राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर विशेष, लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल का छत्तीसगढ़ से रहा है गहरा ऐतिहासिक नाता; नवंबर 1936 में रायपुर पहुंचे थे सरदार पटेल

रायपुर: पूरा देश आज लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में अत्यंत धूमधाम के साथ मना रहा है। बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगी कि आधुनिक भारत के निर्माता कहे जाने वाले सरदार वल्लभभाई पटेल का छत्तीसगढ़ अंचल से भी एक अनूठा और ऐतिहासिक संबंध रहा है। इतिहास के पन्नों के अनुसार, सरदार वल्लभभाई पटेल नवंबर 1936 में रायपुर की यात्रा पर आए थे। अपने इस प्रवास के दौरान वे रायपुर के प्रसिद्ध ‘शुक्ला भवन’ में ठहरे थे। इस यात्रा के दौरान सरदार पटेल ने रायपुर के व्यस्त कचहरी चौक पर स्थित राष्ट्रीय विद्यालय के अंतर्गत छात्र भवन का भव्य उद्घाटन किया था, जिसका निर्माण मुख्य रूप से जैतूसाव मठ के माध्यम से कराया गया था। उस दौर की यानी नवंबर 1936 की एक दुर्लभ ऐतिहासिक तस्वीर आज भी सुरक्षित मौजूद है, जिसमें सरदार वल्लभभाई पटेल महान स्वतंत्रता सेनानी पंडित रविशंकर शुक्ल के साथ नजर आते हैं। इसके अलावा उस समय के अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साथ उनकी एक ग्रुप फोटो भी इतिहास के दस्तावेजों में दर्ज है।
इतिहासकार डॉ. रमेंद्रनाथ मिश्र ने साझा किए संस्मरण, बताया— कचहरी चौक स्थित राष्ट्रीय विद्यालय के छात्र भवन का किया था उद्घाटन
इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुए प्रख्यात इतिहासकार डॉ. रमेंद्रनाथ मिश्र बताते हैं कि “प्रत्येक वर्ष 31 अक्टूबर को हम सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाते हैं। जहाँ तक छत्तीसगढ़ के साथ उनके प्रवास का प्रश्न है, तो वे सन 1936 में छत्तीसगढ़ आए थे। उस दौरान सरदार वल्लभभाई पटेल ने रायपुर के कचहरी चौक पर स्थित राष्ट्रीय विद्यालय के छात्रावास के छात्र भवन का विधिवत उद्घाटन किया था, जिसका निर्माण कार्य जैतूसाव मठ द्वारा संपन्न कराया गया था।”
राजनांदगांव, छुईखदान और खैरागढ़ के राजाओं ने सबसे पहले किए हस्ताक्षर, 564 रियासतों को भारत संघ में कराकर सरदार पटेल ने दिया देश को अखंड स्वरूप
इतिहासकार डॉ. रमेंद्रनाथ मिश्र आगे बताते हैं कि सरदार वल्लभभाई पटेल का रायपुर और संपूर्ण छत्तीसगढ़ के साथ एक विशेष जुड़ाव था। उन्होंने बताया कि जब नागपुर में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत संघ में देशी रियासतों के विलय के लिए हस्ताक्षर कराए जा रहे थे, उस महत्वपूर्ण अवसर पर सरदार वल्लभभाई पटेल, पंडित रविशंकर शुक्ल और द्वारका प्रसाद मिश्र जैसी महान विभूतियाँ वहाँ मौजूद थीं। इस ऐतिहासिक प्रक्रिया में राजनांदगांव, छुईखदान और खैरागढ़ रियासतों के राजाओं ने सबसे पहले हस्ताक्षर करके अपनी राष्ट्रनिष्ठा का परिचय दिया था। देश में कुल लगभग 564 रियासतों का एक-एक करके भारत संघ में सफलतापूर्वक विलय कराया गया। आज हम मानचित्र पर जिस अखंड और गौरवशाली भारत के दर्शन करते हैं, उसे वास्तविक आकार देने का अधिकांश श्रेय निर्विवाद रूप से सरदार वल्लभभाई पटेल की अदम्य इच्छाशक्ति और दृढ़ता को जाता है। उनकी अटूट राजनीतिक दृढ़ता के कारण ही सभी बिखरी रियासतें एक-एक करके भारत में मिलती चली गईं, जिसके चलते उन्हें ‘लौह पुरुष’ की उपाधि से नवाजा गया। स्वतंत्र भारत में राष्ट्रीय एकता और अखंडता की गाड़ी को गति प्रदान करने की असली नींव रखने वाले सरदार पटेल ही थे।
जब वे देश के गृहमंत्री थे: हैदराबाद और अन्य रियासतों के विलय में निभाई थी ऐतिहासिक और निर्णायक भूमिका
डॉ. रमेंद्रनाथ मिश्र ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि उस दौर में जो रियासतें या रजवाड़े स्वेच्छा से भारत संघ में शामिल होना नहीं चाहते थे, उनमें मुख्य रूप से हैदराबाद, भोपाल और कश्मीर के नाम शामिल थे। इन रियासतों की नीतियां और रुख उस वक्त बिल्कुल स्पष्ट नहीं थे। हैदराबाद को भारत संघ के दायरे में लाने का कठिन कार्य सरदार वल्लभभाई पटेल की कुशल रणनीति से संभव हुआ, जबकि कश्मीर के विलय में भारतीय सेना की अहम भूमिका रही थी। उस कालखंड में सरदार वल्लभभाई पटेल देश के गृहमंत्री के पद पर आसीन थे। भारतीय इतिहास के परिप्रेक्ष्य में वे केवल राष्ट्रीय एकता के सूत्रधार ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने अपनी प्रशासनिक क्षमता से वह ऐतिहासिक कार्य कर दिखाया जो उस समय दूसरा कोई अन्य राजनेता नहीं कर सकता था। अंग्रेजों द्वारा रियासतों को स्वतंत्र रहने या अपने मार्ग पर चलने की खुली छूट दिए जाने के बावजूद, सरदार वल्लभभाई पटेल के अडिग संकल्प ने ही आज के आधुनिक और एकीकृत भारत के निर्माण को संभव बनाया।





