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वामपंथी दबदबा ऐसा है कि ब्लैक लाइव्स मैटर के सामने ऑल लाइव्स मैटर की बात करना असंभव है

पचास वर्ष पहले पश्चिम के छात्र-विद्रोह को देखने वालों के अनुसार अभी ब्लैक लाइव्स मैटर से शुरू हुआ आंदोलन उसी तरह का है, लेकिन एक-दो सप्ताह में ही इसका ऐसा दबाव बना कि लगभग सब कहीं प्रशासन ने घुटने टेक दिए। ऐसा अभूतपूर्व परिणाम किसी आकस्मिक घटना का नहीं हो सकता। वस्तुत: अमेरिका में लंबे समय से बन रही मानसिकता ने एक अश्वेत की मृत्यु के बहाने अपना हस्तक्षेप किया है। यह मानसिकता उच्च शिक्षा संस्थानों में वामपंथी मतवाद के क्रमश: वर्चस्व की कहानी है। यह पूरी प्रक्रिया वामपंथी मतवाद और उसके इतिहास पर नजर रखने वाले ही समझ सकते हैं।

1965 के बाद वामपंथी विचार वाले पश्चिमी युवाओं में बगावत वाली जीवनशैली दिखाई

1960 के दशक वाला पश्चिमी छात्र-विद्रोह यथास्थिति के विरुद्ध था। दो दशक से दुनिया में शांति थी। द्वितीय विश्वयुद्ध में फासिज्म की हार के बाद काफी नवनिर्माण हुआ था, मगर 1965 के बाद पश्चिमी युवाओं में हिप्पी आंदोलन शुरू हुआ। उसके विचार वामपंथी थे। उन्होंने बगावत वाली जीवनशैली दिखाई। परिवार से विद्रोह, नशीली दवाओं का सेवन, फ्री-सेक्स और नाच-गाना उसके कुछ तत्व थे। यहां देवानंद ने उसी पृष्ठभूमि में एक फिल्म बनाई, जिसका गाना दम मारो दम… बहुत प्रसिद्ध हुआ था। उस युवा विद्रोह के विचारों में कम्युनिस्ट प्रभाव था। उसकी भावना थी कि पश्चिम की समृद्धि दुनिया के बाजारों में अपना माल बेचकर मुनाफा कमाने से हुई है।

अमेरिकी समाज में धीरे-धीरे पूर्ण समानता का विचार उठा जिससे अश्वेत लोगों को समान अधिकार मिले

जब अमेरिका ने वियतनाम के गृहयुद्ध में हस्तक्षेप किया तो उस भावना को एक ठोस आधार मिल गया। फिर सारी दुनिया में वामपंथियों ने वियतनाम-वियतनाम का नारा बरसों गुंजाया। तब नस्लवाद पर किसी की नजर नहीं गई, जो वास्तव में मौजूद था। जब अमेरिका में अश्वेत लोगों को समान नागरिकता नहीं थी, उन्हेंं देश में हर कहीं आने-जाने की छूट नहीं थी, तब उसके लिए कोई वामपंथी विद्रोह नहीं हुआ। अमेरिकी समाज में ही धीरे-धीरे पूर्ण समानता का विचार उठा जिससे अंतत: अश्वेत लोगों को समान अधिकार मिले।

अमेरिका में वामपंथी फैशन का समाज पर प्रभावी नहीं हुआ

1960 के दशक का अंत होते-होते हार्वर्ड समेत कई प्रसिद्ध अमेरिकी विश्वविद्यालयों के छात्रों में वामपंथी फैशन स्थापित होने लगा, पर वह समाज पर प्रभावी नहीं हुआ। कारण यह था कि वियतनाम में अमेरिकी पराजय के बाद वहां जो भयानक कम्युनिस्ट सत्ता बनी उससे अमेरिकी वामपंथी ठंडे पड़ गए। जल्द ही चीन ने कम्युनिज्म से मुंह मोड़कर पार्टी-पूंजीवाद का रास्ता लिया। फिर रूसी कम्युनिज्म में संकट शुरू हुआ, जिसने वहां अंतत: कम्युनिज्म का अंत कर दिया।

वामपंथी राजनीति का दूरगामी निवेश

इन कारणों से पश्चिम में वामपंथी राजनीति सूख गई, किंतु विश्वविद्यालयों में वामपंथी बौद्धिक चुपचाप समाज विज्ञान, मानविकी और साहित्य में अपना मतवाद दिनोंदिन फैलाते गए। यह बहुत बड़ा दूरगामी निवेश साबित हुआ। इस बात को भारत में उसी दौर (1969) में बने जेएनयू के उदाहरण और परिणाम से भी समझा जा सकता है। अमेरिकी शिक्षा में लगभग तीन पीढ़ियों से वामपंथी मतवाद का प्रचार चलने का ही परिणाम आज दिख रहा है।

आर्थिक मार्क्सवाद के बदले सांस्कृतिक मार्क्सवाद आया

यह ठीक है कि क्लासिक मार्क्सवादी सिद्धांत टूट गया, लेकिन वामपंथ ने अपना नवीकरण किया। आर्थिक मार्क्सवाद के बदले सांस्कृतिक मार्क्सवाद आया। फिर पूंजीपति की जगह गोरों या अमेरिका को शोषक कहा गया। यह मुहावरा बना कि आप हमारे प्रति दयालु लगते हुए भी उत्पीड़क हैं। मजदूर वर्ग के बदले मायनॉरिटी, जेंडर, जातीयता आदि को लड़ाकू धार दी गई। साम्राज्यवाद-विरोध का नारा नस्लवाद-विरोध हो गया। भारत में वही चीज सांप्रदायिकता या हिंदू-विरोध में बदली। वियतनाम के बदले फलस्तीन उत्पीड़ित देश हो गया, जिसके लिए वामपंथियों को लड़ना था। तीसरी दुनिया के स्थान पर मुस्लिम आव्रजक पीड़ित समूह हो गए।

निक्सन के बदले ट्रंप शैतान हो गए

निक्सन के बदले ट्रंप शैतान हो गए। मुक्के का प्रतीक बदल कर काला फीता लगाने या घुटने-टेक बैठने का प्रदर्शन हो गया है, लेकिन इस नए वामपंथ में कोई भविष्य का सपना नहीं है। पुराने वामपंथ के समाजवाद जैसा कोई वैकल्पिक लक्ष्य नहीं है। यह केवल तरह-तरह के उत्पीड़न के दु:स्वप्न में जीता है। दुर्भाग्यवश इस वामपंथ की पहुंच पश्चिमी समाजों में गहरी लगती है। पहले लोकतांत्रिक दल वामंपथियों का विरोध करते थे। अब वे उनसे मेल बनाने में लगे हुए हैं। पहले स्कूल, कॉलेज, मीडिया आदि हर कहीं विभिन्न विचारों के लिए जगह थी। आज वह कल्पनातीत है। जेंडर, मायनॉरिटी, आव्रजक आदि विषय पर वामपंथी मतवाद से भिन्न कुछ बोलने की इजाजत नहीं।

वामपंथी दबदबा ऐसा है कि जो उन्हेंं नामंजूर हो वह कोई नहीं बोल सकता

विश्वप्रसिद्ध हैरी पॉटर लेखिका जेके रॉलिंग के अपना विचार रखने पर ऐसा हंगामा किया गया कि उन्हेंं तीन बार सफाई देनी पड़ी। ऐसी असहिष्णुता पहले नहीं थी। लोग भिन्न विचार रख सकते थे। अब वामपंथी दबदबा ऐसा है कि जो उन्हेंं नामंजूर हो वह कोई नहीं बोल सकता। ब्लैक लाइव्स मैटर के सामने ऑल लाइव्स मैटर की तख्ती लेकर खड़े होना असंभव है। मानो ऐसा कहना उनका अपमान करना हो।

वामपंथी मतवाद की प्रतिष्ठा बढ़ती गई

इन पांच दशकों में, इतिहास, साहित्य, समाजशास्त्र, राजनीति आदि में मुख्यत: भेदभाव और अत्याचार पाठ पढ़ने-पढ़ाने का चलन बढ़ा। जानकारों के बदले एक्टिविस्ट तैयार हुए। धीरे-धीरे ऐसे लोग प्रशासन, मीडिया, स्कूल, कला केंद्र, न्यायालय, कॉरपोरेट आदि हर कहीं पहुंचे। इस तरह वामपंथी मतवाद की प्रतिष्ठा बढ़ती गई। उन्हेंं संतुलित करने के लिए उदारवादी, तथ्य-परक, सामाजिक ज्ञान देने की चिंता शासकों या समाज को नहीं हुई। यह बहुत बड़ी भूल थी। अमेरिका में जबसे जॉर्ज फ्लायड के नाम पर प्रदर्शन शुरू हुए हैं तबसे उग्र लफ्फाजी के सामने समतापरक, मेलजोल वाले विचारों को जगह नहीं मिल रही है। सभी तरह के वामपंथियों का अतुलनीय वर्चस्व दिख रहा है। जो बातें अमेरिका में चार दशक पहले कुछ वामपंथी प्रोफेसरों के भाषणों में ही थीं, वे अब चारों तरफ सुनी जा रही हैं।

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