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कोरोना संकट से निपटने में CM योगी के कौशल की सराहना PM से लेकर पाकिस्तान तक कर रहे

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विपक्षी दलों के लिए अच्छे दिन फिलहाल आते नहीं दिखते। बगैर लाग-लपेट कहा जाए तो 2014 से बार-बार पटखनी खा रहे विपक्षी दलों को अपने ही बिछाए उस जाल से बाहर निकलने की तरकीब नहीं सूझ रही जिसमें वह भाजपा को फंसाना चाहते थे। इन दलों के लिए सबसे बड़ी निराशा यह है कि कोरोना से भी उन्हें कोई मदद नहीं मिली।

इन्हें उम्मीद रही होगी कि कोरोना से निपटने में योगी सरकार कामयाब नहीं होगी, पर प्रदेश का सौभाग्य और विपक्षी दलों का दुर्भाग्य कि कोरोना संकट से निपटने में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कौशल एवं प्रबंधन की सराहना प्रधानमंत्री से लेकर पाकिस्तान तक कर रहे हैं।

पर योगी आदित्यनाथ ने हथियार नहीं डाले: जनसंख्या की दृष्टि से दुनिया के भारत सहित सिर्फ पांच देशों से छोटे उत्तर प्रदेश में कोरोना संक्रमण के लिए सारी अनुकूलताएं मौजूद थीं। उस पर दिल्ली, मुंबई, गुजरात, नासिक, सूरत और कई अन्य सघन संक्रमित प्रदेशों से लौटे करीब 30 लाख कामगारों ने कोढ़ में खाज जैसे हालात पैदा करने की जमीन तैयार कर दी थी। दिल्ली वाली दीदी और लखनऊ वाले भतीजे ने कटाक्षपूर्ण ट्वीट शुरू भी कर दिए थे, पर योगी आदित्यनाथ ने हथियार नहीं डाले। जब यूपी के कई लाख कामगार अंधेरे में दिल्ली से खदेड़े गए, तब योगी ने रात भर जागकर एक हजार बसें गाजियाबाद बॉर्डर भेजीं और सभी श्रमिकों को उनके घर भिजवाया।

खातों में नकद राशि डाली गई: जब राजस्थान सरकार ने कोटा से यूपी के विद्यार्थियों को शहर से जाने का अल्टीमेटम दे दिया, तब योगी ने बसें भेजकर सारे बच्चों को उनके घर भिजवाया। जब महाराष्ट्र समेत सभी प्रदेशों में यूपी के श्रमिकों को राश देना बंद कर दिया, तब योगी ने केंद्र सरकार से बात करके श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलवाईं और लाखों प्रवासी श्रमिक अपने घर पहुंच सके। सभी आगंतुकों का स्वास्थ्य परीक्षण हुआ। जिन्हें जरूरत थी, उन्हें इलाज मुहैया कराया गया। खातों में नकद राशि डाली गई और माहौल सामान्य होने पर सबको काम पर लगाया गया। कोरोना अब भी मौजूद हैं, पर उसका हौसला पस्त हो रहा है। उसके साथ विपक्षी दल भी पस्त हो रहे हैं।

धान-गेहूं खरीद की सरकारी व्यवस्था से किसान खुश: पाकिस्तान के सबसे बड़े अखबार ने लिखा कि कोरोना से कैसे लड़ा है, यह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सीखना चाहिए। यही बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कही। योगी के लिए इससे बड़ी और संतोषदायक सराहना क्या हो सकती है, पर विपक्ष अब क्या करे? धान-गेहूं खरीद की सरकारी व्यवस्था से किसान खुश हैं। योगी के पास गिनाने को तमाम अन्य उपलब्धियां हैं, पर मौजूदा केंद्र-राज्य सरकार के शासनकाल में यूपी में एक बड़ा बदलाव आया। वो है, जातिवाद का बहुत कमजोर पड़ जाना। इसका श्रेय सरकार की नीतियों और कार्यशैली को जाता है।

गरीबों के खातों में पहली बार सीधे नकद पैसा पहुंचा: दरअसल 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हर जाति के गरीबों के लिए जो कल्याणकारी योजनाएं शुरू हुईं, यूपी के विपक्षी दल उनका मर्म भांप नहीं पाए। जिन वंचित परिवारों में पहली बार एलपीजी सिलिंडर और चमचमाता स्टील चूल्हा पहुंचा, जिनके हाथों में पहली बार पासबुक पहुंची और जिन गरीबों के खातों में पहली बार सीधे नकद पैसा पहुंचा, वे प्रधानमंत्री के मुरीद हो गए। इसका असर 2017 विधानसभा और 2019 लोकसभा चुनाव में साफ दिखा, पर विपक्ष की आंखों पर चढ़ा मोतियाबिंद उसे साफ नहीं देखने देता।

जातियों के वोटबैंक दरक चुके हैं, पर विपक्ष यह सच्चाई स्वीकार करने को तैयार नहीं। इन दलों को आज भी उम्मीद है कि मुसलमान भाजपा को विरोध ही करेंगे। उन्हें शायद पता नहीं कि कोरोना काल और इससे पहले करोड़ों मुस्लिम परिवारों को सरकार की योजनाओं का भरपूर लाभ मिला है। इसके बावजूद विपक्ष को उम्मीद है कि यूपी में उसकी किस्मत से कोई चमत्कार होगा। धर्म और जातियों के नाम पर विभाजक रेखाएं खिंच जाएंगी। कुछ लोग भाजपा का समर्थन करेंगे, जबकि बाकी लोग मजबूरी में विपक्ष का साथ देंगे। उसे कुछ करने की जरूरत नहीं। रोज दो-चार ट्वीट करते रहो। बस हो गई राजनीति। विपक्ष यह नहीं समझ पा रहा कि मोदी-योगी की जोड़ी ने राजनीति को कितना पेशेवर, जवाबदेह और सकारात्मक बना दिया है।

लोगों को विश्वास है कि नतीजा कुछ भी रहे, पर मोदी-योगी की मंशा में ईमानदारी है। राजनीति का यह ऐसा फॉर्मेट है, जहां विपक्ष को आरोप-प्रत्यारोप की नकारात्मकता से बाहर निकलकर सार्थक योगदान करना होगा। मोदी-योगी की लकीर मिटाने की आदत त्यागकर उसके समानांतर बड़ी लकीर खींचनी होगी। आम आदमी परफॉर्मेस देखना चाहता है। विपक्ष को अवसर पर नजर रखनी चाहिए, यद्यपि मोदी-योगी के सामने अवसर मिलना आसान नहीं है।

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