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पेट्रोल और डीजल के दामों में वृद्धि से न सिर्फ महंगाई बढ़ेगी, बल्कि त्रस्त आम आदमी की कमर तोड़ देगी

पिछले कुछ दिनों से देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। लोग हैरत में हैं कि आखिर जब विश्व बाजार में कच्चे तेल के दाम कम हैं तो भारत में पेट्रोल और डीजल महंगा क्यों हो रहा है? पेट्रोल और डीजल के दामों में वृद्धि न केवल देश में महंगाई को बढ़ाएगी, बल्कि लॉकडाउन की वजह से त्रस्त आम आदमी की कमर भी तोड़ देगी। केंद्र और राज्य सरकारों की मजबूरी यह है कि उनके पास राजस्व या आय का दूसरा कोई जरिया नहीं रह गया है। व्यापार ठप पड़े हैं इसलिए जीएसटी नहीं आ रहा है और जब व्यापार नहीं होगा तो कस्टम ड्यूटी, एक्साइज ड्यूटी और आयकर भी कहां से आएगा?

पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाते जाओ की नीति गलत है, बदलनी होगी

जब लोगों की आमदनी नहीं होगी तो वे सरकार को पैसा कहां से देंगे, फिर भी केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को सबसे आसान तरीका यही नजर आ रहा है कि पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाते जाओ। यह नीति गलत है। केंद्र एवं राज्य सरकारों को चाहे वे भाजपा की हों या दूसरे दलों की, उन्हेंं अपनी यह नीति बदलनी होगी। राजस्व इकट्ठा करने का सिर्फ एक माध्यम नहीं होना चाहिए। सरकार को दूसरे उपायों पर भी काम करना होगा।

विश्व बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल बहुत सस्ता है

विश्व बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल इस समय 41 डॉलर प्रति बैरल है जो पहले के मुकाबले बहुत सस्ता है। बीच में कुछ महीनों तक यह गिरकर 20 डॉलर तक पहुंच गया था। मनमोहन सिंह सरकार के जमाने में यह 120 डॉलर प्रति बैरल था। विश्व बाजार से हमें अभी काफी सस्ता तेल मिल रहा है। इस समय लॉकडाउन की वजह से देश में ट्रेन, जहाज, कल-कारखाने भी ज्यादातर बंद हैं इसलिए तेल की खपत कम हो रही है। इससे हमारा तेल आयात भी कम हो गया है।

पेट्रोल-डीजल के दाम टैक्स बढ़ाने की वजह से बढ़ रहे हैं

आयात कम होने का सबसे बड़ा फायदा यह मिलता है कि सीएडी (चालू वित्तीय घाटा) भी कम हो जाता है। ऐसी हालत में सरकारी कोष को बहुत राहत मिलती है। जब हमें तेल आयात पर ज्यादा धन नहीं देना पड़ रहा है, लेकिन पेट्रोल-डीजल के दाम दूसरे तमाम टैक्स बढ़ाने की वजह से बढ़ रहे हैं। टैक्स की यह रकम केंद्र और राज्य सरकारों को जाती है। कुछ राज्य सरकारें तो अपने कर्मचारियों को वेतन भी इसी के बूते दे पा रही हैं।

2008 में स्थिति इतनी खराब थी कि तेल निर्यातकों ने कर्ज पर तेल न देने की धमकी दी थी

एक समय तेल कंपनियों की हालत बहुत खराब हो गई थी और वे कर्ज में डूबी थीं। 2008 के करीब उनकी स्थिति इतनी खराब थी कि तेल निर्यातकों ने उन्हेंं कर्ज पर तेल न देने की धमकी तक दी थी। आज वैसी स्थिति नहीं है। पिछले छह साल से विश्व बाजार में तेल के दाम काफी गिरे हैं जिससे भारतीय तेल कंपनियों की हालत बहुत सुधर चुकी है, लेकिन उसका फायदा देश की जनता को नहीं मिल पाया है। उलटे पेट्रोल, डीजल और गैस के दाम बढ़ गए हैं।

भारत में सबसे सख्त लॉकडाउन होने की वजह से सब कुछ ठप हो गया

भारत में सबसे सख्त लॉकडाउन होने की वजह से सब कुछ ठप हो गया, जबकि बाकी देशों ने कल-कारखाने चालू रखे। जब सारी गतिविधियां ठप हो गईं तो सरकार को बाकी स्नोतों से राजस्व मिलने का प्रश्न ही नहीं उठता। बाकी देशों ने अपने यहां हर व्यापार में कर माफ कर दिया, बिजली शुल्क माफ कर दिए और सरकारी लेनदारी भी माफ कर दी। इसके अलावा बैंकों ने ब्याज माफ कर दिए, लेकिन भारत में ऐसा कुछ नहीं हुआ। इससे व्यापार चौपट हो गया और तमाम लोगों की नौकरियां चली गईं या जाने की कगार पर हैं। इन हालात में सरकार को अपनी लेनदारी पर रोक लगानी होगी, क्योंकि जब पैसा ही नहीं है तो लोग देंगे कहां से? बैंकों ने ब्याज सिर्फ टाला है। वे बाद में ब्याज पर ब्याज वसूलने की तैयारी में हैं। हालांकि अभी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है। उम्मीद है कि वह बैंकों को चक्रवृद्धि ब्याज नहीं वसूलने देगा।

सरकार को लॉकडाउन में बंद आर्थिक गतिविधियों को तेज कर देना चाहिए

प्रश्न है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस समस्या का हल कैसे ढूंढें? मेरे लिहाज से तुरंत आर्थिक गतिविधियों को तेज कर देना चाहिए। सारे कल-कारखाने और अन्य व्यापारिक गतिविधियों को सौ प्रतिशत खोलने की अनुमित दी जाए। चूंकि 50 प्रतिशत कर्मचारियों के साथ व्यापार या कारखाना चलाना मुश्किल है इसलिए सभी कर्मचारियों को ड्यूटी पर आने दिया जाए। अगर विश्व के बाकी देश कोरोना से बचने की सावधानी रखकर अपने कल-कारखाने और व्यापार चला रहे हैं तो यह भारत में क्यों नहीं हो सकता? आखिर हम कब तक इस तरह की रोक लगाए रहेंगे।

निर्माण कंपनियों को मदद देकर इस सेक्टर को जिंदा किया जाए

सबसे पहले निर्माण की गतिविधियां तत्काल प्रभाव से चालू की जाएं। सरकार अतिरिक्त पैसा लगाकर जगह-जगह निर्माण कार्य शुरू करे। इसी के साथ-साथ निर्माण कंपनियों को मदद देकर इस सेक्टर को जिंदा किया जाए। इससे कई उद्योग भी जीवित हो जाएंगे, जिनमें सीमेंट, स्टील, खान, फर्नीचर, प्रसाधन, वस्त्र तथा घर-ऑफिस के सजावट के तमाम उद्योग धंधे चल पड़ेंगे।

यदि विकास दर बढ़ानी है तो निर्माण की गतिविधियों पर सबसे ज्यादा जोर दिया जाना चाहिए सर्विस

योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया अक्सर मुझसे यह कहते थे कि आप मुख्यमंत्रियों से बात करके कहें कि वे नई राजधानियां बनाएं। मैं जब उनसे इसका कारण पूछता तो वे कहते कि आर्थिक क्षेत्र में 40 साल काम करने के बाद मेरा तजुर्बा यह है कि यदि विकास दर बढ़ानी है तो निर्माण की गतिविधियों पर सबसे ज्यादा जोर दिया जाना चाहिए।

निर्माण सेक्टर में करोड़ों गरीबों को रोजगार मिलेगा, कई उद्योग धंधे भी फलने-फूलने लगेंगे 

इससे न केवल करोड़ों गरीबों को रोजगार मिलेगा, बल्कि कई उद्योग धंधे भी फलने-फूलने लगेंगे। उनके चलने से बिजली की खपत बढ़ेगी जिससे राज्य सरकारों की ठप हुई आमदनी शुरू हो जाएगी। जब उद्योग और व्यापार चलने लगेंगे तो कस्टम, एक्साइज और आयकर भी मिलने लगेंगे। रेस्तरां, सर्विस सेक्टर और छोटे एवं मझोले व्यापार खुलने से जीएसटी भी आनी शुरू हो जाएगी।

निर्यात कंपनियों को छूट देना चाहिए, ताकि बाहर से पैसा देश में आना शुरू हो

दूसरा कदम निर्यात कंपनियों को पूरी छूट देने का होना चाहिए, ताकि बाहर से पैसा देश में आना शुरू हो। कार्गो फ्लाइट और शिप भी पहले की तरह शुरू कर देने चाहिए। तीसरा जरूरी कदम यह है कि लॉकडाउन की वजह से जितने भी व्यापार धंधे चौपट हो गए हैं उन्हेंं बैंक रियायती दरों पर तत्काल पूंजी दें।

बैंक कर्ज के नाम पर खानापूर्ति कर रही हैं

वित्त मंत्रालय ने बैंकों को कर्ज बांटने के लिए कहा था, लेकिन बैंक नीचे कोई कर्ज नहीं दे रहे हैं। सिर्फ बड़ी कंपनियों या सार्वजनिक उपक्रम को पैसा देकर खानापूर्ति कर रहे हैं, ताकि उनका पैसा सुरक्षित रहे। चौथा कदम लॉकडाउन के दौरान का सारा ब्याज माफ करने का होना चाहिए। उसे मूलधन में जोड़कर नहीं वसूलना चाहिए। मुझे उम्मीद है कि यदि ये कुछ कदम उठाए गए तो सिर्फ पेट्रोल, डीजल से कमाई की जरूरत नहीं पड़ेगी।

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