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धार्मिक

महाष्टमी पर खोइछा भरकर दें माता रानी को विदाई, नोट करें विधि और महत्व

इंदौर। नवरात्र के नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्र की अष्टमी तिथि मां महागौरी की पूजा के लिए समर्पित है। इसे महाष्टमी या दुर्गा अष्टमी कहा जाता है। इस दिन महिलाओं द्वारा मां दुर्गा को खोइछा भरने की परंपरा होती है। इस विधि को करने से जातक को मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। देवी दुर्गा की पूजा के लिए समर्पित नौ रातों के समूह को नवरात्र कहा जाता है। देवी दुर्गा अष्टमी तिथि को राक्षसों का विनाश करने के लिए प्रकट हुई थीं। इसी कारण नवरात्र की अष्टमी तिथि का विशेष महत्व है।

खोइछा भरने का महत्व

महाअष्टमी के दिन महिलाएं विधि-विधान से मां दुर्गा को खोइछा भरती हैं। मान्यता है कि मां को खोइछा भरने से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। दरअसल, बिहार, झारखंड और यूपी जैसे राज्यों में बेटी की विदाई के दौरान खोइछा भराई की रस्म निभाई जाती है। जिसमें विवाहित बेटियों को विदाई के समय माँ या भाभी द्वारा चावल, हल्दी, सिक्के, फूल आदि कुछ चीजें दी जाती हैं, जिसे खोइछा कहा जाता है।

खोइछा भरने की विधि

मनोकामना पूरी होने पर महिलाएं खोइछा भरती हैं, जिसमें पान, सुपारी, मिठाई, चावल, हल्दी, अक्षत आदि होते हैं। अष्टमी के दिन महिलाएं माता रानी का सोलह श्रृंगार कर, मां का खोइछा भरती हैं। इसके बाद मां दुर्गा की विदाई की जाती है। इस दौरान महिलाएं श्रृंगार का सामान चुनरी में बांधकर देवी मां को अर्पित करती हैं।

डिसक्लेमर

‘इस लेख में दी गई जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। सूचना के विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/धार्मिक मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संकलित करके यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक या उपयोगकर्ता इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह से उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता या पाठक की ही होगी।’

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