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जोड़ने के बजाय तोड़ने में लगे लिबरल: सभ्यताओं संस्कृतियों के संघर्ष में विश्वकल्याण संभव नहीं

अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता। सुधीजन आपदा के अनुभव का सदुपयोग करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कोरोना आपदा को अवसर बनाने की घोषणा की है। कोरोना विश्व इतिहास की सबसे बड़ी आपदा है। इसमें राष्ट्र राज्य की सीमाएं व्यर्थ हो चुकी हैं। अब एक नई संवेदनशील समाज व्यवस्था की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। इस अवसर का सदुपयोग भेदभावरहित विश्व मानवता के विकास के लिए किया जाना चाहिए। यह दुनिया के सभी सामाजिक समूहों व सभ्यताओं में संवाद का महत्वपूर्ण अवसर है। बावजूद इसके अमेरिका में श्वेत-अश्वेत तनाव है। एशिया और पश्चिमी जगत में वैमनस्य है। अरब और गैर-अरब के मध्य दूरी है। इस्लामिक स्टेट संघर्षरत है। भारत के कथित उदारवादी यानी लिबरल मजहबी जमातों को अमेरिका जैसी हिंसा के लिए भड़का रहे हैं। दुनिया नस्ल, जन्म, स्थान, क्षेत्र भेद सहित सभ्यताओं के भी संघर्ष की ओर बढ़ रही है।

सभ्यताओं का विकास मनुष्य के परस्पर संवाद से हुआ

सभ्यताओं का विकास मनुष्य के परस्पर संवाद से हुआ। वर्तमान इराक में कभी सुमेरी सभ्यता का विकास हुआ जिसका विश्व के बड़े भाग पर प्रभाव पड़ा। इसका कारण संवाद था। भारत में भी वैदिक काल से ही संवाद की प्राथमिकता थी। यहां अनेक विचार, आस्था व रीति रिवाज थे। अथर्ववेद के ऋषि ने कहा है कि ‘अनेक भाषाएं बोलने व अनेक आस्था वाले जनसमूहों को यह भूमि समृद्धि देती है।’ रामायण किष्किंधा काण्ड में सीता को खोजने के लिए सुग्रीव, उत्कल, दशार्ण, आंध्र, बंग, र्कंलग और केरल आदि के नाम लेते हैं। महाभारत (भीष्म पर्व) में संजय ने धृतराष्ट्र को भारत का विवरण बताया, ‘पांडुु, उत्कल, आंध्र, पुण्ड्र, किरात, निषाद, द्रविण, केरल, कर्नाटक, चोल, कोकण, सिद्ध, वैदेह, मलेच्छ, यवन और चीन आदि जन भारत में है।’ उक्त क्षेत्रों व जनसमूहों की जीवनशैली व सभ्यता भिन्न थी, लेकिन सभ्यताओं में परस्पर सतत संवाद था। इसलिए भिन्न सभ्यताओं के बावजूद सबकी एक प्रेम पूर्ण संस्कृति थी, लेकिन कथित उदारवादी ऐसा नहीं मानते।

उदारवादी हिंसक प्रदर्शनों का समर्थन करते हैं

उदारवाद आकर्षक शब्द है। इससे सहिष्णुता की ध्वनि निकलती है, लेकिन यूरोप में जन्मे इस वाद के अनुयायी अपनी मूल प्रकृति में मजहबी कट्टरपंथी हैं।माज और राजव्यवस्था के संबंध में इनके कट्टरपंथी विचारों का स्नोत लॉक का सामाजिक समझौते का सिद्धांत है। लॉक की किताब ‘टू ट्रीटीज ऑन गवर्नमेंट’ और अन्य विचारों के अनुसार ‘जीवन, संपत्ति व स्वतंत्रता’ प्राकृतिक अधिकार हैं। लॉक राजवंश समर्थक थे और केवल संपन्नों को मताधिकार देने के पक्षधर थे। राजव्यवस्था की गलती पर क्रांति के हिमायती भी। उदारवादी इसीलिए हिंसक प्रदर्शनों का समर्थन करते हैं। वे स्वतंत्रता के प्राकृतिक अधिकार को अराजकता और लूट तक विस्तृत करते हैं।

लॉक का सामाजिक समझौते का सिद्धांत मौलिक नहीं था

लॉक का सामाजिक समझौते का सिद्धांत मौलिक नहीं था। उनके पहले हॉब्स ने भी ऐसा सिद्धांत दिया था। हॉब्स की चर्चित किताब ‘लेवियाथन’ के अनुसार अराजकता से पीड़ित लोगों ने समझौते के माध्यम से समाज बनाए, लेकिन राज समाज के गठन में हॉब्स और लॉक के समझौते नहीं संस्कृति और परस्पर संवाद की भूमिका है।

उदारवादी राष्ट्रजीवन में संस्कृति की भूमिका नहीं मानते

उदारवादी राष्ट्रजीवन में संस्कृति की भूमिका नहीं मानते। भारत के सभी जनसमूह एक संविधान और एक संस्कृति के प्रवाह में आस्था व अंत:करण की स्वतंत्रता का आनंद लेते हैं। भारतीय राष्ट्र राज्य वर्ग, जाति, मजहब और पंथ आधारित भेदभाव नहीं करता। देश भर में सीएए विरोधी प्रदर्शन हिंसक थे। कथित उदारजन प्रदर्शनकारियों के पैरोकार बने रहे। फिर भी उन्हें मलाल है कि प्रदर्शनकारी ठीक से हिंसक क्यों नहीं हुए? वे भारत में भी अमेरिकी प्रदर्शनों जैसी हिंसा चाहते हैं। अमेरिका में भी उदारपंथी अपने काम पर हैं।

संवाद तनाव घटाते हैं, उदारवादी भड़काते हैं

संवाद से युद्ध भी टलते रहे हैं, लेकिन ‘उदार मित्र’ संवाद के प्रत्येक अवसर पर बाधा डालते हैं। वे और उनका वामपंथी गठजोड़ संवाद तोड़ने का काम करता है। एएसआइ के अधिकारी रहे केके मुहम्मद ने राम मंदिर विवाद पर कहा था कि ‘यह मसला सुलझ जाता यदि वामपंथी इतिहासकारों द्वारा मुस्लिम बौद्धिकों की ब्रेन वॉशिंग न की होती।’ संवाद तनाव घटाते हैं। उदारवादी भड़काते हैं। मूल समस्या की जगह पंथिक अस्मिता खड़ी करते हैं। कल्पित अस्मिता के लिए उकसाते हैं।

सभ्यता व संस्कृति सतत विकासशील हैं

सभ्यता व संस्कृति सतत विकासशील हैं। इसमें कालवाह्य भाग छूटते जाते हैं। काल संगत अनुभव व आविष्कार जुड़ते जाते हैं। सभ्यता व संस्कृति का आदर्श गुण दूसरी सभ्यताओं को प्रभावित करना व दूसरी संस्कृतियों से प्रभावित होना भी है। इसके लिए परस्पर संवाद की जरूरत होती है। भारतीय इतिहास में बौद्धों ने दुनिया के तमाम देशों की संस्कृति व दर्शन को प्रभावित किया था। बौद्धों व शंकराचार्य में चला संवाद भारतीय चिंतन की अमूल्य संपदा है। प्राचीन ईरान में भी ऐसा ही परिवेश था। भारत में ऋग्वेद था तो ईरान में ‘अवेस्ता।’ इस्लाम आने के बाद संवाद घटा। संप्रति विश्व के बड़े भाग में संवादहीनता है। सभ्यताएं तनातनी में हैं।

संवाद का मुख्य उद्देश्य जोड़ना है, लेकिन उनकी बौद्धिकता जोड़ने में विश्वास नहीं करती

भारत में संवाद के लिए व्यापक तर्क शास्त्र का विकास हुआ था। विश्व को सत्य, शिव और सुंदर से भरने के लिए संवाद का कोई विकल्प नहीं, लेकिन उदारपंथी उसमें विध्न डालते हैं। संवाद का मुख्य उद्देश्य जोड़ना है, लेकिन उनकी बौद्धिकता जोड़ने में विश्वास नहीं करती। ऐसे बौद्धिक सारी दुनिया में हैं। सभी देशों के नीति नियंता परेशान हैं। कथित उदार लोकतंत्री नहीं होते। उदार और वाम अर्थनीति के प्रश्न पर मतभिन्नता रखते हैं। उदारवादी मुक्त अर्थव्यवस्था के हिमायती हैं तो वाम राष्ट्रीय संपदा के सरकारीकरण के पैरोकार, लेकिन संवाद विरोधी दोनों हैं।

सभ्यताओं-संस्कृतियों के संघर्ष में विश्वकल्याण संभव नहीं

भारत और समूचे विश्व के सभी समूहों, सभ्यताओं को उदारवादियों की मध्यस्थता और अड़ंगेबाजी से हटकर परस्पर सीधा संवाद बढ़ाना चाहिए। सभ्यताओं-संस्कृतियों के संघर्ष में विश्वकल्याण संभव नहीं है। परस्पर संवाद में ही विश्व के स्वर्णिम भविष्य की गारंटी है।

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