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रेड-ग्रीन सिग्नल, हम नहीं होने देंगे उल्लंघन

बिलासपुर। अदृश्य वायरस की दूसरी लहर बेहद घातक है। इसे लेकर हर तरफ हाहाकार मचा हुआ है। स्थिति भयानक होने के बाद भी कुछ यात्री लापरवाही से बाज नहीं आते हैं। ऐसा लगता है मानों उल्लंघन कर प्रशासन को चिढ़ाना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। यह लापरवाही काफी दिनों से चल रही थी। इन्हें सबक सिखाने का फरमान नहीं मिलने के कारण सुरक्षा अमला भी अनदेखी कर देता था। पर उनकी यह लापरवाही दूसरों(नियमों का पालन करने वाले) के लिए कब खतरनाक साबित हो जाए यह कोई नहीं जानता है। यही वजह है कि सुरक्षा अमले को सख्त रहने का आदेश जारी हुआ। बस फिर क्या था अमला सक्रिय हो गया और कमर कसकर उल्लंघनकारियों को सब सिखाने मैदान पर उतर गया। जब अमला निकलता है तो लापरवाह यात्री भी लाइन में आ जाते हैं। गश्त के दौरान जागरूक करते हैं। न मानने को वालों को कानून का पाठ भी पढ़ाते हैं।

काम करो और सबूत दो

पिछले दिनों रेलवे के मरम्मत कार्यालय की बड़ी कमी उजागर हुई। इसकाखामियाजा यहां काम करने वाले कर्मचारियों को भुगतना पड़ा। इससे वे अधिकारी सकते में आ गए हैं, जिन पर व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी है। कार्यशैली पर उंगली उठने लगीं। बात आल अफसरों तक न पहुंच जाए, इसी खौफ से आनन-फानन में खामियां सुधारने का आदेश दे दिया। अब प्रतिदिन कार्यालय को संक्रमण से सुरक्षित रखने के साथ कर्मचारियों की रक्षा के लिए तमाम उपाए किए जा रहे हैं। वैसे इनकी आवश्यकता शुरू से ही थी। लेकिन उसे नजरअंदाज कर दिया गया। हालांकि अभी पुरानी खामियों की रिपोर्ट जाने का डर है। यही वजह है कि खुद को कार्रवाई से बचाने के लिए ऐसा फरमान दिया गया है, जो सबूत का काम करेगा। कुछ कर्मचारी काम छोड़कर उस काम की तस्वीर खींचते हैं जिसे अब कराने के लिए गंभीरता दिखाई गई है। यही तस्वीरें अफसरों के मोबाइल पर पहुंचती है।

खोदा पहाड़ और निकली चूहिया

आइसोलेशन कोच। यह शब्द पिछले कई दिनों से सुनाई दे रहा है। यह सरकार की ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था थी, जिसका उपयोग आपातकालीन स्थिति में करना था। कोरोना वायरस की पहली लहर तो शहर में उपलब्ध इंतजामों के दम पर जैसे-तैसे गुजर गई। पर दूसरी लहर ने कोहराम मचाकर रखा है। बेड तक नसीब नहीं हो रहा है। यह नौबत आते ही पूरा फोकस वैकल्पिक उपाय पर है। अब तक सभी यही मान रहे थे जरूरत पड़ने पर सर्वसुविधायुक्त कोच मरीजों की रक्षा करने के लिए रेलवे हाजिर कर देगी। लेकिन हकीकत सोच से बिल्कुल विपरीत निकली। कोच तैयार होने का प्रचार-प्रसार करने वाली रेलवे ने यह कह दिया कि केवल कोच ही उपलब्ध करा पाएंगे। इस जवाब ने प्रशासन को चिंता में डाल दिया। जाहिर है कि खाली कोच लेकर क्या करेंगे। उनके सामने आक्सीजन, बेड व कर्मचारियों के साथ मरीजों को गर्मी से बचाने के उपाय की समस्या है।

ये भी क्या खूब है

एक दौर था जब एक-एककर सभी ट्रेनों के पटरी पर दौड़ने का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा था। जब भी मांग उठती थी, बदले में मायूस करने वाला जवाब मिलता था। कभी प्रस्ताव भेजने की बात कही जाती तो कभी आश्वासन दिया जाता था। उस समय कोरोना का कहर लगभग खत्म हो चुका था। इसलिए पहले स्टेशन से लेकर ट्रेन की रौनक भी लौट चुकी थी। पर स्थिति यह है परिचालन करने की मांग तो दूर चलने वाली ट्रेनों में ढूंढने से यात्री नहीं मिल रहे हैं। पर रेलवे एक के बाद एक नई-नई ट्रेनों को चलाने का एलान कर रही है। लोग अचरज में हैं कि एक साथ इतनी ट्रेनें दौड़ाई तो जा रही हंै पर इसके लिए यात्री कहां से मिलेंगे। अभी ही इतना घाटा हो रहा है और नई ट्रेनों के पटरी पर आते ही कितना नुकसान झेलना पड़ेगा। खैर आम यात्रियों को इससे क्या मतलब।

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