में भगवान ने चीरहरण के समय द्रौपदी की रक्षा की थी।
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रानी कर्णावती और हुमायूं: मध्यकालीन इतिहास में मेवाड़ की रानी कर्णावती ने चित्तौड़ की रक्षा के लिए मुगल शासक हुमायूं को राखी भेजकर सैन्य सहायता मांगी थी।





