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Protests: अश्वेतों के उग्र प्रदर्शनों और कोरोना वायरस के संक्रमण ने अमेरिका को सतह पर लाकर रख दिया

चंद दिन पहले अमेरिका में अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की पुलिस हिरासत में दर्दनाक मौत ने कोरोना वायरस के संक्रमण से जूझ रहे अमेरिका में एक नया संकट पैदा कर दिया है। अमेरिका कोरोना संकट के साथ-साथ अश्वेतों के विरोध प्रदर्शन, उनके आक्रोश और अराजकता से दो-चार है। जॉर्ज फ्लॉयड की मौत से तमाम अमेरिकी गुस्से में हैं। वहां व्यापक पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे हैं। कई जगहों पर इन प्रदर्शनों ने इतना हिंसक रूप ले लिया कि कर्फ्यू लगाना पड़ा। यह सब ऐसे समय हो रहा है जब कोरोना महामारी से अमेरिका में एक लाख से ऊपर लोगों की मौतें हुई हैं।

राष्ट्रपति चुनाव पूर्व सर्वेक्षण:  राष्ट्रपति ट्रंप अपने डेमोक्रेटिक प्रतिद्वंद्वी बिडन से पिछड़ रहे हैं

जाहिर है इससे भी लोगों में गुस्सा है। जॉर्ज की पुलिस हिरासत में मौत के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों ने राष्ट्रपति ट्रंप की मुश्किलों को कई गुना बढ़ाने का काम किया है। इसी नवंबर में अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव होने वाला है। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के आधार पर राष्ट्रपति ट्रंप अपने डेमोक्रेटिक प्रतिद्वंद्वी जो बिडन से पिछड़ रहे हैं।

अमेरिका का अश्वेत समाज किसी न किसी समस्या को लेकर पहले भी सड़कों पर उतरता रहा

हालांकि अमेरिका का अश्वेत समाज किसी न किसी समस्या को लेकर पहले भी सड़कों पर उतरता रहा है, लेकिन इस बार वह अपना आक्रोश बहुत उग्र रूप में व्यक्त कर रहा है। यह पहली बार है जब विरोध प्रदर्शनों के साथ बड़े पैमाने पर आगजनी और लूटपाट हो रही है। अमेरिका के अश्वेतों के समर्थन में यूरोप के देशों में भी प्रदर्शन होने लगे हैं। एक तरह से जॉर्ज की मौत, जिसे हत्या की संज्ञा दी जा रही है, अंतरराष्ट्रीय मसला बनती जा रही है। कोरोना के कहर से जूझते अमेरिका में अश्वेतों के विरोध प्रदर्शन के कारण दलीय राजनीति भी काफी तेज हो गई है। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हाल में सवाल उछाला कि आखिर कोरोना वायरस से अश्वेत समुदाय के लोग अपनी संख्या के अनुपात से दोगुनी संख्या में क्यों मर रहे हैं?

अश्वेत समुदाय के साथ भेदभाव हो रहा- ओबामा

ओबामा का इशारा इस ओर था कि अश्वेत समुदाय के साथ भेदभाव हो रहा है। यह और बात है कि अश्वेत होते हुए भी राष्ट्रपति के रूप में अपने आठ वर्षीय कार्यकाल में ओबामा अपने समुदाय के लिए कोई युगांतकारी कदम नहीं उठा पाए। लगता है कि चुनावी मौसम होने के कारण ओबामा अमेरिकी राजनीति में अश्वेत पत्ते का जोरदार इस्तेमाल कर रहे हैं। यही काम डोनाल्ड ट्रंप भी अपनी तरह से करते दिख रहे हैं। वास्तव में मौजूदा हालात को लेकर रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक, दोनों र्पािटयां राजनीति कर रही हैं। परंपरागत रूप से अश्वेत समुदाय डेमोक्रेटिक पार्टी का समर्थक रहा है। अश्वेतों की आक्रामकता से रिपब्लिकन चिंतित तो हैं, लेकिन वे उन्हेंं संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं। अमेरिकी शहरों में जिस बड़े पैमाने पर हिंसा और लूटपाट हो रही है उससे स्पष्ट है कि विरोध प्रदर्शनों में राजनीतिक तत्व शामिल हैं और वे हालात का जमकर राजनीतिक फायदा उठा रहे हैं।

आंदोलन द्वारा अश्वेतों को बराबरी का दर्जा तो मिल गया, लेकिन उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला

अमेरिका में अश्वेतों का प्रदर्शन कोई नया नहीं है। वहां अश्वेत लोगों को लंबे समय तब इसके लिए आंदोलन करना पड़ा कि उन्हेंं बराबरी का दर्जा मिले। 1865 में हुए गृहयुद्ध के बाद अश्वेत समुदाय को संवैधानिक तौर पर बराबरी का दर्जा मिल गया, लेकिन वास्तविकता यह है कि आज भी अमेरिका में अश्वेतों को प्रमुख क्षेत्रों में समुचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। अश्वेत समुदाय की आबादी करीब 18 फीसद है, पर अमेरिकी जेलों में लगभग आधी आबादी उनकी ही है। शिक्षा, व्यवसाय, सिनेमा, कला के अन्य क्षेत्रों, मीडिया, सेना आदि में भी उनका प्रतिनिधित्व काफी कम है। यह स्थिति अमेरिकी कानूनों में अश्वेतों को लेकर कोई दुराग्रह न होने के बावजूद है। स्कूली शिक्षा में अश्वेत छात्रों की ड्राप आउट दर काफी ज्यादा है। यही हाल विश्वविद्यालय शिक्षा के स्तर पर है।

अमेरिका में नस्लभेद की समस्या बरकरार

अश्वेत समुदाय में नशे की लत एवं तलाक की दर भी काफी ज्यादा है। महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अश्वेतों के पिछड़ेपन की वजह नस्ली भेद में देखी जाती है। श्वेत समुदाय के तमाम लोग भी मानते हैं कि अमेरिका में नस्लभेद की समस्या बरकरार है। जॉर्ज की मौत ने अश्वेतों की दबी हुई भावनाओं को सामने ला दिया है। अमेरिका में अश्वेत जब-तब पुलिस की सख्ती का शिकार होते ही रहते हैं।

उग्र प्रदर्शनों ने अमेरिका को सतह पर लाकर रख दिया

अमेरिका दुनिया को प्रजातंत्र एवं मानवाधिकारों की सीख देता है, लेकिन यह साफ है कि खुद उसे भी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति है, लेकिन अश्वेतों के उग्र प्रदर्शनों ने अमेरिकी समाज की पुरानी कमियों को सतह पर लाकर रख दिया है। वहां जो कुछ हो रहा है उससे वैश्विक शक्ति के तौर पर भी अमेरिका की साख कमजोर हो रही है। किसी भी समाज में सारे समुदायों को बराबरी के अधिकार के साथ ही वास्तविकता में भी बराबरी मिलनी चाहिए।

अश्वेत समुदाय विकास की दौड़ में पीछे हैं, अमेरिका को ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है

दुर्भाग्य से अभी तक यह संभव नहीं हो पाया है और अश्वेत समुदाय विकास की दौड़ में अन्य समुदायों से काफी पीछे हैं। अमेरिका को इस कमजोरी को दूर करने के ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। अमेरिकी पुलिस-प्रशासन को भी काफी सीख लेने की आवश्यकता है। अमेरिकी शासन को भी यह समझना होगा कि समाज के तमाम वर्गों में सापेक्षिक समानता किसी भी राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए एक महत्वपूर्ण आधार स्तंभ होती है।

कोरोना वायरस ने अमेरिकी अर्थतंत्र की जड़ों को कमजोर कर दिया

पिछले कई वर्षों से अमेरिका अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहा है। कोरोना वायरस ने अमेरिकी अर्थतंत्र की जड़ों को कमजोर कर दिया है। अब बड़े पैमाने पर जो आगजनी और लूट हो रही है वह भी अमेरिकी अर्थतंत्र को कमजोर करने वाली साबित हो सकती है। अभी यह कहना कठिन है कि अश्वेतों के विरोध प्रदर्शन का असर किस राजनीतिक दल के पक्ष में जाएगा, लेकिन वहां के हालात अमेरिका के दमखम पर सवाल खड़े कर रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रंप को इस मामले में सुलह-सफाई के रास्ते चलना चाहिए।

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