कलयुग में भगवान के नाम का संकीर्तन करने मात्र से मुक्ति की प्राप्ति संभव

रायपुर। शदाणी दरबार के संत राजाराम के 139वें जन्मोत्सव पर आयोजित श्रीमद् भागवत कथा की विश्रांति के अंतिम दिन तुलसी वर्षा के बाद महाआरती और महाभंडारे में प्रसाद ग्रहण करने के लिए भक्त उमड़ पड़े। नवापारा राजिम के भागवतचार्य पं.ब्रह्मदत्त शास्त्री ने अंतिम दिन राजा जनक और नौ योगीश्वरों के संवाद, दत्त भगवान के 24 गुरु की कथा और सुदामा-श्रीकृष्ण प्रसंग की व्याख्या की। उन्होंने कहा कलयुग में भगवान के नाम का संकीर्तन करने मात्र से मुक्ति की प्राप्ति संभव है।
कथा प्रसंग में बताया कि भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त सुदामा की कथा प्रेरणीय है। कथा हमें संदेश देती है कि अपने संकटग्रस्त मित्र का यथायोग्य सहयोग करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। जिस तरह श्रीकृष्ण ने निर्धन सुदामा को धन दौलत देकर कृतार्थ किया। वैसे ही मित्र को संकट से उबारें। सुदामा ने भगवान से कुछ नहीं मांगा लेकिन भगवान ने सुदामा को इतना दिया कि यदि रुक्मणी नहीं रोकती तो वे सर्वस्व अर्पण कर देते। भगवान श्रीकृष्ण के स्वलोक गमन की करूण कथा में बताया कि भगवान ने दुखी उद्धव को उपदेश देते हुए कहा था कि वे अपनी परम ज्योति के रूप में श्रीमद् भागवत कथा में सदैव विराजमान रहेंगे। मेरी कथा का गायन, कीर्तन सभी के लिए कल्याणकारी होगा।
कथा सुनने शदाणी दरबार के संत युधिष्ठिर लाल, वेद संरक्षण समिति के अध्यक्ष पं.रामचंद्र शास्त्री, अमरकंटक के स्वामी सत्यानंद, महंत वेदप्रकाश, विश्व हिंदू परिषद के रमेश मोदी, जनपद पंचायत धरसींवा अध्यक्ष उत्तरा कमल भारती, मुखी भजनदास तलरेजा, उपमुखी करमचंद गावड़ा, दिलीप सचदेव, कन्हैया, तान्या, राजप्रसन्ना शर्मा, जयपाल समेत अनेक श्रद्धालु शामिल हुए।





