India Nepal Tension: नेपाली संसद के फैसले पर भारत का कड़ा ऐतराज, भारत के तीन इलाकों को बताया अपना

नई दिल्ली। भारत के समझाने के बावजूद जिस तरह से नेपाली संसद ने नेपाल के नए मानचित्र को जारी करने संबंधी प्रस्ताव को पारित किया है वह दोनो देशों के रिश्तों पर बहुत ही उल्टा असर डाल सकता है। भारत ने नेपाल सरकार की तरफ से लाये गये इस प्रस्ताव के पारित पर होने पर अपना कड़ा ऐतराज जताया है। भारत ने फिर दोहराया है कि लिपुलेख, कालापानी व लिपिंयाधुरा पर नेपाल के दावे के पीछे कोई साक्ष्य नहीं है।
यह नेपाल को लेकर भारत के विदेश मंत्रालय में उपज रहे गुस्से को भी बताता है। जानकार मान रहे हैं कि नेपाल ने भारतीय जमीन को अपने आधिकारिक मानचित्र में शामिल कर इस समस्या का कूटनीतिक समाधान निकालने के रास्ते काफी संकुचित कर दिए हैं। ऐसे में दोनो देशों की तरफ से सीमा विवाद सुलझाने के लिए गठित विशेष समिति के भविष्य पर भी सवाल लग गया है।
भारत के लिपुलेख, कालापानी व लिपिंयाधुरा को अपने में नक्शे में किया शामिल
नेपाली संसद ने शनिवार को अपने देश के नए नक्शे को पारित करने का प्रस्ताव करने पर मुहर लगा दी है। नए नक्शे में भारत के उत्तराखंड राज्य के लिपुलेख, कालापानी व लिपिंयाधुरा को शामिल कर लिया गया है। नेपाल का कहना है कि 60 के दशक में भारत ने इन पर कब्जा जमा लिया था। जबकि भारत का कहना है कि सारे ऐतिहासिक दस्तावेज साबित करते हैं कि ये हिस्से हमेशा से भारत में शामिल में रहे हैं। हाल ही में भारत ने इन क्षेत्रों को पक्की सड़कों से जोड़ा है। पिछले महीने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने धारचुला से लिपुलेख तक जाने वाली 75 किलोमीटर लंबी आल वेदर रोड का उद्घाटन किया था और उसके बाद से ही नेपाल ने इस मुद्दे को हवा देना शुरु किया। नेपाल में नए नक्शे के पारित होने के बाद स्थिति ज्यादा पेचीदा हो गया है।
भारतीय विदेश मंत्रालय का कड़ा रुख
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्ताव ने कहा है कि, ”हमने देखा है कि नेपाल की हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव ने भारत के एक हिस्से को नेपाल के मानचित्र में बदलाव करने संबंधी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कर दिया है। इस मुद्दे पर हमने अपना पक्ष पहले ही साफ किया हुआ है। बगैर किसी ऐतिहासिक तथ्य के मानचित्र को कृत्रिम तौर पर बढ़ाने का समर्थन नहीं किया जा सकता। यह सीमा विवादों को बातचीत से सुलझाने को लेकर हमारे बीच जो सहमति बनी थी उसका भी उल्लंघन है।”
कूटनीतिक पहल की संभावनाओं पर पड़ सकता है असर
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने दो दिन पहले भी बेहद मुलायम शब्दों में नेपाल को लेकर अपनी प्रतिक्रिया जताई थी। जिसमें उन्होंने नेपाल-भारत के पुराने संबंधों की दुहाई देते हुए पीएम नरेंद्र मोदी की तरफ से लगातार नेपाल को ज्यादा फोकस में रखने की बात कही थी। लेकिन कूटनीतिक जानकार मान रहे हैं कि नेपाली संसद के फैसले के बाद अब हालात बदल गये हैं। जिस तरह से नेपाल के सभी राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे पर एकजुटता दिखाई है उससे भी भारत की कूटनीतिक पहल की संभावनाओं पर असर पड़ सकता है।
भारत नेपाल का रिश्ता हुआ तनावग्रस्त
भारत के लिए यह इसलिए ज्यादा चिंता का विषय है कि नेपाल ने उसके साथ रिश्तों को उस समय तनावग्रस्त बनाने का काम किया है जब दो अन्य पड़ोसियों चीन व पाकिस्तान के साथ उसके रिश्ते बेहद खराब दौर में है। अभी सीमा विवाद को लेकर भारत व चीन की सेनाओं पूर्वी लद्दाख में आमने सामने हैं। वैसे भी नेपाल के पीएम के पी शर्मा ओली को चीन समर्थक माना जाता है। उनके कार्यकाल में चीन के साथ नेपाल के रिश्ते बेहद प्रगाढ़ हो रहे हैं। माना जाता है कि जब चीन के साथ भारत की ताना-तनी है तब ओली सरकार चीन के इशारे पर ही भारत के साथ लंबित सीमा विवाद को हवा दे रहा है।






