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ताकत को पहचाने भारत: जब हम तकनीक में कुछ बेहतर और नया करेंगे तभी हम चीन से लोहा ले सकेंगे

आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के अनुसार हाइपरसोनिक्स, 5-जी इंटरनेट, जेनेटिक्स, र्आिटफिशियल इंटेलिजेंस, थ्रीडी प्रिंटिंग संबंधी तकनीक से ही यह तय होगा कि विश्व पर किसका दबदबा रहेगा? नई तकनीकों पर पेटेंट लेने के लिए वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑर्गनाइजेशन यानी वाइपो में अर्जी दाखिल की जाती है जिससे उस तकनीक पर विश्व में पेटेंट धारक का एकाधिकार स्थापित हो जाए। वाइपो के अनुसार गत वर्ष चीन ने अमेरिका से अधिक संख्या में पेटेंट की अर्जियां दाखिल की हैं। 1999 में चीन ने केवल 300 अर्जी दाखिल की थीं जो गत वर्ष 59000 हो गईं, जबकि अमेरिका द्वारा केवल 58000 अर्जियां दाखिल की गईं। इस तरह अमेरिका चीन से पिछड़ गया।

चीन की कंपनी हुआवे सर्वाधिक पेटेंट फाइल करने वाली वैश्विक कंपनी बन गई

यह भी सामने आया कि चीन की कंपनी हुआवे लगातार तीसरे वर्ष सर्वाधिक पेटेंट फाइल करने वाली वैश्विक कंपनी बन गई है। स्पष्ट है कि चीन विश्व का तकनीकी गुरु बन चुका है। चीन की इस तकनीकी बढ़त का कारण वहां की सरकार का राजनीतिक संकल्प और वित्तीय सहायता है।

चीन से निवेश बंद करने का प्रभाव इस पर निर्भर करेगा कि हममें दम कितना है

भारत का चीन से एक संबंध निवेश का है जैसे हमारी ओला टैक्सी कंपनी में चीन ने निवेश कर रखा है। यदि समय क्रम में हम इस तरह की कोई और कंपनी बनाकर ओला को मात देने में सफल रहते हैं तो चीन का यह निवेश हमारे लिए लाभप्रद हो जाएगा। इसके विपरीत यदि ओला टैक्सी लंबे समय तक चीन को लाभ कमाकर भेजती रही तो यही निवेश हमारे लिए हानिप्रद हो जाएगा। इसलिए चीन से निवेश बंद करने का प्रभाव इस पर निर्भर करेगा कि हममें दम कितना है? यदि हमने घरेलू पूंजी एकत्रित कर ली अथवा सरकार ने पूंजी उपलब्ध करा दी तो चीन से पूंजी न मिलने का हम पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इसी प्रकार व्यापार का विषय है। हमारे माल की उत्पादन लागत अधिक आती है और इसीलिए हम चीन से पिट रहे हैं।

चीन से व्यापार करें या न करें, दोनों स्थिति में हम मार खाएंगे

इस परिस्थिति में यदि हम चीन से आयात नहीं करते तो हमें स्वयं तो महंगे माल की खपत करनी ही पड़ेगी, साथ ही साथ हम विश्व बाजार से बाहर हो जाएंगे। चीन से व्यापार करें या न करें, दोनों स्थिति में हम मार खाएंगे। यदि हम व्यापार करेंगे तो चीन का सस्ता माल हमारे बाजार में आएगा और हमारे उद्योगों को नष्ट करेगा। अगर हम व्यापार नहीं करेंगे तो हमारे माल का उत्पादन महंगा पड़ेगा और हम पुन: मार खाएंगे। इसलिए आज विषय यह नहीं कि हम चीन से व्यापार करें या न करें? विषय यह है कि क्या हम अपने माल को चीन की तरह सस्ता बना सकते हैं?

हम तकनीक के सृजन में चीन से कमजोर पड़ रहे हैं

आखिर हम तकनीक के सृजन में चीन से कमजोर क्यों पड़ रहे हैं? 1950 में ही नहीं, बल्कि 1980 में भी हम चीन से आगे नहीं तो उसके बराबर थे। अब फिर से बराबरी और बढ़त हासिल करने के लिए हमें वित्तीय सहायता और राजनीतिक संकल्प, दोनों पक्षों पर विचार करना होगा। भारत सरकार द्वारा जारी 2017-18 के आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया था कि पिछले 20 वर्षों से रिसर्च पर देश की कुल आय या जीडीपी का केवल 0.7 प्रतिशत रकम खर्च की जा रही है, जबकि चीन द्वारा 2.1 प्रतिशत, लेकिन यह ध्यान रहे कि चीन का जीडीपी हमसे लगभग पांच गुना है इसलिए शुद्ध रकम में हम चीन के द्वारा खर्च की जा रही रकम का केवल सात प्रतिशत रिसर्च में निवेश कर रहे हैं।

चीन के सरकारी कर्मियों का वेतन प्रति व्यक्ति जीडीपी का 1.5 गुना है जबकि भारत में 4.6 गुना

इसका मुख्य कारण यह है कि सरकार के बजट का एक बड़ा हिस्सा सरकारी कर्मियों के वेतन में जा रहा है। चीन के सरकारी कर्मियों का वेतन प्रति व्यक्ति जीडीपी का 1.5 गुना है जबकि भारत में 4.6 गुना। मेरा मानना है कि 20 वर्ष पूर्व लागू पांचवें वेतन आयोग के बाद से भारत सरकार की स्थिति ऐसी रही ही नहीं कि वह शोध-अनुसंधान में अपेक्षित निवेश कर सके। पहले सरकार को अपना घर ठीक करना होगा। अपनी खपत में विशेषकर वेतन और पेंशन में कटौती करनी होगी। यह देखना होगा कि सरकारी र्किमयों को बढ़े हुए वेतन देना ज्यादा जरूरी है या फिर रिसर्च में निवेश करना?

देश में सरकारी विश्वविद्यालयों एवं रिसर्च संस्थाओं की स्थिति लचर

तकनीकी पिछड़ेपन का दूसरा कारण राजनीतिक संकल्प है। यह किसी से छिपा नहीं कि हमारे अधिकांश सरकारी विश्वविद्यालयों एवं रिसर्च संस्थाओं की स्थिति लचर है। कुछ समय पूर्व किसी विश्वविद्यालय के एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर से चर्चा हुई तो उन्होंने बताया कि मुझे काम न करने की आदत पड़ गई है। इसलिए सेवानिवृत्ति के बाद काम न करने में मुझे कोई कठिनाई नहीं होती। यहां बताते चलें कि अमेरिका की अब तक की तकनीकी अगुआई के पीछे अमेरिकी विश्वविद्यालयों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। चीन में भी वहां के विश्वविद्यालयों की भूमिका है, लेकिन हमारे विश्वविद्यालय रिसर्च करने के स्थान पर केवल छात्रों को सर्टिफिकेट बांटते हैं। भारत को चेतना चाहिए।

चीन विश्व से अलग-थलग पड़ने वाला नहीं, तुलसीदास ने कहा है-‘समरथ को नहीं दोष गोसाईं

यह समय चीन की दबंगई पर हाहाकार करने का नहीं है। चीन विश्व से अलग-थलग पड़ने वाला नहीं है। तुलसीदास ने कहा है, ‘समरथ को नहीं दोष गोसाईं।’ साफ है कि भारत को पहले स्वयं को समर्थ बनाना होगा। इसके लिए शिक्षा और शोध संस्थानों की गुणवत्ता सुधारने पर सबसे अधिक जोर देना होगा।

सरकार को अपने बजट को रिसर्च में निवेश की तरफ मोड़ना होगा

सरकार को अपने बजट को खपत के स्थान पर रिसर्च में निवेश की तरफ मोड़ना होगा। वेतन-पेंशन में कटौती करके रिसर्च में 1000 प्रतिशत की वृद्धि करनी होगी। सरकारी विश्वविद्यालयों और रिसर्च संस्थानों की कार्यप्रणाली की गुणवत्ता को सुधारने के साथ निजी संस्थानों को ठेके पर रिसर्च का काम देना होगा।

जब हम तकनीक के क्षेत्र में कुछ बेहतर और नया करेंगे तभी हम चीन से लोहा ले सकेंगे

जब हम तकनीक के क्षेत्र में कुछ बेहतर और नया करेंगे तभी हम चीन से लोहा ले सकेंगे। इस समय हम चीन से निवेश लें या न लें, व्यापार करें या न करें, चीन का माल खरीदें या न खरीदें, हर हालत में स्थिति गंभीर बनी रहेगी। साफ है कि चीन से निपटने के मामले में तात्कालिक ही नहीं, दीर्घकालिक रणनीति बनाने की भी जरूरत है। इस जरूरत की र्पूित प्राथमिकता के आधार पर की जानी चाहिए।

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