Jalandhar Municipal Corporation News: वरियाणा डंप केस में नगर निगम कमिश्नर की जवाबदेही तय, 8.40 करोड़ का पर्यावरणीय हर्जाना जमा करने के आदेश

जालंधर: पंजाब के औद्योगिक शहर जालंधर से एक बड़ी खबर सामने आ रही है, जहां वरियाणा डंप पर कचरा प्रबंधन में गंभीर लापरवाही बरतने और पर्यावरणीय हर्जाने की बकाया राशि तय समय पर जमा न करवाने के मामले में अब सीधे नगर निगम कमिश्नर की जवाबदेही तय कर दी गई है। पंजाब सरकार के एडजुकेटिंग ऑफिसर की ओर से जारी किए गए आदेशों के मुताबिक, कुल 9.30 करोड़ रुपये के पर्यावरणीय जुर्माने में से शेष बचे 8.40 करोड़ रुपये को जमा करवाने के लिए दो महीने की सख्त समय-सीमा निर्धारित की गई है। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि तय अवधि के भीतर यदि निगम की तरफ से इस राशि का भुगतान नहीं किया जाता है, तो आने वाले दिनों में मामला और अधिक कानूनी पेचीदगी भरा हो सकता है।
पंजाब पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की जांच में खुली पोल, बार-बार नोटिस मिलने के बाद भी समस्याओं का स्थायी समाधान करने में नाकाम रहा निगम
यह पूरी सख्त कार्रवाई पंजाब पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (PPCB) की औपचारिक शिकायत के आधार पर अमल में लाई गई है। जांच के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि बोर्ड की तरफ से लगातार नोटिस जारी होने, कई राउंड की सुनवाई होने और स्पष्ट निर्देश दिए जाने के बावजूद जालंधर नगर निगम वरियाणा डंप की बुनियादी समस्याओं का कोई स्थायी समाधान नहीं ढूंढ पाया है। डंप पर कचरे की सही सैगरीगेशन (छंटाई), आग से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम, कचरे से रिसने वाले गंदे पानी (लीचेट) का वैज्ञानिक प्रबंधन और पुराने पड़े कचरे के सही निपटारे जैसी तमाम मोर्चों पर बड़ी कमियां जस की तस बनी हुई हैं। करोड़ों रुपये का भारी-भरकम जुर्माना लगने के बाद भी शहर के हालात में अपेक्षित सुधार न होना सीधे तौर पर नगर निगम की कार्यप्रणाली पर बड़ा और गंभीर सवालिया निशान खड़ा करता है।
निरीक्षण के दौरान डंप पर नहीं मिली गीले-सूखे कचरे की व्यवस्था, खुलेआम सुलगते रहे कचरे के ढेर और नदारद थी चारदीवारी
गौरतलब है कि पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के अधिकारियों ने गत 7 जनवरी 2026 को वरियाणा डंप का औचक निरीक्षण किया था। मौके पर स्थिति बेहद चिंताजनक पाई गई क्योंकि वहां गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग करने की कोई उचित व्यवस्था ही मौजूद नहीं थी। कचरे के विशाल ढेरों में अंदर ही अंदर आग सुलग रही थी, वाहनों का वजन करने के लिए कोई धर्मकांटा नहीं था और परिसर की सुरक्षा के लिए चारदीवारी या मजबूत बाड़ तक का अभाव था। इसके अलावा, कचरे से निकलने वाले जहरीले और गंदे पानी के प्रबंधन को लेकर जो दावे किए गए थे, वे भी पूरी तरह खोखले साबित हुए और व्यवस्था बेहद असंतोषजनक पाई गई।
फरवरी की सुनवाई में भी नहीं पेश की गई कोई ठोस कार्ययोजना, सिर्फ कागजी आश्वासनों तक सीमित रहा प्रशासन
इससे पहले 9 फरवरी 2026 को हुई उच्च स्तरीय सुनवाई के दौरान नगर निगम के हेल्थ ऑफिसर ने यह भरोसा दिलाया था कि डंप स्थल पर सुरक्षा दीवार का निर्माण कराया जाएगा, पुराने पड़े कूड़े का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण होगा, और अंडरग्राउंड वाटर (भूजल) की गुणवत्ता पर नजर रखने के लिए पीजोमीटर लगाए जाएंगे। साथ ही गंदे पानी के ट्रीटमेंट के लिए भी विशेष कदम उठाने की बात कही गई थी। हालांकि, पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट दर्ज किया कि निगम की ओर से सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर न तो कोई ठोस प्रगति दिखाई गई और न ही कोई स्पष्ट प्रस्ताव या समय-सीमा पेश की गई। मजबूरी में बोर्ड को बार-बार निगम को सुधार के कड़े निर्देश देने पड़े।
भूमिगत जल की निगरानी का अभाव और सीवर में छोड़ा जा रहा था डंप का खतरनाक गंदा पानी
बोर्ड के विस्तृत निरीक्षण में यह भी खुलासा हुआ कि कचरे से रिसने वाला दूषित पानी जगह-जगह जलभराव के रूप में जमा था, जबकि पानी का एक बड़ा हिस्सा बिना ट्रीट किए सीधे शहर के सीवर सिस्टम में बहाया जा रहा था। भूजल स्तर की सुरक्षा के लिए जरूरी पीजोमीटर स्थापित नहीं किए गए थे। कचरे के ढेरों में लगातार उठ रही आग को देखते हुए मीथेन गैस का पता लगाने वाले आधुनिक डिटैक्टर लगाने के निर्देश भी ठंडे बस्ते में डाल दिए गए। इसके अलावा, काला संघियां ड्रेन और कपूरथला रोड के चौराहे के पास कचरे का एक अलग अवैध ढेर भी मिला, जिसे जांच रिपोर्ट तैयार होने तक हटाया नहीं गया था।
पर्यावरण कार्यकर्ता की याचिका पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में चल रही है कानूनी कार्यवाही, अगली सुनवाई फरवरी 2027 में
यह पूरा गंभीर प्रकरण पर्यावरण कार्यकर्ता तेजस्वी मिन्हास की ओर से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में दायर किए गए मूल आवेदन संख्या 97/2026 से भी सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। इस मामले में पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 28 अक्टूबर को एनजीटी में सुनवाई होनी थी, लेकिन पीठासीन पीठ की बैठक न हो पाने के कारण सुनवाई टल गई। अब इस मामले की अगली आधिकारिक सुनवाई आगामी फरवरी 2027 में तय की गई है, जिस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।
जुर्माना भरने और वरियाणा डंप के सुधारीकरण की दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है जालंधर नगर निगम
कमिश्नर की व्यक्तिगत जवाबदेही तय होने और बकाया हर्जाना जमा कराने के लिए डेडलाइन तय होने के बाद अब जालंधर नगर निगम के प्रशासनिक अमले के सामने दोहरी और कठिन चुनौती आन खड़ी हुई है। निगम को एक तरफ जहां तय समय के भीतर भारी-भरकम बकाया राशि सरकारी खजाने में जमा करानी होगी, वहीं दूसरी तरफ वरियाणा डंप पर कचरे की सैगरीगेशन, फायर सेफ्टी, लीचेट ट्रीटमेंट और पुराने कचरे के निस्तारण में जमीनी स्तर पर ठोस सुधार भी दिखाने होंगे। अब केवल कागजी बहसों, वादों और फौरी आश्वासनों से नगर निगम इस गंभीर संकट से पार नहीं पा सकेगा।
सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट नियमों के उल्लंघन पर लगाया गया है कुल 9.30 करोड़ रुपए का भारी पर्यावरणीय जुर्माना
एडजुकेटिंग ऑफिसर के आदेशों के आंकड़ों पर गौर करें तो सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स के प्रावधानों का लगातार उल्लंघन करने के एवज में जालंधर नगर निगम पर कुल 9.30 करोड़ रुपये का पर्यावरणीय हर्जाना लगाया गया है, जिसका विवरण इस प्रकार है:
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4.50 करोड़ रुपए: 1 जुलाई 2020 से लेकर 31 मार्च 2024 तक की लंबी अवधि के दौरान नियमों की अनदेखी के लिए।
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2.10 करोड़ रुपए: 1 अप्रैल 2024 से 31 दिसंबर 2025 तक की अवधि के लिए लगाया गया अतिरिक्त पर्यावरणीय हर्जाना।
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2.70 करोड़ रुपए: नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के स्पष्ट निर्देशों की अवहेलना करने पर लगाया गया अतिरिक्त जुर्माना। कुल 9.30 करोड़ रुपये के इस भारी-भरकम जुर्माने में से अभी तक केवल 90 लाख रुपये ही जमा कराए गए हैं, जबकि शेष 8.40 करोड़ रुपये की बड़ी राशि बकाया चल रही है। अदालत के आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि बची हुई राशि को दो महीने के भीतर हर हाल में जमा कराया जाए। इसके अतिरिक्त, 25 लाख रुपए की बैंक गारंटी समय पर जमा कराने या उसका नवीनीकरण कराने तथा सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016 के सभी नियमों का पूर्ण पालन सुनिश्चित करने के भी कड़े निर्देश दिए गए हैं।





