ब्रेकिंग
PM Modi in Indonesia: 'भारत मदर ऑफ डेमोक्रेसी', इंडोनेशिया की संसद में पीएम मोदी ने पेश किया 'गंगा-म... Welcome to the Jungle Budget: 250 करोड़ नहीं, डायरेक्टर अहमद खान ने बताया फिल्म का असली बजट Ramayana Movie Rights: करण जौहर ने 250 करोड़ में खरीदे 'रामायण' के डिस्ट्रीब्यूशन राइट्स, दिवाली पर ... Prabhas Fauzi Update: प्रभास की 'फौजी' में होगा हाई-वोल्टेज एक्शन, 10 जुलाई से शुरू होगी इंटरवल सीन ... Akshay Kumar 2016 Movies: 'एयरलिफ्ट' से 'रुस्तम' तक, जब अक्षय कुमार ने 8 महीने में दी थीं लगातार 3 स... UP ATS Action: लखनऊ NIA कोर्ट का बड़ा फैसला, 13 बांग्लादेशी और 2 रोहिंग्या घुसपैठियों को 5-5 साल की ... डबरा में सफाई कर्मचारी की संदिग्ध मौत, अपहरण के शक में पुलिसकर्मियों पर पिटाई का आरोप Khajrana Civil Hospital: जमीन का नहीं हुआ हस्तांतरण, इसलिए अटका खजराना सिविल अस्पताल का काम Haridwar Mansa Devi Temple: राम मंदिर विवाद के बाद मनसा देवी ट्रस्ट सख्त, पुजारियों के लिए बनाए कड़े... Ketan Agrawal Murder Case: केतन हत्याकांड में चौंकाने वाला खुलासा, आरोपी चेतन-सिया ने 4 महीने पहले क...
देश

जिन नेताओं ने अपनी पूरी जिंदगी कांग्रेस की सेवा में खपा दी, अब उनकी नीयत पर ही संदेह किया जा रहा है

पार्टी के कायाकल्प की योजना तैयार करने के मकसद से पत्र लिखने वाले 23 कांग्रेसी नेता जिस तरह अपने कदम पीछे खींचने को तैयार नहीं उससे कांग्रेस की मुसीबत बढ़ती जा रही है। कांग्रेस अपने अस्तित्व के अब तक के सबसे बड़े संकट से जूझ रही है, क्योंकि वह दिशाहीन हो गई है और इसके चलते उसके कार्यकर्ता हताश हैं। कांग्रेस कार्यसमिति की हालिया बैठक में जिस तरह पत्र लिखने वालों की आवाज को दबाया गया उससे स्पष्ट है कि पार्टी को अपनी निजी जागीर की तरह चलाने वाले नेहरू-गांधी परिवार और उनके चापलूस ईमानदारी से आत्मविश्लेषण नहीं करेंगे

पत्र लिखने वाले 23 कांग्रेसी नेता अपने रुख पर अडिग

पार्टी नेतृत्व में जब नेहरू-गांधी परिवार का कोई सदस्य शीर्ष पर होता है, तब चर्चा और सामूहिक नेतृत्व को लेकर एक खास रुझान देखने को मिलता है। तब आत्मविश्लेषण के किसी भी आह्वान को विद्रोह की संज्ञा दी जाती है और पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र एवं सामूहिक नेतृत्व की मांग ईशनिंदा सरीखी मानी जाती है। जब परिवार से बाहर का कोई अध्यक्ष होता है तो ऐसी मांग अवश्य उठाई जाती है। पीवी नरसिंह राव, सीताराम केसरी और अन्य नेता जब अध्यक्ष थे तो ऐसी ही आवाजें उठाई गई थीं। इस पैमाने से देखा जाए तो सोनिया के नेतृत्व वाली कांग्रेस में बदलाव के लिए पत्र लिखने वाले 23 नेताओं का यह कृत्य किसी पाप से कम नहीं माना जाएगा। जो भी हो, इन नेताओं ने एक तरह से कांग्रेस की परंपराओं से विमुख होने का ही फैसला किया। अच्छी बात यह है कि वे अपने रुख पर अडिग हैं।

चुनावों में पराजय कांग्रेस के पराभव का संकेत

पत्र लिखने वाले कांग्रेस नेताओं ने अपनी यह बात घुमा फिराकर कहने के बजाय दो टूक लहजे में कही कि एक के बाद चुनावों में पराजय पार्टी के पराभव का संकेत करती है। उन्होंने कहा कि इसके तमाम कारण हैं, जिनकी तत्काल पड़ताल की जानी चाहिए, अन्यथा कांग्रेस राज्यों के साथ-साथ केंद्र में भी हाशिये पर सिकुड़ती जाएगी, जिसके प्रमाण पहले से ही दिखने भी लगे हैं। पत्र से भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे लिखने वाले नेता वास्तव में एक ईमानदार आकलन कर सवालों की तह में जाकर उनके जवाब तलाशना चाहते हैं। देश की सबसे पुरानी पार्टी के भविष्य की चिंता उन्हें सता रही है। यही कारण है कि उन्होंने पत्र में पार्टी अध्यक्ष को बड़ी स्पष्टता से इस सच्चाई से परिचित कराया है कि पार्टी के समर्थन की जमीन खासकर युवाओं में उसका आधार लगातार खिसक रहा है

कांग्रेस के प्रदर्शन में भारी गिरावट

पार्टी के चुनावी प्रदर्शन के आधार पर उन्होंने कहा कि विगत छह वर्षों में देश में 18.7 करोड़ नए मतदाता जुड़े, लेकिन पार्टी उन्हेंं आकर्षित नहीं कर पाई और उन्होंने दिल खोलकर मोदी एवं भाजपा के पक्ष में मतदान किया। उन्होंने इस ओर भी संकेत किया कि 2009 के आम चुनाव में भाजपा के मतों की जो संख्या सिकुड़कर 7.84 करोड़ रह गई थी, वह 2014 में बढ़कर 17.60 करोड़ और 2019 में और चढ़कर 22.90 करोड़ हो गई। इसकी तुलना में कांग्रेस के प्रदर्शन में भारी गिरावट देखी गई। उसने 2009 में 12.30 वोट हासिल किए, जो 2019 तक घटकर 11.94 करोड़ रह गए

आत्मविश्लेषण का अभाव कांग्रेस के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं

पत्र लिखने वाले नेताओं का कहना है कि इतने दयनीय प्रदर्शन के बावजूद कांग्रेस ने लगातार मिल रही हार के कारणों की ईमानदारी से विवेचना नहीं की। सीधे शब्दों में कहें तो इन नेताओं का कहना है कि आत्मविश्लेषण का अभाव पार्टी के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं। इन नेताओं ने कई सुझाव भी दिए हैं। वे देश भर में व्यापक सदस्यता अभियान और सभी स्तरों पर चुनाव की हिमायत कर रहे हैं। उनका यह भी कहना है कि चुनौतियों की गंभीरता को देखते हुए यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि पार्टी सामूहिक-संस्थागत नेतृत्व का सहारा ले, जो उसे सही दिशा दिखा सके। पार्टी को ये सुझाव अच्छी समझ वाले नेताओं की ओर से मिले हैं, जिनमें किसी तरह की कोई दुर्भावना नहीं है। उन्होंने ये बातें इसलिए नहीं की हैं कि उनका झुकाव भाजपा की ओर है जैसा कि शुरू में आरोप भी लगाया गया। इनमें से किसी भी नेता ने अतीत में मोदी या भाजपा के प्रति जरा भी नरमी नहीं दिखाई है।

नेहरू-गांधी परिवार ने आंतरिक विमर्श को हमेशा उपेक्षित किया

यह कोई छिपी बात नहीं कि नेहरू-गांधी परिवार ने हमेशा आंतरिक विमर्श को उपेक्षित किया है। मई 1999 में शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने भी कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में कुछ अहम सवाल उठाए थे। तब सोनिया गांधी की नागरिकता को लेकर बहस छिड़ी हुई थी और आम चुनावों में वह बेहद अहम मुद्दा बन गया था। संगमा ने उनसे पूछा था कि क्या उनके पास भारत और इटली की दोहरी नागरिकता है? उन्होंने यह सवाल इस मंशा के साथ पूछा था कि इस पर स्पष्टीकरण के साथ पार्टी कार्यकर्ता उन अफवाहों की काट करने में सक्षम होंगे, जो विपक्षी दलों द्वारा फैलाई जा रही हैं। सोनिया ने उस सवाल का जवाब नहीं दिया। इसके बजाय अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद पार्टी ने पवार, संगमा और अनवर को निष्कासित कर दिया। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राजग ने वह चुनाव आसानी से जीत लिया। उस चुनाव में कांग्रेस का मत प्रतिशत 28.30 प्रतिशत था, जो 2019 में सिकुड़कर 19.50 प्रतिशत रह गया।

जिन नेताओं ने पूरी जिंदगी कांग्रेस की सेवा में खपा दी, अब उन पर संदेह किया जा रहा

यदि पत्र लिखने वाले 23 नेताओं को ही किनारे कर दिया जाता है तो इससे कांग्रेस को क्या हासिल होगा? इस पूरी कवायद में खासतौर से गुलाम नबी आजाद, वीरप्पा मोइली, पीजे कुरियन, आनंद शर्मा, भूपेंद्र सिंह हुड्डा, कपिल सिब्बल और पृथ्वीराज चव्हाण को निशाना बनाया जा रहा है। कुरियन 1959 में छात्र जीवन के दौरान ही कांग्रेस से जुडे़ थे। वह पार्टी से 60 वर्षों के जुड़ाव का दावा कर सकते हैं। वह 1980 से संसद में हैं। मोइली 1972 में कांग्रेस के टिकट पर पहली बार कर्नाटक विधानसभा में पहुंचे। आजाद का भी कांग्रेस से पुराना नाता रहा है। वह 1973 में ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के सचिव बने थे। यह बड़े दुख की बात है जिन नेताओं ने अपनी पूरी जिंदगी ही कांग्रेस की सेवा में खपा दी, अब उनकी नीयत पर ही संदेह किया जा रहा है। यदि यह सिलसिला कायम रहा तो कांग्रेस की सियासी जमीन लगातार सिकुड़ती जाएगी और वह अपनी प्रासंगिकता खो देगी। पत्र लिखने वाले नेताओं की छवि गंभीर और विश्वसनीय है। उनकी आवाज को खारिज कर नेहरू-गांधी परिवार पार्टी को और गहरी गर्त में धकेलने पर आमादा है। न केवल कांग्रेस पार्टी, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के लिए भी इसके घातक नतीजे होंगे।

Related Articles

Back to top button