Supreme Court Delhi Protest Hearing: दिल्ली प्रोटेस्ट और मेट्रो बंदी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र सरकार को जारी किया शो कॉज नोटिस

दिल्ली प्रोटेस्ट और उससे जुड़े विभिन्न मामलों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले से जुड़ी सभी याचिकाओं को आपस में संबद्ध (कनेक्ट) कर लिया है। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि हम संबंधित प्राधिकरणों को अपना 9 अक्टूबर का आदेश याद दिलाते हैं, जिसमें स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया था कि मेट्रो ट्रेनों को अचानक बंद न किया जाए और आम लोगों की आवाजाही को बाधित न किया जाए।
अदालत ने आदेश की खुली अवहेलना पर नाराजगी जताते हुए सरकार से जवाब तलब किया है और पूछा है कि उनके खिलाफ अवमानना का मामला क्यों न चलाया जाए। कोर्ट ने इस संबंध में शो कॉज नोटिस जारी कर मंगलवार तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
🚆 मेट्रो का नियमित संचालन, बैरिकेड्स हटाने और इंटरनेट बहाली के आदेश
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत मेट्रो का नियमित संचालन जारी रखने का कड़ा आदेश दिया।
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बैरिकेड्स और इंटरनेट: कोर्ट ने निर्देश दिया कि दिल्ली की सड़कों से तुरंत बैरिकेड्स हटाए जाएं और बाधित की गई इंटरनेट सेवाओं को भी तत्काल प्रभाव से बहाल किया जाए।
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सॉलिसिटर जनरल (SG) ने अदालत को जानकारी दी कि बीती रात 10 बजे से सभी मेट्रो स्टेशन खोल दिए गए हैं और जिन्हें बंद किया गया था, वह अदालत के आदेश और सुरक्षा के मद्देनजर कुछ समय के लिए था। इस पर कोर्ट ने सरकार को इस मुद्दे पर स्पष्ट अनुपालन हलफनामा (Compliance Affidavit) दाखिल करने को कहा है।
🧑⚖️ जस्टिस बागची की दो टूक: ‘हम हमेशा देश की सेवा के लिए प्रस्तुत हैं’
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील और पूर्व अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल के अलावा कपिल सिब्बल सहित कई अन्य वरिष्ठ वकील भी ऑनलाइन जुड़े। जब वकीलों ने विशेष सुनवाई के लिए अदालत का आभार जताया, तो जस्टिस बागची ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “धन्यवाद की कोई बात नहीं है, हम हमेशा देश की सेवा के लिए हाजिर हैं।”
अदालत के समक्ष वकीलों (गोपाल शंकरनारायणन और मेनका गुरुस्वामी सहित अन्य) ने प्रदर्शनकारियों, वकीलों और छात्रों के साथ पुलिस द्वारा की गई सख्ती, हिरासत और धारा 163 के कथित दुरुपयोग के वीडियो और सबूत पेनड्राइव के जरिए रखे। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस अधिकारियों को तब तक व्यक्तिगत तौर पर कानून-व्यवस्था कायम करने का अधिकार नहीं होता, जब तक कि राज्य प्रशासन की ओर से विधिवत निर्णय न लिया गया हो। कोर्ट ने आश्वस्त किया कि नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता के इस गंभीर मुद्दे पर अदालत गहराई से सुनवाई कर उचित आदेश पारित करेगी।





